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आत्मघात से बुरी कोई चीज़ नहीं

—चौं रे चम्पू! पिछले दिनन में कौन सी खबर नै तेरौ ध्यान खैंचौ?

—चचा, ख़बरें तो हर दिन देश की, विदेश की, परियों की, परिवेश की और मुहब्बतों के क्लेश की सामने आती ही रहती हैं। अन्ना हजारे अब जंतर पर मंतर चला कर यू.पी. के अनंतर हैं। कलमाडी गिरफ़्तंतर हैं। सांईं बाबा के ऊपर चले जाने के बाद चालीस हज़ार करोड़ पर सबके पेट में मरोड़ हो रहा है। चुनाव हुए, घपले हुए। चारों तरफ़ ख़बरें ही ख़बरें हैं। हां, याद आया चचा, एक ख़बर ने ध्यान खींचा।

—बता वोई तौ पूछ रह्यौ ऊं!

—चचा, एक आदमी ने अपने गले पर चाकू रखकर पुलिस को फोन मिलाया कि मैं आत्महत्या कर रहा हूं। पुलिस आ गई। बड़ी मिन्नतें कीं, भैया दरवाजा खोल दे। चाकू गर्दन से हटा ले। नुकीला है, गला कट जाएगा। वो अड़ गया, नहीं जी, मैं तो मरूंगा। मुझे तो मरना है। समझ में आ गया कि ये आदमी अन्दर से हिला हुआ है। ऐसे बात नहीं मानेगा। खिड़की में एक आदमी ने उसे बातों में उलझाया और किसी तरह से चुपचाप दरवाजा तोड़ कर पुलिस ने उसे धर-दबोचा। ले आई थाने। अब उसका अख़बार में फोटो छपा जिसमें वह एक पुलिसकर्मी के साथ गले मिलकर रोता हुआ दिखाई दिया। पुलिसकर्मी का चेहरा भी विदा होती बेटी के बाप जैसा इमोशनल था। अपराधी और पुलिस गले मिलें, इससे बढ़िया दृश्य क्या होगा, बताओ चचा?

—अपराध का हतो वाकौ?

—अपराध ये कि उसके ग्यारह बच्चे थे। पहली पत्नी तीन बच्चों को जन्म देकर परलोक सिधार गई। जिससे दूसरी शादी करी उसके पास छः बच्चे पहले से थे। हो गए छः और तीन नौ। दो इनकी कृपा से और हो गए।

—कुल्ल ग्यारै! अच्छा फिर?

—ग्यारह बच्चों का लालन-पालन कैसे हो। दूसरी बीबी का सबसे बड़ा बच्चा खाता-कमाता है।  श्रीमान जी ने उससे पैसे मांगे, वो नट गया। एक तो सौतेला बाप ऊपर से पैसा मांगे। बस इसी तनाव में आकर श्रीमानजी ने गले पर छुरी लगा ली।

—तौ जामैं दिलचस्प बात का भई?

—दिलचस्प बात ये हुई चचा कि वो आदमी जो गले पर छुरी लगाकर सबको परेशान कर रहा था, दया का पात्र बन गया। पुलिस-थाने के लोग, जो प्राय: दया नहीं जानते, सबने बड़ी मौहब्बत से उसके साथ फोटो खिंचाया। यानी, पुलिस भी दिलविहीन नहीं होती। मुझे फोटो देखकर मजा आया। पुलिस हमारी कितनी सहृदय है जो ऐसी स्थितियों में, जब आदमी परेशान हो, दिलासा और राहत देती है। ऐसी ख़बरों का कोई फॉलोअप तो होता नहीं कि वो आदमी कहां गया, फिर उसके बेटे ने क्या किया, ग्यारह बच्चों का क्या हुआ, दूसरी बीवी ने उसके साथ क्या सुलूक किया? क्या वो तीसरी की तलाश में निकल गया? बैरागी या भगोड़ा हो गया? क्या हुआ कुछ नहीं पता, लेकिन इस तरह के दुखों के साथ जीने वाले कितने सारे प्राणी हैं। हर प्राणी एक कहानी है और उसमें अगर अंदर घुसो तो कितने ही उपन्यास हैं। मुक्तिबोध कहा करते थे कि मिट्टी के ढेले में भी किरणीले कण-कण हैं। ठेला चलाने वाले में भी अपनी दीप्ति होती है। छः बच्चों की मां को जब वह ब्याह कर लाया था तो कौन जाने कि किसने किस पर उपकार किया। क्या तमन्नाएं रही होंगी? क्या वादे किए होंगे? कितने आश्वासन दिए होंगे? तनाव होता है इस चीज का कि शासन किसका चलता है। जब शासन नहीं चल पाता तब व्यक्ति परेशान हो जाता है और आत्मघाती होने लगता है।

—आत्मघात ते बुरी कोई चीज नायं।

—श्रीमानजी ने तो सिर्फ़ नाटक किया था, लेकिन रोज़गार के अभाव में या परीक्षा परिणामों के तनाव में जो किशोर और नौजवान जीवन से हार मानकर आत्महत्या कर लेते हैं वह सबसे दुखद है। एक कुण्डलिया छंद सुन लो, ’हारो जीवन में भले, हार-जीत है खेल, चांस मिले तब जीतना, कर मेहनत से मेल। कर मेहनत से मेल, किंतु हम क्या बतलाएं, डरा रही हैं, बढ़ती हुई आत्महत्याएं। चम्पू तुमसे कहे, निराशा छोड़ो यारो, नहीं मिलेगा चांस, ज़िन्दगी से मत हारो।

—रिजल्ट आइबे बारे ऐं। बच्चन के ताईं तेरी सीख सई ऐ रे!


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4 Comments

  1. Vinitendra Singh |

    Sir sahi kha aapne. Hum padhai ke dabaav mein aakar uske result se door bhagna shuru kardete hain, sach se muh pher lete hai. Bhool jaate hai ki kya kar sakte hai, aur jo kuch nahi kar paate uske baare mein soch soch kar pareshan rehte hai..

  2. sunita patidar |

    bahut hee dilchasp vakya hai . ise tarah ka kahi nahi pada.

  3. You’re great. katha parampara men vyangya ka itnaa anootha sangam jo ek samayik samasya se hamen rubaru to karata hi hai saath sath ‘kundli ke madhyam se parajay ko vijay men badalne kee seekh bhi deta hai.

    yah shilp aur shaili ashok chakradhar ke hi paas hai. meri abhilasha hai ki hindi men jo achhe vyangya lekhan kaa abhaav ho raha hai uski poorti aap karen. aapka Omprakash Pareek

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