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अंतरिक्ष में गूंजें हमारी भाषाएं

अंतरिक्ष में गूंजें हमारी भाषाएं

—चौं रे चम्पू! सन ग्यारह में कौन-कौन से मजा किए और बारह ते का उम्मीद लगाए बैठौ
ऐ?
—चचा, उम्मीदें तो अनंत हैं।
—जो पूरी है सकैं, सो बता।
—चचा, मैं राजनीति, धर्म, संस्कृति, दर्शन, आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय, लोकपाल
बिल और काबिल लोगों की कांटा किल-किल पर उम्मीदपरक शैली में कुछ नहीं बोलने
वाला। पहले ख़ुद को बुद्धिमान माना करता था, सो बोलता था। अब वैसी कोई ऐंठ नहीं
है। बुद्धि से बालक हूं। भविष्य की चिंता नौजवानों पर छोड़ दी…. अब तुम्हारे हवाले वतन
साथियो! मैं तो कम्प्यूटर क्रीड़ा में आनन्द लेता हूं। सन दो हज़ार ग्यारह में मैंने मज़े
लिए आई-पैड और स्मार्ट पैन के।
—हां तैंनैं पहलै ऊ बतायौ हतो?
—आई-पैड ने मेरे कंधे से लैपटॉप का वज़न हटा दिया। पहले जगह-जगह लैपटॉप लिए घूमता
था। अब आई-पैड में हिन्दी में लिखने की सुविधा के साथ पूरा संसार मेरे साथ चलता है।
मेरी सारी किताबें, नोट्स मेरे साथ। फोटो खींच लो, वीडियो बना लो और ई-मेल कर दो।
इंटरनेट की सारी सुविधाएं मौजूद! फेस-बुक पर जाओ, ट्विटर पर जाओ। बातचीत करो,
बतियाओ। नेटफोन मिलाओ तो सामने वाले का मुखड़ा भी दिखाई दे। स्काइप पर बातचीत
करो। टनाटन शास्त्रीय संगीत सुन लो! यू-ट्यूब पर नए-नए इल्म और पुरानी-पुरानी
फिल्म देख लो। मन करे तो शब्द-खेल खेल लो। स्क्रेम्बल और स्क्रेम्बलर। उंगली
की पोरों से चित्रकारी कर लो। …और भी ढेर सारी चीज़ें! किताबें पढ़ लो, ई-बुक में पूरा
पुस्तकालय समेट लो। कुल मिलाकर ये साल मेरे लिए तो आई-पैड का साल रहा है। और
साल के जाते-जाते मुझे स्मार्ट पैन मिला। ये भी ख़ूब ज़ोरदार चीज़ है। सादा सा दिखने
वाला पैन, सादा सा लिखने वाला पैन, लेकिन है चमत्कारी।
—मैं वो चमत्कार देख चुकौ ऊं।
—हां, स्मार्ट पैन मैंने दिखाया था आपको। अमिताभ बच्चन जी को भी दिखाकर आया था,
वे भी हैरान रह गए थे। आजकल आकाश की संभावना देख रहा हूं।
—आकास की कैसी संभावना?
—अरे ‘आकाश’ नाम है एक कम्प्यूटर का जो कपिल जी डेढ़ हज़ार से भी कम क़ीमत पर
छात्रों को मुहैया कराने जा रहे है। अभी वह केवल अंग्रेज़ी में है। मेरी कामना है कि
हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में भी काम कर सके। सन बारह से उम्मीद करता हूं
कि यह छोटा सा कम्प्यूटर हमारे देश के उन सभी युवाओं के पास हो जो ज़्यादा पैसा
ख़र्च नहीं कर सकते, पर डिजिटल दुनिया में आने की तमन्ना रखते हैं। वे इंटरनेट का
असीमित आनन्द लें। मुट्ठी में भर लें लिखाई-पढ़ाई के आकाश को। सन दो हज़ार बारह
में वैसे भी तकनीक का विकास बहुत तेज़ रफ़्तार से होने वाला है। जिस तेज़ी से नैनो
तकनीक विकसित हो रही है, आश्चर्य होता है। देखना अगले साल मोबाइल क्या-क्या गुल
खिलाने वाला है। टच टैक्नोलॉजी वाला फोन तो दो साल पहले भी मेरे पास था पर वह टच
से नहीं, रगड़ने से चलता था। अब तो जैसे पंख छुआ दो और सूचनाएं दौड़ने लगती हैं।
—मोबाइल में का होयगौ?
—आपका मोबाइल आपका चेहरा पहचानेगा। किसी और ने उसको छूने की कोशिश की तो
उसका फोटो खींच लेगा। आधिकारिक व्यक्ति ही इस्तेमाल कर रहा है, यह जानने के
बाद ही मोबाइल अंतरंग आदेशों का पालन करेगा। क्रेडिट कार्ड भी ख़त्म हो सकते हैं।
मोबाइल में भरो रकम, एटीएम मशीन को दिखा दो, मशीन पैसा उगल देगी। अंतरिक्ष में
भी और ज़्यादा धंसमार कर सकता है हमारा देश। पर अंतरिक्ष में गूंजें हमारी भाषाओं
के स्वर, ये मेरी दिली तमन्ना है। आकाश में हिन्दी आ आए। मोबाइलों में हिन्दी आए।
हिन्दी-शिक्षण के लिए शब्द-खेल विकसित हों। एक तमन्ना और है चचा, अभी तक
हिन्दी में ओसीआर नहीं आया।
—जे ओसीआर का बला ऐ?
—ऑप्टीकल करैक्टर रिकग्नाइज़र। चचा, हमारी भारतीय भाषाओं की जितनी भी किताबें हैं
उन्हें स्कैन करो और टंकित पाठ में बदल लो! हमारी हजारों-लाखों पुस्तकें इंटरनेट पर यूं
ही उपलब्ध हो जाएं, अगर एक अच्छा
ही जाने कि देश की बल्ले-बल्ले करेगा या राजनीति उसे बारहबाट कर देगी, पर हमें तो
समय के तराजू पर उतने बाट रखने हैं कि सन बारह सबका भला करे।
ओसीआर बन जाए। बाकी तो सन दो हज़ार बारह


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