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    बै नी आ ह पी ना ला

    (सात रंगों से ही सफेद बनता है और सात रंगों से ही काला)

     

    आस्वाद के लिए नौ रस हैं
    सूंघने के लिए सौ घपले हैं
    लेकिन
    सुनने के लिए सात सुर हैं
    देखने के लिए सात रंग हैं
    छूने के लिए सात आसमान हैं।

    सातवें आसमान में रहता होगा इन्द्र
    लेकिन उसका धनुष होता है
    इसी हमारे पहले आसमान में,
    जिसकी आस्था होती है समान में।
    न सफ़ेद न काला
    बै नी आ ह पी ना ला।

    बैंगनी, नीला, आसमानी, हरा़
    पीला, नारंगी और लाल,
    और देखा है ये कमाल!
    अगर इनको गत्ते के पहिए पर
    बराबर मात्रा और
    बराबर आकार में रख कर घुमा दो
    तो सारे रंग सफेद हो जाते हैं,
    शांति-गीत गाते हैं।

    लेकिन अगर सात रंगों को
    किसी प्याले में घमोल दो,
    बिना अनुपात के ही घोल दो,
    तो हैरान रह जाता है प्याला,
    रंग हो जाता है भयानक काला।

    याद आती है
    निठारी की निठुराई,
    स्मरण मात्र से
    रीढ़ की हड्डी ठिठुराई।

    बैनी प्रसाद की आह निकल गई
    बच्चों को पी गया नाला,

    सातों रंग रोए—
    बै नी आ ह पी ना ला।

     

     

    wonderful comments!

    1. sunita patidar Jul 27, 2011 at 5:21 pm

      vigyan aur hindi ka bhut hee badiya sangam .

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