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भागता मैं कुछ नए की चाह में

भागता मैं कुछ नए की चाह में

 

—चौं रे चम्पू! अमरीका ते आए भए चार दिनां है गए, बगीची पै चौं नायं आयौ तू?

—चचा, काल-क्रम बिगड़ा हुआ है। रात भर जागता हूं और दिन में आधा सोया, आधा जगा सा काम में लगा रहता हूं। सूरज की उपस्थिति में सोने का अभ्यास है ही नहीं। अभी ज़रा सिलसिला ठीक हो जाए तब आना शुरू करूंगा।

—रात भर जग कै का करै है तू?

—बैठा रहता हूं अपने कम्प्यूटरों पर, लेकिन परसों रात एक कम्प्यूटर ही बैठ गया। उसे उठाने के बहुत प्रयास किए। शुरू हो और बन्द हो जाए। कहा जाता है कि कम्प्यूटर को रिस्टार्ट करो तो अपने आप ठीक हो जाता है, कई प्रयास किए। थोड़ी देर चले और फिर बन्द।मैं तो घबरा गया। दूसरा लैपटॉप खोला, लेकिन मेरी अधिकांश सामग्री तो उसी कम्प्यूटर में थी। अब कुछ देर बाद रिस्टार्ट करूंगा यह सोचकर एक काग़ज़ पर कुछ चित्रकारी सी करने लगा। एक शेर ज़हन में आया, एक कोने में लिख दिया। धीरे-धीरे ग़जलनुमा-सा कुछहोने लगा।

—वो बता, का भयौ? बहुत दिनान ते कछू सुनायौ ऊ नायं तैनैं! चल सुना।

—चचा, पहला शेर कुछ यूं हुआ : भागता मैं कुछ नए की चाह में, कितने रोड़े आ रहे हैं राह में।

—तौ कम्प्यूटर के ठप्प होइबे कूं, तू रोड़ा मानैं ऐ का?

—चचा वह तो रोड़ा था ही, लेकिन कम्प्यूटर के अंदर से इंटरनेट के ज़रिए जो पत्थर गिरते हैं, वे आजकाल व्यवधान बन रहे हैं और बड़ी भयंकर चोट देते हैं। मैंने कहा— कातिलो! यूं ही नहीं मर जाऊंगा, वक़्त बाकी है अभी तो दाह में। और ये भी बता दिया उनको :करके घायल छोड़कर जब जाओगे, देखना मुस्कान मेरी आह में। ये कुछ शेर हुए ही थे कि फिर कम्प्यूटर खोला। इस बार चल गया तो मैं खुश हुआ। इंटरनेट ब्राउज़र खोलने लगा कि फिर बन्द। झल्लाकर मैंने एक शेर कहा : एक भी मिसरा अभी उतरा नहीं, कर चुका हूं कितने पन्ने स्याह मैं।

—जे खूब कही लल्ला! जे सेर अच्छौ है गयौ! पन्ना स्याह नायं भयौ।

—एक और सुनो : कुछ बहुत अच्छा हुआ तो कुछ बुरा, रंजो ग़म में ख़ुश रहा इस माह मैं।

—अच्छौ का भयौ?

—चचा, अमेरिका बिटिया के रिश्ते के लिए गया था। बालक योग्य है, सगाई हो गई, ये बहुत अच्छा हुआ। अब तो चिंता है कि क्या कुछ और करना है। ये विचार आते ही एक शेर हुआ : गुण दिए संतान को क्या और दूं, वक़्त थोड़ा ही बचा है ब्याह में।

—अरे फिकर की का बात ऐ? सब काम सही है जांगे। बिटिया के ब्याह ते बड़ौ पुन्न का ऐ रे?

—पाप-पुण्य तो जानता नहीं चचा। इतना जानता हूं कि तबियत से फ़कीर आदमी हूं। सुनो : इस फ़क़ीरी का मज़ा कुछ और है, है ठसक ऐसी कि जैसी शाह में।

—हां, सो तो हम जानैं तोय। अपने चम्पू कूं नायं जानिंगे तो कौन कूं जानिंगे? तेरौ कम्पूटर चालू भयौ कै नायं फिर?

—हो गया अंत में! गड़बड़ ये थी कि दोनों कम्प्यूटर की जो चार्जर लीड थीं, वो उल्टी लगा दी थीं। एक कम्प्यूटर में बैटरी बैकअप ज़्यादा था, वो चलता रहा। दूसरे में ग़लत तार के बावजूद ज़रा सी चार्जिंग हो जाती थी।

तनिक देर चलता था, ठप्प हो जाता था। तारअगर गलत जुड़ जाएं तो कम्प्यूटर क्या, अच्छा-भला आदमी बैठ जाय।

—इत्ती मेहनत चौं करै तू? का करैगौ इत्ते पइसन कौ?

—अरे चचा! ऐसा सवाल करने वाले पहले से ही बहुत हैं, मुझे उम्मीद नहीं थी कि मुझे जानने का दावा करने वाले तुम भी ऐसा सवाल करोगे। मेहनत करना कभी नहीं छोड़ूंगा।

मैंने पहले भी एक मुक्तक लिखा था :

‘जो मेहनत करी, तेरा पेशा रहेगा, न रेशम सही तेरारेशा रहेगा,

अभी कर ले पूरे सभी काम अपने, तू क्या सोचता है हमेशा रहेगा?’

अब मैं उन्हें और तुम्हें, दोनों को, ग़ज़ल का आख़िरी शेर सुना रहा हूं : पद या पैसे की नहीं अब कामना, चक्रधर संतुष्ट है इक वाह में।

—वाह लल्ला, वाह।

 


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  1. अद्भुत…कल से ही लग रहा था कि जल में कछु जरूर बहेगो, सो अईसन बहा कि ई का कौनो तुलना नाहीं है…

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