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अनाचारों के पिताजी हैं भ्रष्टाचार जी

अनाचारों के पिताजी हैं भ्रष्टाचार जी

 

—चौं रे चम्पू! अन्ना के आन्दोलन की ख़ूबी का ऐं रे?

—ख़ामियां नहीं पूछोगे?

—खामी हम सुनिंगे ई नायं! दिल की आग में दिमाग कौ घी मत डार।

—चलो ख़ूबियां बताता हूं। पहली और सबसे बड़ी बात ये है चचा, कि आज़ादी के चौंसठ साल बाद, पहली बार इतने व्यापक स्तर पर, इतना शांतिपूर्ण आन्दोलन हुआ है और हमारे देश के सोच की वह मूल्यवत्ता सामने आई कि हम शांति के प्रवक्ता हैं। विरोध के दौरान नियम तोड़ने की आपाधापी नहीं दिखी। कोई लूटपाट नहीं दिखी। इतनी भीड़ जुट जाने के बाद अपराध अपना ग्राफ ऊंचा करने लगते हैं। भीड़ में जेबकतरे भी घुसे हुए हैं, लेकिन इनकी संख्या बहुत कम है। कुछ का हृदय-परिवर्तन भी हो गया हो सकता है। पुलिस भी शांतप्राय है। बिना हैलमैट के युवा चालकों को अनदेखा कर देती है। तो पहली ख़ूबी है, इस आंदोलन का क़ानून की नज़र में शांतिपूर्ण होना।

—दूसरी ख़ूबी बता।

—दूसरी ख़ूबी है इसका प्रेमपूर्ण होना। पहले आन्दोलनों में लड़कियों की शिरकत इतनी नहीं होती थी। इसमें युवा लड़के और लड़कियां एक मकसद को लेकर निकल आए हैं। संघर्ष के दौरान वे अपने मन की बातें करने के साथ-साथ देश के उपवन की भी चिंता कर रहे हैं। इस स्थल पर वे भ्रष्टाचार को भगाने के पवित्र मकसद से आए हैं, साथ में प्रेमाचार की सम्भावनाएं भी हैं। गा भी लेते हैं, बजा भी लेते हैं और घर की ओर से बंदिश-विहीन हैं। कुछ प्रेम अगर परवान चढ़े और कुछ घर बसे तो आगे चलकर वे याद करेंगे, रामलीला ग्राउण्ड की अन्ना-लीला के साथ अपनी प्रेमलीला। याद कर करके मुस्कुराएंगे कि हम भी इस देश में परिवर्तन लाने की हवा का एक झौंका बने थे। एक मौका हमें भी मिला था, प्रेम और देशप्रेम का। अपवाद यहां भी होंगे क्योंकि बहुत सी मानवकृतियां विकृत भी होती हैं। कुछ दिल टूट भी सकते हैं, लेकिन फिर भी प्रेमतत्व की प्रधानता इस आंदोलन में है। और चचा, प्रेम की प्रगाढ़ता निर्भय बना देती है। न दमन की चिंता न आतंकवाद का ख़ौफ़।

—हां, काऊ के चेहरा पै कोई डर नाएं, सई बात ऐ।

—चचा! अपना प्रेमाचार भी ऐसी ही स्थितियों में हुआ था। सन उन्नीस सौ पिचहत्तर में जब देश में आपातकाल की स्थितियां बन रही थीं। क्रांतिकारी साथियों ने ताने मारना शुरू किया तो मैंने भी उन्हें जवाब दे दिया।

—का जवाब दियौ?

—चार लाइन सुना दीं। ‘मैंने वरण किया। उन्होंने कहा ये मरण है। मैंने कहा, नहीं नहीं! ये क्रांति का ही अगला चरण है।’

—खूब कही! चल, अब तीसरी खूबी बता।

—तीसरी ख़ूबी ये है कि इसमें साम्प्रदायिक सद्भाव और भाईचारा बना हुआ दिखाई दे रहा है। कोई फ़िरकापरस्त जुमला या साम्प्रदायिक हमला या संकीर्णतावादी अमला सामने नहीं आया है। सद्भाव का गमला टूटा नहीं है। इसलिए आतंकवाद भी स्वयं आतंकित है। अडवाणी ज़ी ने बीच में अपना राग अलापा है, पर उसका असर नहीं व्यापा है। सरकार संयम दिखा रही है।

—अगली बात बता।

—अगली बात ये कि परिवर्तनकामी चेतना को लेकर जब युवाशक्ति बाहर निकल आती है तो उसको रोकना असम्भव हो जाता है। माना कि पिछले बीस साल में विचार-शून्यता बढ़ी है, लेकिन आज का युवा सूचनाओं से भरा हुआ है। इंटरनेट युग का ये युवा अपने देश की ही नहीं, पूरे भूमण्डल की गतिविधियों को जानता है। भविष्य-दृष्टि कितनी है और कैसे उसे रूपाकार दिया जाए, इस बात को ये युवा तब सोचेगा जब व्यावहारिक धरातल पर चरण बढ़ाएगा। अभी तो भावना के भाव चढ़े हुए हैं। मीडिया-कर्मी बहुलता में भावुक हैं। अदृश्य चाबुक हैं। भ्रष्टाचार के विरुद्ध लावा फूटता दिखाया जा रहा है। महेश भट्ट और अरुन्धति रॉय को नहीं सुना जा रहा, पर एक बात पर सब सहमत हैं कि अशांति, असमानता, सम्प्रदायवाद, दंगा, आतंकवाद, गुंडत्व, इन सब प्रकार के अनाचारों के पिताजी हैं भ्रष्टाचार जी। वे न रहें तो अमन चैन सुकून हो।

—और बता!

—और क्या चचा? कामना करो कि देश नई तानाशाही या अराजकतावाद की ओर न मुड़ जाए, सर्वदलीय प्रतिनिधि और नागरिक समाज मिलकर अच्छा बिल पास कराएं। हर नागरिक स्वयं को अंदर से काबिल करे। विरोधी दल चुनाव-चुनाव चिल्ला कर महंगाई और भ्रष्टाचार का मार्ग प्रशस्त न कर दें। और क्या!

 

 

 


 


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