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समय की सुन भी लो आवाज़

—चौं रे चम्पू! कोऊ नयौ ताजौ अनुभब ऐ तेरे पास?

—अनुभव तो हर पल, नित-नवीन होते रहते हैं, लेकिन कल रात की बात बताता हूं। निमंत्रण-पत्रों पर पते लिख रहा था। पता ही नहीं लगा कि सात-आठ घंटे कैसे बीत गए। मध्यरात्रि हो गई। अचानक सन्नाटा मुझे अखरने लगा। ऐसी भी क्या शांति! फिर सोचने लगा कि क्या था जो अभी थोड़ी देर पहले तक इस सन्नाटे को काट रहा था। अचानक घड़ी की तरफ देखा, सैकिण्ड की सुई आगे नहीं बढ़ रही थी और उसकी खट-खट की आवाज़ बन्द हो चुकी थी, लेकिन सैकिण्ड की सुई अटकने के बावजूद आगे बढ़ने को तड़प रही थी! जैसे रेत में कोई मछली तड़प रही हो। मेरे साथ पवन और राजीव भी काम में लगे हुए थे। हम तीनों घड़ी को देख रहे थे। मुझे लगा जैसे समय गूंगा हो गया है और चीखने की कोशिश कर रहा है। राजीव ने घड़ी का बैटरी सैल ढूंढ कर बदल दिया तो टिक-टिक फिर शुरू हो गई और हम समय की आवाज़ सुनने लगे। फिर पिताजी की एक कविता याद आई जिसका शीर्षक है ‘समय की सुन भी लो आवाज़’।

—हां, उनकी कबता जरूर सुना। उनकी कबता हमें बड़ी अच्छी लगैईं।

—कविता कुछ इस तरह थी कि सोच होता है मुझको आज कि मैं भी हूं कितना नादान, कि अब तक भी न सका यह जान, किए जिस पर न्यौछावर प्राण, वही बन गया मुझे पाषाण। समय को लूट रहे जो, सुनें, न ज़्यादा ताने-बाने बुनें। समय सबकी सांसें गिन रहा। समय छिन-छिन करके छिन रहा। बहुत मंसूबे नहीं गढ़ो, समय से हरगिज़ नहीं लड़ो, समय से कोई लड़ा नहीं, समय से कोई बड़ा नहीं।

—भौत अच्छी कही लल्ला! उनकी तौ बात ई निराली हती। कह्यौ ऊ करैं कै पुरुस बली नहिं होत है, समै होत बलबाल। समै ते लड़ौगे तौ समै बारै-बाट कद्देगौ।

—बारह-बाट वाला मुहावरा इसीलिए बना होगा कि यदि समय नाराज़ हो जाए तो उसके बारह के बारह बाट तुम्हारा यश-वैभव सब तोल कर ले जाएंगे। पिताजी ने कहा था कि ‘कभी था पत्थर का भी समय, कभी पत्थर भी होता समय, कि यूं होता सब ही का समय, किसी का भी क्या हुआ समय? समय है वृक्ष, समय है फूल, समय फल और समय ही बीज। समय के प्रति मत निष्ठुर बनो, समय है बड़े काम की चीज़।’ आज बारहवें साल के बारहवें महीने के बारहवें दिन, बारह बज कर बारह मिनिट बारह सैकिंड पर समय किसी को बारह-बाट न करे, सबकी पौ-बारह हो जाए, ऐसी कामना करनी चाहिए।

—उनकी कबता खतम है गई का?

—नहीं, लम्बी कविता है। मुझे भी टुकड़ों-टुकड़ों में ही याद है। उन्होंने कहा ‘गुज़ारो अब तुम ऐसा समय, कि आगे आने वाला समय, याद रक्खे तुमको हर समय, शाद रक्खे तुमको हर समय। समय को नहीं चाहिए ख़ून, उसे दो हंसते हुए प्रसून, उसे मत वारा-न्यारा दो, दे सको, भाई-चारा दो… तो चचा! बड़े पॉज़िटिव थिंकर थे पिताजी।

—जामें का सक! पर समै पै जो समै कौ काम नायं करै, समै वाय कबहु माफ नायं करै।

—बस इसीलिए मैं भी लगा रहता हूं चचा। कल रात लग रहा था कि निमंत्रण-पत्र लिखने से बड़ा कोई काम नहीं है, क्योंकि जिसका पता आप लिख रहे होते हैं, वह आपके सामने उस घड़ी साकार हो जाता है। सिर्फ़ वही साकार नहीं होता, उससे और आपके पुराने रिश्ते भी साकार होने लगते हैं। उसका पूरा इतिहास, उसके साथ किया गया हास-परिहास, उसके साथ चलते हुए रास्ते में रौंदी हुई घास, उसके साथ कब हंसे कब रहे उदास, सब याद आता है। और ये तो है ही कि जो दिन गुज़र गए वे वापस नहीं आते। बाकी घड़ी की टिक-टिक को कौन गिनता है। घड़ी भी नहीं जानती कि तुझे किस बात की चिंता है। ध्यान दो तो टिक-टिक सुनाई देती है वरना कान उसे अदेखा कर देते हैं।

—ठीक ऐ लल्ला! निमंत्रन-पत्रन कौ काम पूरौ है गयौ का?


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