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  • बाहर की घास से ये घास अच्छी

    baahar kee ghaas se ye ghaas achhee

     

     

     

     

     

     

     

     

    बाहर की घास से ये घास अच्छी

    (कल्पना से परे होती हैं सहानुभूति की कुछ स्थितियां)

     

    भूख में होती है कितनी लाचारी,

    ये दिखाने के लिए एक भिखारी,

    लॉन की घास खाने लगा,

    घर की मालकिन में

    दया जगाने लगा।

     

    दया सचमुच जागी

    मालकिन आई भागी-भागी—

    क्या करते हो भैया?

     

    भिखारी बोला—

    भूख लगी है मैया।

    अपने आपको

    मरने से बचा रहा हूं,

    इसलिए घास ही चबा रहा हूं।

    मालकिन ने आवाज़ में

    मिसरी सी घोली,

    और ममतामयी स्वर में बोली—

    कुछ भी हो भैया

    ये घास मत खाओ,

    मेरे साथ अंदर आओ।

     

    दमदमाता ड्रॉइंग-रूम जगमगाती लाबी,

    ऐशोआराम के सारे ठाठ नवाबी।

    फलों से लदी हुई

    खाने की मेज़,

    और किचिन से आई जब

    महक बड़ी तेज़,

    तो भूख बजाने लगी

    पेट में नगाड़े,

    लेकिन मालकिन ले आई उसे

    घर के पिछवाड़े।

     

    भिखारी भौंचक्का-सा देखता रहा

    मालकिन ने और ज़्यादा प्यार से कहा—

    नर्म है, मुलायम है, कच्ची है,

    इसे खाओ भैया

    बाहर की घास से ये घास अच्छी है!

     

     

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