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अलबत्ता, घट गई है गुणवत्ता

अलबत्ता, घट गई है गुणवत्ता

 

—चौं रे चम्पू! लौट आयौ कोलकाता ते?

—नहीं चचा, अभी तो एयरपोर्ट पर ही हूं। सामान आ रहा है।

—जब तांईं सामान आवै, बतियाय लै।

—सामान लाने वाली चलपट्टी चल पड़ी है। मेरी निगाहें अपनी अटैची को देखने को तरस रही हैं। सबका आता जा रहा है, मेरा ही रह गया।

आंख उधर ही लगी है।

—मैंनै कान तेरी तरफ लगाए भए ऐं। और बता!

—चचा! अभी एक भारी सी ढकी हुई मूर्ति कन्वेयर बैल्ट पर आ रही थी, बेडौल और बड़ी थी, मोड़ पर संतुलन बिगड़ गया, सो गिर पड़ी। किसी ने कहा मायावती की होगी।

बड़े ज़ोर का ठहाकालगा। भारी भारी सामान लुढ़क जाते हैं। तुम सुनाओ, बगीची के क्या हाल हैं।

—सिगरे पैलवान खुस ऐं। मुलायम तौ कुस्ती के सौकीन ऐं न! अखलेस कूं अच्छे दांव सिखाय दए। देखौ, पैलवान में, चांय बो चुनाब के दंगल में होय, चांय असली अखाड़े में, क्रोध में नायं आनौचइऐ। राहुल भैया कागज न फाड़ते तौ कछू सीट और बढ़ जातीं। अखलेस नै संयम दिखायौ। छोड़, तू कोलकाता की सुना। बड़े दिन लगाय दए।

—होली के आसपास वहां बहुत कविसम्मेलन होते हैं। कवियों के लिए जैसे फसल-कटाई के दिन हों। वहां के कविसम्मेलनों का मूल चरित्र नहीं बदला, दूसरे कुछ बदलाव ज़रूर आए हैं।

—का बदलाब आए लल्ला?

—पहले यहां एक-दो टीम आया करती थीं, जो सुबह, दोपहर और शाम तीन शिफ्टों में कविताएं सुनाया करती थीं। रवीन्द्र भवन, कला मंदिर, महाजाति सदन, कभी किसी विद्यालय में या क्लब में। कवि अच्छी कमाई करके यहां से लौटते थे। एक महाआयोजक, एक गेस्ट हाउस में सारे कवियों को टिका दिया करता था। कवियों के लिए एक रसोईए का इंतजाम होता था, जो उनके लिएमनवांछित भोजन बनाता था। कवि किलोल करते थे। कविताएं वही रहती थीं, श्रोता बदल जाते थे। पर्दा उठता था तो हॉल फिर उतना का उतना भरा हुआ और कवि शब्द-दर-शब्द यथावत शुरू हो जाते थे। इसीलिए यहां के कविसम्मेलनों को कविसम्मेलन न कहकर शो कहा जाता है। मैं समझता हूं कि कविसम्मेलन के लिए शो बहुत सही नाम है। कविसम्मेलन कविता के सम्मेलन नहीं हैं, वे अभिनय-क्षमता-सम्पन्न कवियों की प्रस्तुतियों के मंच हैं। माना कि कविताओं में, उनके शब्दों में दम होता है, वे समय-समाज से जुड़ी होती हैं। श्रोता के मन की बात करती हैं, इसलिए तालियां बजती हैं। तालियों में कोई कंजूसी नहीं होती। दिनभर के काम और थकान के बाद लौटकर सुकून पाने के लिए श्रोता आते हैं। होली की मस्ती की कविताएं सुनना चाहते हैं। लेकिन सारी कविताएं हास्य की हों, ऐसा ज़रूरी नहीं। भारत-पाक सम्बन्धों में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कुछ बोल दिया जाए तो तालियां खूब बजा करती हैं। मैं थोड़ी अलग धारा का कवि रहा हूं। मेरे सरोकार, आप तो जानते हैं, कभी ज़िन्दगी से जुड़ते हैं, कभी गलियों में मुड़ते हैं। लेकिन फिर भी मैं पिछले पैंतीस-चालीस साल के सफर में इस मंच पर खपता चला आ रहा हूं। कुछ अलग सा हूं, कुछ घुला-मिला सा हूं, लेकिन असहज होने के बावजूद सहज होने का प्रयत्न करता रहा हूं।

—बदलाव का आए रे?

—सात-आठ साल पहले मैंने टीवी पर हास्य-व्यंग्य की कविताओं पर आधारित सप्ताह में सातों दिन ‘वाह-वाह’ नाम का कार्यक्रम शुरू किया था। ख़ूब टीआरपी थी उसकी। उसके बाद शुरू हो गएलाफ्टर शो।

अब कविसम्मेलनों पर लाफ्टर शोज़ का साया पड़ गया है। गिने चुने लतीफे या टिप्पणियां हैं। जिसका दाव लगता है सुना देता है।

मूल टिप्पणीकार सिर धुनता है।

पहले लतीफे सुनानेका अधिकार सिर्फ़ संचालक को होता था जो प्रसंगानुकूल लतीफ़ा जड़ देता था, अब सारा काम जड़ा-जड़ाया है। क्या फ़र्क़ पड़ता है कि अपना है

या पराया है। पैसा मिलता है इसलिए लड़ते नहीं हैं।एक शांतिपूर्ण सहअस्तित्व क़ायम है। पैंतीस साल पहले जो टीम कलकत्ता आती थी उसमें अन्य बड़े कवियों के साथ सुरेन्द्र शर्मा,

हरिओम पंवार, और तुम्हारा चम्पू अनिवार्य माने जाया करते थे। तीनों इस बार भी कोलकाता में रहे, लेकिन अलग-अलग टोलियों में हैं। कुल पांच छ: टोलियां हैं। यानी कविसम्मेलनों की संख्या बढ़ी है। कलकत्ता में अलबत्ता, घट गई है गुणवत्ता।

मैं तो चारकविसम्मेलन करके चला आया। वहां दो दिन और चलेंगे। लो मेरी अटैची आ गई चचा!

 


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