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    अंधकार भगाने वाला गुरुत्व

     

    —चौं रे चम्पू! अध्यापक और गुरू में का फरक होय?

    —चचा, आज अध्यापक दिवस है, अध्यापक की बात करो। गुरु का दिवस गुरु-पूर्णिमा होता है, तब बात करना।

    —चम्पू, तू सीधौ जवाब चौं नायं दे। अंतर बता।

    —अंतर यूं तो विशेष नहीं है, लेकिन अगर बारीक़ी से सोचो तो ये हो सकता है कि अध्यापक एक निश्चित अवधि में निश्चित पाठ्यक्रम, निश्चित समय में,निश्चित विद्यार्थियों को पढ़ाता है। गुरु के लिए निश्चित कुछ नहीं होता। अपना जीवन-ज्ञान, अनुभवार्जित ज्ञान, अपना विद्या-कौशल वह अपने शिष्य मेंस्थानांतरित करता है। वह स्वयं अपने पाठ्यक्रम और समय-सारिणी बनाता है। गुरु और शिष्य का संबंध अध्यापक और विद्यार्थी की तुलना में सुदीर्घ होता है। अंग्रेज़ी में जिसे मेंटोर कहते हैं उसे तुम गुरु समझो और जिसे टीचर कहते हैं उसे अध्यापक समझो। आज टीचर्स डे है, अध्यापक दिवस!

    —तौ का अध्यापक की महत्ता गुरू ते कम ऐ?

    —मैंने कब कहा? आज उसकी महत्ता का दिन है, इसलिए ऐसा कहना भी नहीं चाहिए। दोनों को पर्यायवाची मान लो तो कोई अंतर नहीं है, लेकिन चचा अंतर तोहै। टीचर कोचिंग करता है, स्कूलों, कॉलेजों और संस्थाओं के माध्यम से, कभी ख़ुद प्राइवेट एजेंसी खोल कर। आज की शिक्षा व्यवस्था में शिक्षक अपनेछात्रों को अपनी अपनी योग्यता के अनुसार पाठ्यक्रमों का अध्ययन कराते हैं पर उनको गुरु की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। गुरु या मेंटोर किसी संस्थान से जुड़े हो सकते हैं, लेकिन धीरे-धीरे वे स्वयं में एक संस्थान बन जाते हैं। वे स्वयं निर्धारित करते हैं कि अपने शिष्य को ज्ञान कब और कहां देना है। हाजिरी के रजिस्टर की उन्हें ज़रूरत नहीं होती। चाहें तो पूरे-पूरे दिन सिखाते रहें। शिष्य भले ही थक जाए पर वे नहीं थकते। गुरु के साथ प्रॉब्लम सिर्फ़ एक है कि वेसिर्फ़ सम्मान नहीं, भक्ति चाहने लगते है। उनके अंदर ज्ञान-दान का नशा होता है। हालांकि वे शिष्य में आत्म-दीप्ति देखकर शान से भर जाते हैं पर वे ऐसेही शिष्य नहीं बनाते!

    —कैसै बनामैं?

    —योग्यता और पात्रता देख कर। शिष्य भी ये जानता है कि ज्ञान तो गुरु के पास ही है, इसलिए उसको भी भटकना पड़ता है। वह गुरु की खोज करता है।

    —कबीरदास नैं तौ गुरू की महिमा कौ खूब गायन कियौ ऐ।

    —वे तो गुरु और गोविन्द में तुलनात्मक अध्ययन करने लगे थे। निदान गुरु ने ही निकाला कि भैया गोविन्द की शरण में जाओ। इसका मतलब ये हुआ कि गुरु अहंकारी नहीं होता। जो गुरु अहंकारी होते हैं वे ब्रह्मराक्षस बन जाते हैं और इतना अहंकार उनमें आ जाता है कि वे समझने लगते हैं कि सूरज और चन्द्रमा भी उनके पैर छूने आएंगे। ऐसे गुरु गुरूर में आ जाते हैं। सोचते हैं कि ब्रह्मांड उन्हीं के ज्ञान से घूम रहा है। वे एक स्तर पर संवेदनशून्य हो जाते हैं। मुक्तिबोध की कविता ‘ब्रह्मराक्षस’ का नायक ब्रह्मराक्षस का सजलउर शिष्य होना चाहता है। गुरु अगर स्वयं सजलउर होगा तो वह सजलता शिष्य में अपने आप स्थानांतरित होगी। अरे गुरू जी, शिष्य का अपना व्यक्तित्व है। शिष्य भविष्य है। वह अपने गुरु से आगे की सोचता है, लेकिन सोचता वही है जिसका बीजारोपण गुरु ने किया हुआ होता है। इसीलिए किसी भी काल का गुरु क्यों न हो, वह अनंत काल को प्रभावित करता है। संस्कृत में ‘गु’ का अर्थ हैअंधकार और ‘रु’ होता है समाप्त करने वाला। बहुत से अध्यापकों में अंधकार भगाने वाला गुरुत्व होता है, पर बेचारे मास्टर में कहां से आए? घर-गृहस्थी काभविष्य देखे या चेलों का!

    —दौनौं देखै! अब तू उल्टी बात बोलन लग्यौ! सीधी बोल सीधी!

    —सीधी बात ये है चचा कि आप बड़े हैं। जो बड़ा होता है उसी को गुरु कहते हैं और जो छोटा होता है उसे लघु। काव्यशास्त्र में गुरु और लघु होते हैं न! जिनसे छंद में मात्राओं की गिनती की जाती है। आप गुरु हैं। आपसे बहुत कुछ सीखा है। आप गुरु, अध्यापक, आचार्य, प्राचार्य, अनुशास्ता, अभिवक्ता, आख्याता, उपाध्याय, टीचर, भट्टाचार्य, मास्टर, मुदर्रिस, मौलवी, वाचयिता, शास्ता और शिक्षक सब कुछ हैं। अखाड़े में भले ही कुश्ती नहीं लड़ता, लेकिन दाव-पेच तोआपने ही सिखाए हैं। आपको प्रणाम!

    wonderful comments!

    1. Purushottam Sharma सितम्बर 5, 2012 at 8:34 अपराह्न

      Wah USTAAD kya baat kahi hai

    2. Purushottam Sharma सितम्बर 5, 2012 at 8:34 अपराह्न

      Wah USTAAD kya baat kahi hai

    3. Purushottam Sharma सितम्बर 5, 2012 at 8:34 अपराह्न

      Wah USTAAD kya baat kahi hai

    4. yogesh sharma सितम्बर 5, 2012 at 9:38 अपराह्न

      bahut badhiya sir ji :)

    5. Pramod Shukla सितम्बर 5, 2012 at 10:00 अपराह्न

      Bhai wah !

    6. Pramod Shukla सितम्बर 5, 2012 at 10:00 अपराह्न

      Bhai wah !

    7. Pramod Shukla सितम्बर 5, 2012 at 10:00 अपराह्न

      Bhai wah !

    8. डॉ. रश्मि सितम्बर 6, 2012 at 2:27 पूर्वाह्न

      अच्छी व्याख्या कर दी आपने आज की कोचिंग-छाप शिक्षा की..और..स्वार्थ-लिप्त गुरु ...टीचर...मेंटर...आदि..इत्यादि..

    9. डॉ. रश्मि सितम्बर 6, 2012 at 2:27 पूर्वाह्न

      अच्छी व्याख्या कर दी आपने आज की कोचिंग-छाप शिक्षा की..और..स्वार्थ-लिप्त गुरु ...टीचर...मेंटर...आदि..इत्यादि..

    10. डॉ. रश्मि सितम्बर 6, 2012 at 2:27 पूर्वाह्न

      अच्छी व्याख्या कर दी आपने आज की कोचिंग-छाप शिक्षा की..और..स्वार्थ-लिप्त गुरु ...टीचर...मेंटर...आदि..इत्यादि..

    11. Upasana Singh सितम्बर 6, 2012 at 4:09 पूर्वाह्न

      na guru kumhar, na shisya kumbh hea,na gadi, gadi kade khont, na antar hath sahar de na bahar bahar chot. aaj guru aesa he hea, per guru se accha koei nahein.shree gurve namha.

    12. Upasana Singh सितम्बर 6, 2012 at 4:09 पूर्वाह्न

      na guru kumhar, na shisya kumbh hea,na gadi, gadi kade khont, na antar hath sahar de na bahar bahar chot. aaj guru aesa he hea, per guru se accha koei nahein.shree gurve namha.

    13. Upasana Singh सितम्बर 6, 2012 at 4:09 पूर्वाह्न

      na guru kumhar, na shisya kumbh hea,na gadi, gadi kade khont, na antar hath sahar de na bahar bahar chot. aaj guru aesa he hea, per guru se accha koei nahein.shree gurve namha.

    14. neeraj kumar सितम्बर 7, 2012 at 2:13 अपराह्न

      guru anantkal ko prabhavit karta h.sach h.

    15. prashant nagar सितम्बर 8, 2012 at 5:08 अपराह्न

      guru janmo ko sawarata hai jabki adhyapak sirf jivan

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