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अकादमिक अकड़ का अखाड़ा ऑक्सफोर्ड

—चौं रे चम्पू, तेरी यूके की जात्रा कैसी रई रे?

—चचा सात दिन की यात्रा थी। सात लोग साथ में थे। सातजगह कार्यक्रम हुए। साथ में तुम्हारी बहूरानी भी थी तो ऐसाआनन्द आया जैसे सातवें आसमान पर कोई पहुंच जाए। बताने के लिए सात घंटे चाहिए। लिखने के लिए कम से कम सात अध्याय हों।

—और सात जनमन तक सुनैं तेरी बातन्नैं!

—सात जन्मों की क्या चलाई चचा, चलो अभी सात मिनिट हीकाफ़ी हैं। मुझे सबसे ज़्यादा मज़ा आया

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में, क्योंकि वहां न जाने कितने जन्मोंकी शैक्षिक आत्माएं घूम-विचर रही

 

थीं। भटक रही थीं तो नहीं कह सकता, क्योंकि उनकीउपस्थिति से कोई बेचैनी नहीं हुई। उस इलाक़े में जाकरएक अलग तरह की अकादमिक शांति की अनुभूति हुई।

—अरे हमारे तक्ससिला और नालन्दा कौ मुकाबलौ कोई करसकै का?

—लेकिन जिस दुनिया को हम आधुनिक कहते हैं उसे बनाने मेंइस विश्वविद्यालय का बड़ा योगदान रहा है। अंग्रेजी बोलनेवालों का ये सबसे पुराना विश्वविद्यालय है। अजब तरह कावातावरण है। पूरा शहर जैसे किताबों में, शब्दों में और ज्ञान-विज्ञान में भी डूबा हुआ है और बीयर की दुकान पर चुस्की भी लगाता है।

—बीयर की दुकान?

—हां चचा, एक बड़ी दिव्य बीयर की दुकान देखी मैंने। बहुतपुरानी! सौ डेढ़ सौ साल से ज़्यादा पुरानी। छोटी सी जगह,पुराना फर्नीचर। कोई कुर्सी टूट भी जाती है तो नई कुर्सीबिल्कुल पुरानी जैसी ही बनाई जाती है। एक छोटा सा कमराहै जिसकी दीवारों और छतों पर फ्रेमबद्ध टाइयां टंग रही हैं।

—टाइयां! कैसी टाइयां रे?

—उन विद्यार्थियों की जो यहां से पढ़कर गए हैं। जाते-जातेनिशानी बतौर पब को अपनी टाइयां भेंट कर गए। हज़ारों टाइयां हैं। जिसकी टाई है, एक पर्ची पर उसका नाम भीनत्थी है। आज की नहीं हैं, सौ-पचास साल पुरानी हैं। भदरंगहो गई हैं। जिन कागज़ों पर नाम लिखे हैं, वे पीले पड़ चुकेहैं। लेकिन एक मधुर सा अहसास तो होता है कि ये हज़ारोंहज़ार टाइयां जिन गलों में बंधी होंगी, वे गले यहां स्वयं कोतर करने के लिए ज़रूर आते रहे होंगे। इस स्थान से उनकाप्रेम रहा होगा। पश्चिम की ये बात मज़ेदार है कि वहांपढ़ने-लिखने के गम्भीर काम को भी जीवन के रंग औरउत्साह के साथ किया जाता है। पूरा शहर पुरानी और भव्यइमारतों से सम्पन्न है। घुमाने वाले ने भी एक एक बातबारीकी से बताई।

—कौन्नै घुमायौ?

—एक हैं वहां पद्मेश जी। बिजनेस कॉलेज चलाते हैं। जिसभवन में उनका कॉलेज चलता है, वह उन्नीस सौ आठ मेंबना था और ऑक्सफोर्ड के मुख्य बस अड्डे के सामने है। वोहमें वहां की गलियों में घुमाने ले गए। ऑक्सफोर्ड की गलियांहमारी ज़ामा मस्ज़िद की गलियों की याद दिलाती हैं। पतलीसी गली घूमते-घामते पता नहीं कौन से कॉलेज में निकलजाएगी। उस कॉलेज में अन्दर जाओ तो दिव्य हरी घास काएक आंगन होगा और उसके चारों तरफ कक्षाएं। आपअनायास कहीं घुस न जाएं इसलिए कई जगहों पर बोर्ड लगे देखे— ‘प्राइवेट’। यानी, किसी का निवास है। निवास के पासही अध्ययन केन्द्र हैं, पुस्तकालय हैं, चर्च हैं। इतिहास विभागके सामने से गुज़रा तो मुझे ई.एच.कार की याद आई। उनकीकिताब ‘व्हाट इज़ हिस्ट्री’ का अब से बत्तीस साल पहले मैंनेहिन्दी अनुवाद किया था।

—अपनी छोड़, व्हां की बता!

—पूरे ऑक्सफोर्ड में ऐतिहासिक स्मृतियों के पुरानेपन की हवा बहती हो जैसे। किताबों के पन्नों और कबूतरों कीफड़फड़ाहट। नीले रंग के कलात्मक पुराने खम्बे जिन परगलियों के नाम लिखे हुए हैं, वे भी नहीं बदले। हर खम्बे केऊपर एक गोलाकर नारियलनुमा गुम्बद-सा बना हुआ है,जिसके नीचे गलियों की ओर इशारा करने वाली पतली-पतलीलौह-पट्टियां हैं, जिन पर स्थानों के नाम लिखे हैं। दुकानें हैं।मकान हैं। ज्ञान है। आपस का सम्मान है। किसी और शहरजैसा हंगामा नहीं है। बसें विश्वविद्यालय का टूर कराती हैं। विद्यार्थी ज़्यादातर साइकिलों का इस्तेमाल करते हैं। एक अलग तरह की अकादमिक अकड़ का अखाड़ा लगा ऑक्स्फोर्ड,जहां सादगी की साइकिलों की लम्बी-लम्बी कतारें थीं।


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