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ऐसी-वैसी बातों से ख़ामोशी अच्छी

ऐसी-वैसी बातों से ख़ामोशी अच्छी

 

—चौं रे चम्पू! चुप्प चौं बैठौ ऐ? भौत देर है गई, कछू बोलै चौं नायं?

—चचा, चुप नहीं हूं, मौन हूं।

—चुप्पी में और मौन में का फरक ऐ?

—चुप रहा जाता है और मौन रखा जाता है। कोई चुप इसलिए रह सकता है क्योंकि साथ में बात करने वाला नहीं है, लेकिन साथ में बहुत सारे लोग हों और फिर भी आप चुप हों तो वो मौन माना जाएगा। मौन साभिप्राय होता है। मौन दरसल चुप्पी नहीं है। यह ज्ञान की एक अलग प्रकार की अभिव्यक्ति है। अधिक बोलने के बाद में बाबा रामदेव ने मौन रख लिया था। ज़्यादा बोलना अच्छा नहीं होता। घुंघरू ज़्यादा बोलते हैं। गले में पड़ा हार बिल्कुल नहीं बोलता और देख लीजिए घुंघरू रहते हैं पैरों में। हार होता है कंठ में।

—तोय ऊंची छोड़िबे की आदत ऐ। अच्छा तो जे बता मौन के कंठहार में कौन सी हार-जीत कौ चिंतन चल रह्यौ ऐ?

—चचा, अभी हमारा हिन्दी अकादमी का सम्मान समारोह हुआ था। पिछली बार हुआ था तो लोग बड़े मुखरित थे। इसबार वे चुप हैं या उन्होंने मौन रखा है। कह नहीं सकता, लेकिन आभारी हूं उनका, जिन्होंने सम्मान स्वीकार किया। मैंने भी जो इतने दिन मौन रखा, वह चुप्पी नहीं थी, साभिप्राय रखा गया था। सम्मान-समारोह में मुख्य-अतिथि थे कवि सीताकांत महापात्र जी। मुझे वो बड़े अच्छे लगते हैं चचा। प्रशासनिक सेवा का लम्बा अनुभव है उनके पास और जितनी कविताएं मैंने पढ़ीं, उनमें मुझे एक बहुत बड़ा कवि दिखाई दिया। भारतीय कविता उत्सव में परिचयदास ने उनकी कविताओं का अनुवाद किया था। हिन्दी वे अच्छी बोलते हैं, उन्होंने दो-तीन बातें अपने उद्बोधन में कहीं।

—बता-बता अच्छी बात सुनिबे के तांईं हम हर बखत तैयार ऐं।

—एक तो उन्होंने हिन्दी की महत्ता को अलग प्रकार से रेखांकित करते हुए कहा कि हिन्दी एक फिल्टर लैंग्वेज है। यानी बांग्ला, असमिया, उड़िया या जितनी भी हमारी दक्षिण भारतीय भाषाएं हैं, उन सबका अनुवाद पहले हिन्दी में होता है, फिर अन्य भारतीय भाषाओं में। बांग्ला से तमिल अनुवाद करने वाले लोग न मिलेंगे। बांग्ला से हिन्दी अनुवादक मिल जाएंगे। हिन्दी से तमिल अनुवादक मिल जाएंगे। तो हमारी भारतीय भाषाओं को एक बार हिन्दी के आंगन में आना ही होगा। तब दूसरे गृह-प्रवेश हो सकते हैं। भाषाओं का आदान-प्रदान कराने में हिन्दी का गलियारा महत्वपूर्ण है। दूसरी बात उन्होंने कही कि हम बोलते बहुत ज़्यादा हैं। भाषणबाजी करते हैं। शब्दों का अपव्यय होता है। खामोशी की महत्ता को भूल गए हैं, जिसके कारण चित्त में स्थिरता नहीं रहती। स्थिरता लाने के लिए खामोश रहना ज़रूरी है। अच्छे साहित्य की निर्मिति खामोशी की बुनियाद पर ही होती है। तीसरी बात उन्होंने कही कि उपभोक्तावादी संस्कृति में विज्ञापनों ने हमारे लिए पहले से ही सब कुछ निर्धारित कर दिया है कि हमें कुछ सोचने की ज़रूरत नहीं है। वे हमारे लिए सब कुछ सोच चुके हैं। जहां भी साहित्य विज्ञापन-संस्कृति से आक्रांत होता है, एकायामी हो जाता है। वह गुंजाइशें नहीं छोड़ता। गुंजाइशों के लिए स्थिरता और मौन ज़रूरी हैं। चचा, मैंने भी अनुभव किया है कि मौन सारे प्रयोजनों का साधन बन जाता है। मौन एक तल्लीनता है। मौन एकाग्रता है। अद्भुत स्थिति रहती है। अगल-बगल का शोर भी सुनाई नहीं देता। सघन रचनात्मकता, जिसमें, जीवन के हाहाकार पर आप चिंतन कर रहे हों एक प्रकार के मौन में ही निकल कर आती है। सही बताता हूं चचा, रेलगाड़ी में खूब सारे यात्रियों के बीच भी जब कई बार लिखने का मन होता है तो मैं लिखता हूं और सचमुच मुझे अगल-बगल का शोर सुनाई नहीं देता। ये तो आपके विचार और संवेदनाओं के आवेग पर निर्भर करता है कि आप भावध्वनियों में डूबे हुए हैं कि अपने अन्दर से आने वाली शब्दध्वनियों तक सीमित हैं, बाहर के शब्द बेमानी हैं, बेकार हैं, निरर्थक हैं। नवाज़ देवबंदी ने बड़ा उम्दा कहा था।

—सुनाए दै, हां, कोई अच्छौ सौ सेर सुनाए दै!

—उन्होंने कहा कि ‘ऐसी-वैसी बातों से तो अच्छा है ख़ामोश रहें, या फिर ऐसी बात कहें जो ख़ामोशी से बेहतर हो।

—भौत खूब!

 


 


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