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बारह साल का सफ़रनामा

बारह साल का सफ़रनामा

 

–चौं रे चम्पू, पहौंच गयौ सिडनी… आस्ट्रेलिया?

–हां चचा, अब तो यहां एक हफ़्ता हो गया। सिडनी की पार्लियामेंट के सभागार में हिन्दी-शिक्षण संगोष्ठी आयोजित हुई।

–कैसौ रह्यौ?

–चकाचक बढ़िया! इसमें अनेक हिन्दी अध्यापक थे जो शिक्षण से जुड़ी अपनी समस्याओं के साथ उपस्थित थे, बाकी यहां हिन्दी के लिए काम करने वाले बहुत सारे पुराने लोग थे। सिडनीयुनीवर्सिटी के प्रो. हाशिम दुर्रानी, हंटर्स हिल से ‘हिन्दी समाज’ की शैलजा चन्द्रा, ‘इलासा’ की रेखा राजवंशी, ‘गोपिओ’ के हरमोहन वालिया, ‘ऑस्ट्रेलिया हिन्दी कमैटी’ के अध्यक्ष तारा चन्दशर्मा, ‘ऑस्ट्रेलिया हिन्दी इंडियन एसोसिएशन’ के अध्यक्ष संतराम बजाज, ‘युनाइटेड इंडिया एसोसिएशन’ के अमरिन्दर बाजवा, ‘द इंडियन डाउन अंडर’ की नीना बधवार, भारतीय दूतावास सेहरजीत सिंह सेठी… कहां तक गिनाऊं! आयोजक थे भारतीय विद्या भवन के अध्यक्ष गम्भीर वाट्स। शायर अब्बास अलवी ने संचालन किया।

–तैनैं का कियौ रे वहां पै?

–मैंने कम्प्यूटर में हिन्दी का पिछले बारह साल का सफ़रनामा बताया। वैसे ऑस्ट्रेलिया आते हुए मुझे सोलह साल हो गए और यहां के लगभग सभी हिन्दी-कर्मियों से मैं परिचित हूँ। स्वयं सिडनी विश्वविद्यालय में विज़िटिंग प्रोफेसर के तौर पर मैंने कक्षाएं ली हैं। हिन्दी का विकास और हिन्दी का ह्रास दोनों देखे हैं। चचा! प्राथमिक स्तर के शिक्षण में हिन्दी बढ़ रही है, लेकिन उच्च स्तर पर हिन्दी का नुकसान हुआ है। सिडनी विश्वविद्यालय ने धन के अभाव के कारण हिन्दी की स्नातक और स्नातकोत्तर कक्षाओं को बंद कर दिया, लेकिन इधर बहुत सारी संस्थाएं छोटे बच्चों को हिन्दी सिखा रही है। सिर्फ़ अंग्रेज़ीदां रहने का गर्व अब टूट रहा है। चिंता हो रही है अपनी भाषा की। बहरहाल, पिछले बारह वर्ष में कम्प्यूटर के क्षेत्र में हिन्दी के लिए जो सुविधाएं आईं हैं, मैंने इस विषयपर पावरपॉइंट प्रस्तुति के साथ अपना वक्तव्य दिया और कार्यशाला आयोजित की।

–बारह साल कौ का चक्कर ऐ रे?

–इसका गणित ये है चचा कि सन दो हज़ार से पहले यूनीकोड का आगमन तो हो चुका था, लेकिन यूनीकोड के मंच पर हिन्दी भाषा को पहली बार विंडोज़ टू थाउज़ैंड में देखा गया था। धीरे-धीरेहिन्दी को वह स्थान मिला, वे सुविधाएं मिलीं, जो अंग्रेज़ी के पास थीं। विंडोज़ टू थाउज़ैंड के बाद विंडोज़ एक्सपी आया और उसमें शब्दों का टूटना बंद हुआ। हम यूनीकोड के कारण अपनी मेल और अपनी प्रकाशन सामग्री बनाने लगे। सतत विकास हो रहा है, लेकिन अभी भी बहुत सारे सॉफ्टवेयर ऐसे हैं चचा, जिनमें यूनीकोड सक्रिय नहीं है। विंडोज़ के साथ भला हो लिनैक्स और ऐपल आदिका जिन्होंने अपने अनुप्रयोगों में हिन्दी को समाहित किया है। मैंने यूनीकोड से जुड़े इन्हीं मसलों को विस्तार से बताया, फिर उनकी बातें सुनीं।

–उन्नैं का कही रे?

–उनकी समस्याएं बड़ी जैनुइन थीं। स्कूलों में विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी के साथ चीनी, जापानी, कोरियन भी पढ़ाई जाती हैं। चीन, जापान और कोरिया की सरकारें उच्चस्तरीय और आधुनिकशिक्षण-सामग्री मुहैया कराती हैं। वैसी शिक्षण-सामग्री हिन्दी सीखने वाले बच्चों को उपलब्ध नहीं है। चचा विश्व भर में नई पीढ़ी को हिन्दी सिखाने के लिए अभी बहुत मेहनत करनी है।

—हमाए लायक कछू होय सो बता!

—अखाड़े की मिट्टी हाथ में लेकर कुछ सोचिए! वैसे, कुल मिलाकर आयोजन सफल रहा चचा और एक और बात सुनकर आपको खुशी होगी।

–वो बात जरूर बता?

–न्यू साउथ वेल्स के एक सांसद डॉ. जेफ़ ली भी संगोष्ठी में आए थे। उन्होंने हिन्दी के विकास के पक्ष में अच्छा वक्तव्य दिया। बाद में वे हमें लोअर हाउस और अपर हाउस घुमाने ले गए। सदन चलरहा था। स्पीकर महोदय ने तुम्हारे चम्पू की उपस्थिति और हिन्दी संगोष्ठी को संज्ञान में लिया। पार्लियामेंट की कार्यवाही में उनका बयान दर्ज हुआ। बाकी मैं अभी यही हूँ। दो दिन बाद ब्रिसबेनजाना है। अध्यापकों से मिलूंगा। फिर जाऊंगा मेलबर्न भी, पर्थ भी। शिक्षण का भी काम करूंगा और कविताएं सुनाकर लोगों को प्रोत्साहित करने की कोशिश भी करूंगा। तुम्हारे क्या हाल हैं चचा?

–अरे हम तौ ठीक ऐं लल्ला! फोन पै बात है रई ऐं, जे ई भौत ऐ! पहलै इत्ती लम्बी-लम्बी बात कहां होतीं?

 


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