अशोक चक्रधर > Blog > चौं रे चम्पू > अंतर्लोकपाल मज़बूत हो

अंतर्लोकपाल मज़बूत हो

अंतर्लोकपाल मज़बूत हो
—चौं रे चम्पू! नए साल में तेरी है कोई ऐसी तमन्ना, जो तू चाहै कै पूरी है जाय?
—चचा, अगर मैं एक ऐसी तमन्ना बताऊं जिसमें सौ तमन्नाएं समा जाएं, तो तुम्हें कोई तक़लीफ तो
नहीं?
—अरे मोय काय की तकलीफ? सौ की बजाय हज्जार तमन्ना समा जायं! दस हज्जार समा जायं!
तमन्ना ऐसी हौनी चइऐ जो हमारे एक सौ इक्कीस करोड़ लोगन कौ फायदा करै।
—-गारंटी है! हर भारतवासी का भला होगा। लो सुनो मेरी तमन्ना। तमन्ना है एक मज़बूत
अंतर्लोकपाल।
—का मतलब?
—देखिए, हमारे देश का भ्रष्टाचार किसी लोकपाल द्वारा ठिकाने नहीं लगेगा, मज़बूत अंतर्लोकपाल
द्वारा ही परास्त होगा। हम बाहर के ब्रह्मांड को छान मारें और अपने अन्दर की दुनिया को न
निहारें, ऐसा कैसे चलेगा? बाहर बैठा लोकपाल कहां-कहां कैमरे लगवाएगा। मरी हुई आत्मा के लोग
कहते रहेंगे, इत्ते हमारे, इत्ते तुम्हारे, क्या कर लेंगे अन्ना हजारे? खाने वाले खाएंगे आइसक्रीम,
क्या कर लेगी बड़बोली टीम? सुनते हैं कि मुम्बई में उस दिन, जिस दिन अनशन टला, पच्चीस
हज़ार लोगों के खाने का इंतेज़ाम था, हज़ार लोग भी नहीं थे खाने वाले। हमारे नौजवानों के सामने कोर
कमेटी के जो रूप आए हैं, उनसे लगभग मोहभंग की स्थिति आती जा रही है।
—तू अंतर्लोकपाल की बात कर!
—हमें अपने अंतर्लोक के लिए एक ऐसा पालनहार चाहिए जो अपने अन्दर के अन्दर के अन्दर
निहारे। अगल-बगलालोचन के स्थान पर पहले आत्मालोचन करे। हम अपने उस अंतर्लोकपाल को
मजबूत बनाएं।
—अंतर्लोकपाल कैसे मजबूत बनेगौ रे?
—दिल और दिमाग की आंतरिक प्रयोगशाला में निर्मित उपकरणों से मज़बूत होगा। इस प्रयोगशाला
के वैज्ञानिक अंतर्लोक के काष्ठ हो चुके प्रकोष्ठों में व्यापक स्तर पर फैली हुई भ्रष्टाचार की
दीमक को मारने के लिए ऐसी दवाई बनाएंगे कि हम इस लोकतंत्रहंता, निरंतर-फैलंता, एक-दूजे में
लगंता रोग से मुक्ति पा जाएंगे। इतने अन्दर तक लोकपाल के कानून नहीं जा सकते। इतने अन्दर
तक कोई झांक नहीं सकता। जब तक पूरा समाज इस अंतर्लोकपाल द्वारा बनाए गए राष्ट्रीय
मानकीकृत मूल्यों का पालन करने की अनिवार्यता निर्धारित नहीं करेगा तब तक चचा महामारी
नहीं जाएगी। हमें चाहिए भ्रष्टाचार को मारने की एक परमानेंट दवाई, किसी भी मजबूत से मजबूत
लोकपाल द्वारा भ्रष्टाचार की दीमक मरेगी नहीं हरजाई।
—तौ का लोकपाल बिल पास नायं हौनौ चइऐ?
—क्यों नहीं! पक्ष और विपक्ष, दक्ष और अदक्ष, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष, सभी लोकतांत्रिक
शक्तियां एक बार जनता के मन में यह धारणा बिठाएं कि वे लोकपाल बिल की समर्थक हैं। अब
वह लोकपाल-विधान लोकतंत्र का भूत साबित होगा या मज़बूत, यह तो उसके पालनकर्ताओं
और व्यवहर्ताओं पर निर्भर करेगा। रह-रह कर मुझे बाबा साहब अम्बेडकर की बात याद आती
है, उन्होंने कहा था कि कोई संविधान कितना ही अच्छे से अच्छा क्यों न बने, अगर उसका पालन
करने वाले लोग अच्छे नहीं हैं तो उस संविधान का लाभ न उठा पाएंगे। और कोई संविधान कितना
ही कमज़ोर क्यों न हो, अगर उसके चलाने वाले अच्छे हैं तो वह भी लाभकारी हो सकता है। इसी तरह
से लोकपाल बिल है, कमज़ोर बनाओ या मज़बूत, अगर उसका अनुपालन करने वाले सही हैं, उनकी
नीयत में मट्ठा या दही नहीं है, तो देश ठीक होगा। मज़बूत से मज़बूत और कठोर से कठोर लोकपाल
भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त कर देगा, ऐसा सोचना भयंकर भूल है। ऊपर से लाया गया, कानून
द्वारा बनाया गया, संसद के वाद-विवाद, बहसों के बाद पारित किया हुआ कोई भी लोकपाल बिल और
कोई भी लोकपाल या जनतंत्र का ठोकपाल इस देश में भ्रष्टाचार का समूल नाश कर नहीं सकता।
—तौ का बेकार ऐं जे सब?
—मैंने ये नहीं कहा कि बेकार हैं। मैंने ये भी नहीं कहा कि जो क़ानून अभी अपने पास उपलब्ध हैं, वे
बेकार हैं। अगर पहले से विद्यमान कानूनों का ही पालन किया जाए तो भी तस्वीर बदल सकती है।
समानांतर शक्ति बनकर आने वाले किसी लोकपाल पर अगर हम अविश्वास नहीं कर सकते तो
विश्वास भी कैसे कर सकते हैं। वह भी तो इसी व्यवस्था में गढ़ा जाएगा और तंत्र के सिर पर मढ़ा
जाएगा। भविष्य के लोकपाल की भी तो भ्रष्टाचारी तमन्नाएं हो सकती हैं। इसीलिए मैंने एक ही
तमन्ना बताई है, हमारा अंतर्लोकपाल मज़बूत हो।


Comments

comments

Leave a Reply