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आपकी समझ में नहीं आ रहा

आपकी समझ में नहीं आ रहा

—चौं रे चम्पू! आसाराम बापू सच्चेई गल्त ऐं का?

—कोई शक है क्या चचा? घोल-घुट्टी बह गई, टाट-पट्टी उठ गई, सिट्टी-पिट्टी गुम गई, पोल-पट्टी खुल गई, योगा और भोगा का अंतर मिटा दिया उसने, अब भी संदेह!

—चौं न होय? देस में इत्ते सारे अनुयाई-भक्त, दरसनन कूं तरसैं हैं, तौ बे सब मूरख ऐं का?

—मुझे आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी चचा। मूर्ख कह कर मैं किसी भारतवासी का अपमान नहीं करना चाहता, पर इतना कहूंगा कि भारत एक भावना-प्रधान देश है।

—सो तौ हैई, पर तेरौ का मतलब ऐ?

—मतलब यह कि भावना-प्रधान रहने पर बुद्धि से काम लेने की गुंजाइश कम रहती है। बुद्धि के सामने प्रपंच नहीं टिकते। अधिकांश साधू कैसे मिलेंगे? ज़िन्दगी केसताए हुए! घर की दुत्कार से या भावनाओं की मार से भागे हुए। कंदराओं में एकांतवास करके मन के विकारों को शांत करते हैं। कुछ होते हैं जो हठयोग से सिद्धियांप्राप्त करके साधना में सफल भी हो जाते होंगे। कुछ जघन्य अपराधी मूंड़ मुड़ा कर या केस बढ़ाकर साधू बन जाते हैं और केस हो जाते हैं फ़ाइलों में बंद।

—सबके बारे में नायं कह सकें!

—चचा आप भी भावुक भंडारी हैं। ये नकली साधू आश्रम बनाकर भोले भक्तों को ठगते हैं। पहाड़ की कन्दरा में क्या लीला हो रही है, कौन जाकर देखे! हैं तो आख़िरमनुष्य ही, लीलाप्रभु। अशरीरी हों तो लीलाएं न हों। पहाड़ पर गए हैं तो पहाड़ पर रहें। उनके आश्रम धीरे-धीरे नीचे उतर कर शहरों में आ जाते हैं। ये आश्रम हैं यासामंतशाही के बन्द किले? कृत्रिम गुफाएं, एकांत साधनाएं। जो तर्क करे उसकी कपाल-क्रिया कर दें। क्या दीक्षा देते हैं ये? तिनका बराबर ज्ञान के बलबूतेकल्पवृक्ष होने का दावा करते हैं। किस्सागोई को प्रवचन कहते हैं। प्रवचन जब घिसने लगें तो भजन गाने लगते हैं। महिलाओं के बीच जाकर नाचने लगते हैं। कपोल-कल्पित अवधारणाएं, बेतुकी कहानियां और फ़ालतू फैंटेसियों के आधार पर जनता के विश्वास में एक प्रकार का अन्धत्व ले आते हैं। भावुक भक्त की आंखों मेंअज्ञान की झाईं पड़ जाती हैं। फिर उसे नहीं दिखते ज़मीनों के अवैध कब्ज़े, पैसे की हवस, यौन-विकृतियों के लिए हथकंडे, दलाली के प्रपंच। कौन सा अपराध है जो येनहीं करते? सरेआम धर्म की दुकान लगाए बैठे हैं और दुकान का धर्म होता है धंधा। चचा, सबसे बुरी बात क्या है जानते हैं?

—बता?

—पुलिस, प्रशासन, नेता सबके लिए ये दलाली का काम करते हैं। आस्था के नाम पर अन्धविश्वासों का ऐसा मायाजाल खड़ा करते हैं कि अच्छे-अच्छे बुद्धिजीवी भी दंडौती करने लगते हैं। महिलाएं टसुए बहाती हैं। भक्तों की समझ की अपरिपक्वता ऐसे लोगों के भौतिक विलास का साधन बन जाती है। धीरे-धीरे अरबों-खरबों कीसम्पत्ति अर्जित कर लेने वाले ये बाबा, तेल, मंजन, साबुन, अचार, मुरब्बे, च्यवनप्राश, दवाइयां और कपड़ों से लेकर गंडे, ताबीज तक सब बेचते हैं और सुपर धन्धाकरते हैं।

—अबहिं तलक आसाराम बापू जी कौ कछू सिद्ध तौ भयौ नायं?

—चचा, सिद्ध हो या न हो, लेकिन सत्य तो सामने आकर ही रहेगा। ये अकेला नहीं है आपका आसाराम, जिसके लिए इतने आदरसूचक शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं। ऐसे सैकड़ों, हज़ारों साधु इस भावनापूर्ण भोली जनता के दिलो-दिमाग़ को कुंद किए हुए हैं। आसाराम की दबी-ढकी दानवी कहानियां उनके सहयोगी शिवा के ज़रिएधीरे-धीरे खुल रही हैं।

—हमें तौ जे बता इत्ती जनता चौं जाय इनके पास?

—अरे, मैं आपको इतनी देर से समझा रहा हूं, आपकी समझ में नहीं आ रहा। ये एक अलग प्रजाति के जंतु हैं। इनमें एक शांतिपूर्ण सहअस्तित्व है। सभी की दुकानेंचल रही हैं। प्रतिस्पर्धाएं हैं, लेकिन आपस की मारकाट नहीं है। ये अपनी निन्दा करने से भी नहीं चूकते हैं, आत्म-प्रवंचना करते हैं, ख़ुद को सताते हैं और फिरअपनी ही पूजा कराते हैं। भक्तों से जो मोटी रकम ये ऐंठते हैं, जितने घिनौने कृत्य हैं इनके, उसका आप अन्दाज़ा भी नहीं लगा सकते। काला धन, काले कारनामे, कालीकरतूतें, सब कुछ काला ही काला। हमें चाहिए बुद्धि का उजाला, पर भारत तो जी एक भावना-प्रधान देश है। यहां बुद्धि का प्रवेश थोड़ा सा वर्जित है। बात इत्ती सीहै बस।

 


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