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ऐसा ऐ न वैसा ऐ सबके पीछे पैसा ऐ

ऐसा ऐ न वैसा ऐ सबके पीछे पैसा ऐ

 

—चौं रे चम्पू! जे डी. के. बोस कौन ऐं रे?

—दोस्त हैं मेरे! देबासीस कुमार बोस। एक्साइज़ में हैं।

—भौत नामीगिरामी ऐं का?

—नहीं तो! सीधे-सादे संतुष्ट और कर्तव्यनिष्ठ सरकारी कर्मचारी हैं। समय पर कार्यालय पहुंचते हैं, समय पर घर लौट आते हैं। आप किस डी. के. बोस की बात कर रहे हैं?

—अरे लल्ला। ऐफैम रेडियो चलायौ। गानौ सुनौ डी. के. बोस, डी. के. बोस!

—अब समझा! गाने में डी. के. बोस नहीं है। बोस डी. के. हैं। और ये बोस डी. के. मेरे दोस्त नहीं हैं। क्योंकि ये कोई नहीं हैं। मैं अपने दोस्त डी. के. बोस से क्षमा चाहता हूं कि उनके नाम का दुरुपयोग किया गया है। आप सच्ची बताना कि क्या आप उस गीत में डी. के. बोस सुन रहे थे या कुछ और सुन रहे थे।

—गजब की खोपड़ी लगामैं मुम्बई वारे।

—हंसो मत चचा, मेरे सवाल का जवाब दो। क्या आप उस गीत में डी. के. बोस सुन रहे थे?

—अरे हम कोई दुनिया ते अलग ऐं का? जो सब सुन रए ऐं सोई हम सुन रए ऐं। जो सब समझ रए ऐं सोई हम समझ रए ऐं। पर कमाल है गयौ लल्ला, ऐसे गीतन पै अब कोई पाबन्दी नायं रह गई का?

—सेंसर बोर्ड एक पतली गली है चचा। फंस जाए सो फंस जाए, निकलने वाले निकल लेते हैं। अब इस गाने को लेकर बड़ा विवाद है। एफ.एम. की एक रेडियो जॉकी सिमरन सगर्व इस गाने को बजाती हैं और बताती हैं कि गालियां हमारे भारत में ही नहीं विश्वभर के जीवन-समाज में बोली जाती हैं। विदेशी फिल्में जीवन की भाषा से अपनी भाषा को भिन्न नहीं करतीं। यह तो हमारे यहां के दकियानूसी और पुराणपंथी कुंठित दिमाग़ों की ख़लल है। ख़ुद तो सौ बार गालियां बोलेंगे, लेकिन सिनेमा या कला में आ जाए तो आक्रामक हो जाएंगे। श्लीलता और अश्लीलता की बहस आदिकाल से चल रही है और अनंत काल तक चलती रहेगी। पायनियर के सम्पादक चन्दन मित्रा साहब का कहना है कि यह देखा जाना चाहिए कि गाली का प्रयोग किस तरह से किया जा रहा है। फिल्म ‘सगीना महतो’ में दिलीप कुमार पर एक गाना फिल्माया गया था, ‘साला मैं तो साहब बन गया’। यहां साला अपने ऊपर व्यंग्य है। दूसरा गाना है ’पप्पू कांट डांस साला’, यहां डांस न जानने वाले पप्पू पर व्यंग्य है। इसलिए गाली का यह प्रयोग सुरुचि में नहीं आता। आप क्या कहेंगे चचा!

—ज़मानौ बदल रह्यौ ऐ। हमारे यहां तौ ब्याह-सादी में गारी गाई जामैं। होरी पै कैसे-कैसे गाने होयं, उनके आगै तुमारौ डी. के. बोस का बेचै?

—तुम ठीक हो चचा, लेकिन गाली-गायन का एक अवसर होता था, होली या शादी-ब्याह। अब हर दिन, चौबीस घंटे ये गाने रेडियो-टी.वी. पर बज रहे हैं, बच्चे अनुकरण कर रहे हैं और कोई शर्मिन्दगी नहीं है। बच्चे समझेंगे कि इनमें कोई गन्दगी नहीं है। आप इसे ठीक मानते हैं क्या?

—हम तौ बच्चन के संग ऐं। दकियानूसपनौ बेकार की चीज। बदलते जमाने के संग बोली कौ चलन और गीतन कौ चालचलन भूमण्डली है रह्यौ ऐ। गीत-मण्डली पै अंगुरिया मती उठाऔ!

—आपको कौन पुराने ज़माने का कहेगा चचा! हां, ज़माना तो बदला है। मुझे याद है कि उन्नीस सौ तिरानवे में ‘ख़ुद्दार’ नाम की एक फिल्म आई थी उसमें एक गीत करिश्मा कपूर पर फिल्माया गया था, ’सैक्सी, सैक्सी, सैक्सी मुझे लोग बोलें’। अख़बारों में बड़ी बहस चली। सामाजिक दबाव के चलते फिल्म निर्माता को ’सैक्सी, सैक्सी, सैक्सी’ की जगह ‘बेबी, बेबी, बेबी’ करना पड़ा। पिछले दिनों एक फिल्म आई थी ‘दुलारा’ उसमें कहा गया ’मेरी पेंट भी सैक्सी’ और पता नहीं किन-किन चीजों को सैक्सी बता दिया गया। ‘चीनी कम’ में तो एक छोटी सी बच्ची का नाम ही सैक्सी था। यानी, इन पन्द्रह सोलह सालों में ‘सैक्सी’ शब्द से परहेज़ हट गया। पर्दा हटता जा रहा है। परिवार के छोटे-बड़े सदस्य अब अपनी इच्छा-अनिच्छा नहीं रखते। निर्माता द्वारा परोसे गए भदरंग गाने सुनने और ऐसा-वैसा अंतरंग दृश्य एक साथ बैठकर देखने के लिए बाध्य हैं और धीरे-धीरे आदी होते जा रहे हैं।

—लल्ला! ऐसा ऐ न वैसा ऐ, सबके पीछे पैसा ऐ!

 


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