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बाबूजीमय सब संसारा

बाबूजीमय सब संसारा

 

—चौं रे चम्पू! कब आयौ मुंबई ते?

—कल रात में ही लौटा हूं चचा।

—तौ सुना कछू हाल-हवाल।

—बहुत लोगों से मिला। कविताएं सुनाईं। कविसम्मेलन बाजी हुई। मुंबई के अधिकांश राजभाषा अधिकारियों के सामने यूनिकोड और भारतीय भाषाओं को लेकर पावरप्वाइंट प्रस्तुतियां हुईं। कार्यशालाएं लगीं। अंताक्षरीवाले गजेन्द्र सिंह के साथ पकौड़े खाए, योजनाएं पकाईं। फिल्म-निर्देशक अमित राय के साथ उनके अगले प्रोजेक्ट पर चर्चाएं हुईं, लेकिन अपरिमित सुख मिला बड़े अमित जी से मिलकर।

—बड़े अमित माने अमिताभ बच्चन?

—हां चचा। मैंने छब्बीस तारीख को उन्हें एक एसएमएस किया था— मुम्बई आया हुआ हूं। कल बाबूजी का जन्मदिन है। एक पेंटिंग बनाई है, भेंट करना चाहता हूं। उनका उत्तर आ गया— कल ग्यारह बजे ‘प्रतीक्षा’ में मिलते हैं। सो चचा, उनके पुराने घर ‘प्रतीक्षा’ में ज़रा भी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी। वे अवतरित हुए और काफी देर सुकून भरी बातें हुईं।

—का बात भईं?

—केबीसी की, एबीसी की, बाबूजी डॉ हरिवंशराय बच्चन का जन्मदिन था, सो उनकी स्मृतियों से जुड़ी हुई। और चचा! तुम तो जानते हो, कम्प्यूटर के क्षेत्र में जो भी नया उपकरण आता है मैं उसको पाने के लिए बालहठकरने लगता हूं और मेरा बेटा, एक पिता के समान मेरी इच्छाएं पूरी करता रहता है। इस साल दस महीने पहले उसने मुझे एपल का आईपेड-टू दिया था। उस आईपेड ने मुझे बड़े आनन्द दिए। उसमें इंडिकनोट्स नाम का एक ऐप है जिससे हम न केवल देवनागरी लिपि, बल्कि अन्य आठ भारतीय भाषाएं भी रोमन कीबोर्ड से लिख सकते हैं। उसी से हिन्दी में ईमेल कर सकते हैं, सीधे फेसबुक या ट्विटर पर जा सकते हैं। आईपेड-टू का इस्तेमाल अमितजी भी करते थे, लेकिन उनको पता नहीं था कि इंडिकनोट्स जैसी कोई सुविधा आ गई है। मैंने बताया तो वे खुश हो गए। सन दो हज़ार सात में मैंने उन्हें हिन्दी के ध्वन्यात्मक की-बोर्ड से परिचित करायाथा। हिन्दी कितनी आसानी से लिखी जा सकती है, उन्हें मेरा वह पहला प्रदर्शन याद था। अभी भी यदाकदा जब उनके साथ एसएमएसबाज़ी होती है तो आ की मात्रा के लिए वे डबल ए लगाना नहीं भूलते, मैं भले ही ग़लती कर जाऊं। तो, इंडिकनोट्स में उन्होंने खुद लिखकर देखा। हाथ में पेंसिल लेकर आए थे। नोट किया। मेरे ख़्याल से उन्होंने दोपहर तक इंडिकनोट्स ऐप अपने आईपेड में डाउनलोड कर लिया होगा। फिर मैंने अपनी चमत्कारी पिटारी से दूसरा उपकरण निकाला। वह था स्मार्ट-पेन। उन्होंने उलट-पलट कर देखा और जब उसका चमत्कार उनके सामने आया तो वे भी बच्चों की तरह खुश हो गए।

 

harivansh bachchan ji

 

 

 

 

 

 

 

 

 

—जे का चीज ऐ भैय्या? स्मार्ट-पेन!

—चचा, ये लेखकों, शिक्षकों, विद्यार्थियों के लिए वरदान है और अनैतिकों के लिए जासूसी का उपादान है। एक सादा सी डायरी, उस पर इस पेन से सादा पेन के समान लिखो, छोटे-छोटे नोट्स लेते जाओ, बाकी सारी बातें गईं स्मार्ट-पेन के पेट में। जैसे ही पेन की निब को लिखे हुए शीर्षक या उपशीर्षक पर ले जाओगे, स्मार्ट पेन तुम्हें पूरी गाथा सुना देगा। वे परम प्रसन्न हुए। उसके बाद बातचीत हुई वाचिक परम्परा की। कविसम्मेलन निरंतर दुर्गति को प्राप्त हो रहे हैं और इस परम्परा को समाप्त नहीं होने देना है। इसके आधुनिक रूप के पुरस्कर्ताओं में डॉ. हरिवंश राय बच्चन रहे हैं। उन्होंने कहा कि कविसम्मेलन की इस वाचिक परम्परा में कैसे प्राण फूंके जा सकते हैं इसके लिए वे समय निकालेंगे। बहरहाल, वे बड़े सुकून में थे। चालीस-पैंतालिस मिनट कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला। वे मेरे साथ और भी समय बिता सकते थे पर मैं जानता हूं कि उनका समय कितना मूल्यवान है। मैं जाने लगा तो वे मुझे बाबूजी के कमरे में ले गए। डॉ. बच्चन जिस कुर्सी पर बैठकर लिखते थे, वहां मेज़ पर उनके पैन, कलमदान, राइटिंग पैड, चश्मे, ज्यों के त्यों सजे हुए थे। फिर बाबूजी की एक-एक चीज दिखाई उन्होंने। वे पूरी तरह से बाबूजी में लीन थे। जैसे जन्मदिन पर उनसे एकांत में मिलने आए हों। चित्र के आगे अगरबत्तियां जल रही थीं और उनका सद्य: गाया हुआ हनुमान चालीसा बज रहा था पर उनके चेहरे कीभाव-ध्वनियां मुझे सुनाई दे रही थीं, ‘बाबूजीमय सब संसारा, करे वंदना पुत्र तुम्हारा’।


 


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