अशोक चक्रधर > Blog > खिली बत्तीसी > बांस की खपच्ची की माथापच्ची

बांस की खपच्ची की माथापच्ची

baans kee khapachchee kee maathaa pachchee

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

बांस की खपच्ची की माथापच्ची

(झुकना विनम्रता की निशानी है पर स्वाभिमान की शर्त खोने पर नहीं)

 

एक होती है लकड़ी एक होती है रबर,

एक रहती है अकड़ी एक होती है लचर।

 

जो अकड़ा रहे उसे प्लास्टिक कहते हैं,

जो लचीला हो उसे इलास्टिक कहते हैं।

लेकिन स्टिक है दोनों की कॉमन कड़ी,

स्टिक माने छड़ी।

कड़ीलेपन की छड़ी

और लचीलेपन की छड़ी।

कड़ीलेपन की छड़ी कभी टूट जाती है

कभी हाथ से छूट जाती है

करे तो तगड़ा वार करती है,

लेकिन लचीलेपन की छड़ी

ज़्यादा मार करती है।

ऐसे ही होते हैं लोग

कुछ कड़े कुछ लचीले,

कुछ तने हुए कुछ ढीले।

 

मैंने कहा— आप छलिया बड़े हैं,

न लचीले हैं न कड़े हैं!

आपसे कौन करे माथापच्ची,

आप हैं फ़कत एक बांस की खपच्ची!

जो वैसे देखो तो तनी है,

पर हमेशा झुकने के लिए बनी है।

 

श्रीमानजी बोले— खपच्ची जब झुकती है

तभी बनती है पतंग

तभी बनता है इकतारा।

हां हम झुकते हैं

पतंग जैसी उड़ान के लिए

इकतारे जैसी तान के लिए,

और कुल मिलाकर

देखने-सुनने वालों की

मुस्कान के लिए।

पर इतना मत झुकाना कि

पतंग की डोर या इकतारे का तार

हाथ से छूट जाय,

और खपच्ची टूट जाय।

 


Comments

comments

3 Comments

  1. wah sir..kya baat.
    aise hi nahi aap no. 1 hain.

  2. guru jee se seekah hue hai isses preet.

Leave a Reply