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अमित जी के टी वी टी ट्वीट-ट्वीट

अमित जी के टी वी टी ट्वीट-ट्वीट

 

—चौं रे चम्पू! कल्ल बैलन्टाइन डे पै का भयौ?

—चचा! वैलन्टाइन डे पढ़े-लिखे और सम्पन्न समाज का त्यौहार है। कल के दिन सोशल नैटवर्किंग साइट्स के बल्ले-बल्ले रहे। सबने अपने-अपने और एक-दूसरे के वैलंटाइन को विश किया, कार्ड भेजे, शुभकामना संदेश दिए। एसएमएसबाजी भी ख़ूब हुई होगी। ‘हैप्पी वैलंटाइन डे’ तो कोई भीकिसी को लिख सकता है। होली-दीवाली से ज़्यादा ‘हैप्पी वैलंटाइन डे’ के संदेश गए होंगे। टीवीटी ट्वीट ट्वीट हुआ होगा।

—जे टीवीटी टुविट टुविट का भई रे?

—चचा! आपको याद नहीं, सुमित्रानन्दन पंत जी की एक कविता है ‘टी वी टी टुट टुट, बांसों के झुरमुट’। कविता में चिड़ियां बोलती थीं, टी वी टी टुट टुट। आजकल ट्वीट ट्वीट बोलती हैं। …और मुझे तो बड़े स्वीट स्वीट लगते हैं अमिताभ बच्चन। बाई द वे, ‘अमिताभ’ नाम भी सुमित्रानन्दन पंत जीका ही रखा हुआ है। शायद इसी कारण टी वी पर ख़ूब दिखाई देते हैं और पिछले तीन साल से निरंतर ट्वीट ट्वीट कर रहे हैं। उनके नाम से कई ट्वीटर अकाउंट हैं।

लाखों फौलोअर्स हैं, जो नित्य उनके ट्वीट संदेशों को पढ़ते और प्रतिक्रिया देते हैं। अमित जी आनन्द के दिनों में परम आनन्द के औरविषाद के दिनों में प्रोत्साहन के ट्वीट करते हैं। अस्पताल से ट्वीट किया, ‘हां दर्द है पर जीवन में कुछ भी अच्छा इसके बिना उपलब्ध नहीं हो सकता।’ और उनका मानना है कि दर्द जीवन का अनिवार्य अंग है। जो जीवन दर्द से नहीं गुज़रता, उसका भी भला कोई सारहै? चचा! बड़े अच्छे-अच्छे ट्वीट करते रहते हैं।

—और बता… जैसै?

—अपनी बताऊं, सबसे अच्छे तो मुझे वे लगे जिनमें उन्होंने मेरी कविताओं का उल्लेख किया। कविताएं अपने फौलोअर्स को भेज दीं और मेरे बारे में भी उन्होंने प्यार से लिखा ‘फ्रेंड, थिंकर एण्ड पोएट’। अपने प्रति उनका स्नेह मुझे ऊर्जस्वी कर देता है। उनके कुछ ऐसे ट्वीट-संदेश मैं आपको बताता हूं,जो समय समय पर वे करते रहे हैं, जिसमें उनकी मौलिकता और जीवन के प्रति उनके नज़रिये का पता चलता है।

—बता!

—जैसे, ‘अगर कोई तुम्हारी पुकार नहीं सुनता है तो अकेले चलो… दिमाग खोलो, अकेले चलो… डरो नहीं, अकेले चलो… भले वो अंधविश्वास हो,

लेकिन विश्वास तो है! चाहे वो अंधा ही क्यूं न हो।’ अपने पिता के प्रेरक संस्मरणों को भी वे एक-दो पंक्तियों में ट्वीट करते हैं। ट्वीट-644 है : जब मैंस्कूल में पहली बार बॉक्सिंग रिंग में घुसा, ज़ोरदार पंच लगा, ख़ून बहा…. डैड ने इंग्लैंड से बॉक्सिंग पर एक पुस्तक भेजी।’

इस छोटी सी बात के पीछे कितनी बड़ी बात है। हिम्मत नहीं हारनी है। आगे बढ़ना है। अमित जी ऐसा ही करते आ रहे हैं।

याद है आपको सन बयासी में ‘कुली’ फिल्म की एक फाइटिंग सीक्वैंस के दौरान, दृश्य को वास्तविक बनाने की अंतरंग कलाकार-कोशिश के रहते चोट खा गए थे। मेज़ का कोना पेट से टकराया और आंतों से ख़ून बहा था। मौत के मुंह में जाते-जाते बचे थे। देशवासियों ने अपने चहेते नायक के लिए कितनी दुआएं की थीं। इंदिरा जी दौड़ी-दौड़ीअस्पताल गई थीं। अस्पताल के बाहर चाहने वालों की मीलों लंबी कतारें दिखाई देती थीं। अमित जी को शायद पिता की पुस्तक ने उस समय भी सम्बल दिया हो, जिसके बारे में,

इस बार अस्पताल जाने से पहले, इतने साल बाद, अब आकर ट्वीट किया।

—दो हज्जार पांच में ऊं तौ हस्पताल है आए!

—हां, उस दिन का साक्षी तो तुम्हारा चम्पू भी है। सत्ताईस नवम्बर दो हज़ार पांच का सहारा सिटी का कविसम्मेलन। कविताएं सुनकर ख़ूब दाद दी, खुलकर हंसे। स्वयं काफ़ी देर तक मधुशाला सुनाई। अगले दिन छोटी आंतों में इतना दर्द हुआ कि मुम्बई के लीलावती अस्पताल में सर्जरी के लिएतत्काल जाना पड़ गया। दवाएं लगीं, दुआएं लगीं, ख़ुद को तैयार किया और फिर से आ गए केबीसी के बॉक्सिंग रिंग में। कविताएं उन्हें बहुत बल देती हैं। ख़ासकर बाबूजी की कविताएं। उनका ट्वीट 627 है, “ध्वनि साथ लिए जाता हूं, प्रतिध्वनि छोड़े जाता हूं..” ~एचआरबी….। कल उनके एकफौलोअर ने उनके एक ट्वीट को रीट्वीट किया, ‘किसी चीज़ को इतनी बुरी तरह मत चाहो कि अगर तुम्हें न मिले तो दुखी हो जाओ!’

—बिगबी कूं मेरौ आई लब यू संदेसा भेजि दै रे!

 

 


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2 Comments

  1. sir!apke dimaag par sara sansaar vaara h,,,,,
    amit ji k dard ko,kya khub kaagaz utara h…..

  2. Dear Sir
    bahut sahaj ho kar likha hai aap ne ye ..saadhuwaad..

    regards
    yogendra kumar purohit
    M.F.A.
    BIKANER,INDIA

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