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    अधिक तर्कों से तर्केतआल्लुकात

    —चौं रे चम्पू! आजकल्ल कौ जमानौ तर्क-बितर्क कौ चलि रह्यौ ऐ। हर कोई अपनौ तर्क दैकै दूसरे कूं उखाड़िबे की कोसिस करै है। तू हमाई बात ते सहमत ऐकै नायं?

    —चचा, आप किस संदर्भ में पूछ रहे हैं, मुझे नहीं मालूम, लेकिन तर्क तो वैज्ञानिक सोच को पैदा करने वाला एक सकारात्मक शब्द है। इससे क्या घबराना!तर्क, यानी, जो बात कही जाए उसका कोई आधार होना चाहिए। जो दलील दी जाए उसमें कोई अदृश्य कील नहीं होनी चाहिए। जो युक्ति आप बताओ वह किसी की मुक्ति पर अंकुश लगाने वाली न हो। जो तर्क आप गढ़ो वह किसी व्यूहरचना के लिए न हो। तर्क से ही सिद्धान्त जन्म लेते हैं। इस बात को यों भी कहसकते हैं कि जो तर्क दिया जाए, वह सिद्धांतों पर खरा हो। तर्क का अर्थ स्थापना भी होता है। जो स्थापनाएं आप करें उनके मूल में चीजें सही और सटीकहों। तर्क हेतु को भी कहते हैं। आपने किस हेतु वह बात कही। हेतु अगर गड़बड़ है तो तर्क कुतर्क हो जाता है, लेकिन तर्क को हमेशा सुतर्क होना चाहिए। जोबात कही जाए उसमें दम हो और उस बात को आप आगे तक निभा सकें और कह सकें कि जो बात मैंने कही है वह युक्तिसंगत है। ….लेकिन वही तो नहीं हो पाता चचा। आप बताइए क्यों पूछ रहे थे?

    —अरे लल्ला! हमाए दिमाग़ में तौ पचासियन तरियां की चीज चल्यौ करैं। आजकल्ल तर्क की जगै कुतर्क जादा होमैं।

    —हां होते हैं, क्योंकि युक्ति की जगह अयुक्ति होती है। संगति की जगह असंगति होती है। तर्क भ्रष्ट और मिथ्या प्रकार के गढ़े जाते हैं। लचर और अपूर्णहोते हैं। उनमें कोई महानता होती है न महीनता, हीनता होती है। वितर्क करना भी ग़लत नहीं है। तर्क-वितर्क उसी को कहते हैं कि आप आओ, किसी मुद्दे परबात करो। सामने वाले को समझाओ और स्वयं ग़लत हो तो मान जाओ, लेकिन आपने सही कहा चचा, ज़माना आज ऐसा है कि अगर कोई कुतर्की अपनी परअड़ा है तो वही सबसे बड़ा है। वह अंतहीन कुतर्कों का जनक बन जाता है। वह शब्दाडम्बर पूर्ण व्यूहरचना करता है और वाक्छल से, वाग्जाल से, उलझाव से,लफ़्फ़ाज़ी से और चक्करदार तरीक़ों से स्वयं को

    श्रेष्ठ और सही सिद्ध करने की कोशिश करता है। तर्क का आधार उस पर होता ही नहीं है। तर्क-कुतर्क केकारण कुछ और होते हैं, प्रकट कुछ और करता है। मुझे रह-रह कर मुक्तिबोध याद आया करते हैं। उनकी एक कविता है ‘दिमाग़ी गुहांधकार का औरांगउटांग’।तीन चरणों की कथात्मक कविता है। संभ्रांत कक्ष में लोग बहस कर रहे हैं। वाचक-नायक कहता है, ‘स्वयं की ग्रीवा पर फेरता हूं हाथ कि करता हूं महसूस / एकाएक गरदन पर उगी हुई / सघन अयाल और / शब्दों पर उगे हुए बाल तथा वाक्यों में औरांग-उटांग के बढ़े हुए नाख़ून!!” अंत में प्रश्नवाचक शैली में एक टिप्पणी है, “कैसे सत्य हैं / ढांक रखना चाहते हैं बड़े-बड़े नाख़ून!! किसके लिए हैं वे बाघनख, कौन अभागा वह!!’

    —खूब कही! कुतर्क नैं कित्तेई अभागे माड्डारे!

    —इस कुतर्कण या कुतर्कशीलता में तर्कहीनता ज़्यादा होती है, क्योंकि उसमें स्वार्थपरता समाई होती है। वे तर्क किसी सिद्धांत की स्थापना के लिए नहींहोते बल्कि मिथ्या आरोपण के लिए होते हैं। और यह निरंतर चल रहा है। कोई व्यक्ति विकास करना चाहे तो ऐसे तर्क लाओ कि वह विकास कर ही न सके। अधिक तर्कों से तर्केतआल्लुकात भी हो जाते हैं। लोग भी ऐसे हैं कि कहीं से धुंआ उठता दिखाई दे तो समझते हैं कि आग लगी हुई है। धुंए के पचास कारण होसकते हैं, हो सकता है भोजन पक रहा हो। हो सकता है धुंआ कहीं और से उठा हो और तुम्हारी छत के ऊपर से गुज़र रहा हो और लोग समझें कि तुम्हारे घर में ही आग लगी है या तुम्हीं ने लगाई है। ग़लत तर्कों से अगर आप स्वैच्छिक अर्थ निगमित करेंगे तो वे भ्रमित करते ही हैं। तर्क-परिवार का एक शब्द और हैचचा। सतर्क। सतर्क रहने का अर्थ बिल्कुल अलग है, सावधानी से रहना। सतर्क रहना यानी, कुतर्काधारित आरोपों से स्वयं को बचाना।

    —तौ तू सतर्क भयौ कै नायं?

    wonderful comments!

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