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अंधापन आंखों की ज्योति का जाना नहीं है

अंधापन आंखों की ज्योति का जाना नहीं है  

—चौं रे चम्पू! सुनी है कै अमरीका गयौ भयौ है, कौन से शहर में ऐ रे?

—चचा, टैक्सस के डल्हास नामक शहर में हूं, इस शहर में मेरा आना अनेक बार हुआ है। बीस साल से आ रहा हूं यहां। खूब सारे दोस्त और चाहने वाले हैं। अकेला आता था तो किसी न किसी दोस्त के घर ठहरता था। ज़्यादातर डॉ. नन्दलाल सिंह के घर। वे भारत गए हुए हैं, ये जानकर ज्योति और अशोक ने काफी आग्रह किया कि उनके घर ठहरूं, पर इस बार चूंकि मेरे साथ पूरा परिवार है। इसलिए होटल में रुकना बेहतर लगा। जिस होटल में ठहरा हूं उसमें इन दिनों नेत्रहीनों का सम्मेलन चल रहा है। चचा, आत्मविश्वास और स्वावलम्बन से भरपूर इतने नेत्रहीन मैंने जीवन में पहली बार देखे हैं। अमेरीका के कोने-कोने से आए हुए हैं। शायद कुछ बाहर के देशों के भी हों। किसी के साथ कोई नेत्रवान साथी है, किसी के साथ दीक्षित और वफादार कुत्ता, कोई अपनी लम्बी छड़ी के साथ अकेला है। यों तो धरती का हर मानव अपने आप में एक कहानी है। पर इनकी कहानियों में कहानी के तत्त्व ज़्यादा मजबूत होंगे। इनका जीवन संघर्ष निश्चित रूप से अधिक स्वः व्याघातों से लबरेज रहा होगा। यहां आकर मुझे ऐसा भी लगा कि लोग नेत्रहीनों के मामले में प्रायः अंधे हैं। मेरी भी आंखें खुली की खुली हैं।

—वहां की सरकार ने करायौ का जे सम्मेलन?

–नहीं चचा! एक संस्था है ‘नेशनल फेडरेशन ऑफ द ब्लाइंड’ इसके नेत्रहीन सदस्यों की संख्या अकेले अमरीका में पचास हजार से ज़्यादा है। एक हजार से ज़्यादा तो इस सम्मेलन में ही आए होंगे। लॉबी में, लिफ्ट में, गलियारों में, स्वीमिंग पूल के आस-पास सब तरफ घूम रहे हैं, आ रहे हैं, जा रहे हैं, गा रहे हैं, खिलखिला रहे हैं। इक्का-दुक्का ही मायूस चेहरा दिखता है वरना सबके सब उल्लास और आत्मविश्वास से भरपूर हैं।

–तो का है रयौ है वा सम्मेलन में?

–चचा, मुख्य एक बात है जो अनेक तरह से दोहराई जा रही है कि अंधापन आंखों की ज्योति का जाना नहीं है। असल समस्या नेत्रहीनता के बारे में समझ के अभाव की है, उनके बारे में सूचनाओं की कमी की है। अनेक वक्ताओं का मानना है कि अगर एक नेत्रहीन को सही ढंग से प्रशिक्षण दिया जाए और काम के या रोजगार के अवसर दिए जाएं तो नेत्रहीनता ज़रा सी शारीरिक अक्षमता के अलावा कुछ नहीं है। एक दूसरे से वे बतियाते हुए दिखाई देते हैं।

Hilton Hotel

 

 

 

 

 

 

 

–इत्ते सारे ऐं तो आमने-सामने टकरावैं नाय का?

–नहीं चचा, हरेक के पास एक लम्बी छड़ी है, जो अपने चार-पांच फिट आगे तक का रास्ता छड़ी से टटोल लेते हैं। छड़ी भी इलैक्ट्रॉनिक है, जो सिर्फ राह ही नहीं बताती बल्कि अन्य अनेक सूचनाएं भी दे देती है।

Hilton Hotel

 

 

 

 

 

 

 

–दूसरी सूचना कैसे?

–छड़ी के काफी आगे तक मार्ग में कोई अवरोध होता है तो कुछ विशेष प्रकार की तरंगें उस पदार्थ की उपस्थिति का एहसास करा देती हैं। होटल में इन दिनों सौ दो सौ सहायक कुत्ते भी घूम रहे हैं। ये कुत्ते सामान्य कुत्तों से कहीं ज़्यादा संजीदा, शांतिप्रिय और अपने मालिक की जरूरतों को समझने वाले हैं, उसकी भाषा को समझते हैं। मैंने अपनी आंखों से देखा चचा कि एक नेत्रहीन ने अपने कुत्ते से कहा, ‘एलीवेटर’ और कुत्ते ने उसे लिफ्ट के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया। ब्रेल लिपि में लिखी पुस्तकें भी जगह-जगह रखी हुई हैं। इनकी बातों को सुनना एक रोमांचक अनुभूति है चचा।

Hilton Hotel

 

 

 

 

 

 

 

–तू कौन सी बात ते रोमांचित है गयौ?

–एक नत्रहीन अपने साथी से कह रहा था ‘तरस खाकर सड़क पार कराना ही काफी नहीं है, हमें सफलता की सड़क पर चलाओ, हमारी अक्षमताएं रेखांकित मत करो, क्षमताएं बढ़ाओ, मौका दो, हम कुछ करके दिखा सकते हैं।’

–जे तो बढ़िया बात ऐ!

–एक बड़ा बलिष्ठ सा युवक देखा मैंने, जिसके शरीर पर बहुत सारे टैटू गुदे हुए थे, जाहिर सी बात है वह स्वयं अपने शरीर के टैटू नहीं देख सकता, उसने दूसरे की आंखों की सुविधा के लिए बनवाए हैं कलात्मक टैटू। चचा वो हमारी आंखों का ध्यान रख रहा है तो क्या हम इतने अंधे हो जाएं कि उसकी आंखों के अभाव में उसको सुविधाएं न दें। सोचने की बात ये है कि नेत्रहीन कौन हैं वे या दिमाग से हम। आऊंगा तब विस्तार से बताऊंगा।


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