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    20110504 baadal badaleeबादल से बोली बदली–

    ये उतावली नहीं भली!

    मुझे छोड़ कर भागा जाता

    किस रस्ते अनजान गली?

     

    बादल बोला— ओ बदली!

    मैंने राह नहीं बदली।

    तेज़ हवा ले जाए जिधर

    वो मेरी मंज़िल अगली।

     

    बदली को आया गुस्सा

    बादल को मारा घिस्सा–

    दुष्ट हवा कैसे लेगी

    मेरा हक़ मेरा हिस्सा?

     

    मुझको अपनी कहता है,

    और…. संग हवा के बहता है।

    अरे, वो तेरा कुछ भला करेगी

    किस ग़फ़लत में रहता है?

    प्यासा मरुथल तरसेगा,

    तुझसे ही तो सरसेगा।

    संग हवा के लगा रहा तो

    क्या सागर पर बरसेगा?

     

    मुझको अंग लगा ले तू

    अपने संग मिला ले तू

    हिला न पाएगा कोई भी

    अपना वज़न बढ़ा ले तू।

     

    बदली जी को जमा गई

    बात अकल की थमा गई

    बाहें फैलाईं बादल ने

    बदली उसमें समा गई।

     

    दोनों गए प्रेम में डूब,

    दोनों मिलकर बरसे खूब,

    फिर कुछ दिन के बाद दिखी

    मरुथल में हरियाली दूब।

     

    wonderful comments!

    1. yog मई 29, 2011 at 3:11 अपराह्न

      your poem is very sensible and relevant.

    2. sunita patidar जुलाई 19, 2011 at 11:15 पूर्वाह्न

      dekh maruthal mye hariyali dub . dekh bache hue hai bhut hai khush . badli boli badal se kitna sukh hai milne mye . badel bola sach tumse milker jana hai.

    3. Anupriya Srivastava नवम्बर 5, 2012 at 12:05 अपराह्न

      I heard this poem of yours on Doordarshan when I was very young ...Thanks for being an inspiration to many :)

    4. Sania जून 22, 2016 at 10:06 पूर्वाह्न

      Really like this poem I have recited it 2 times in school Ati Uttam!

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