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शेखर सेन एक आदमी की अकादमी

–चौं रे चम्पू! सुनी ऐ कै सेखर सैन के नाटकन में भौत भीर आय गई| लोग नाराज है कै लौटे का?

–अब चचा इसका निदान क्या हो! हिन्दी अकादमी में ऐसे कार्यक्रम भी होते रहे हैं जिनमें श्रोताओं को इकट्ठा करना एक समस्या रहती थी। नाश्ता कराओ, चाय पिलाओ, फिर मनुहार करो कि इस सौ-सवा-सौ के हॉल में ऐसा न लगे कि खाली है। अकादमी ने सेमिनार-चर्चाओं के स्थान पर इस बार नाटकों पर ज़ोर दिया और यह सिद्ध हो गया कि लोग अपने साहित्य के लालित्य के नदीदे हैं। उन्हें चाय-नाश्ता नहीं चाहिए, उन्हें चाहिए कुछ ऐसा जो उनके हृदय की ज्ञान-क्षुधा-पिपासा को शांत कर सके। शेखर सेन ने भी कमाल ही कर दिया।

—ऐसौ का कमाल भयौ रे?

—सूर, कबीर, तुलसी हमारे भक्तिकाल की वृहत्रयी है। अगर कोई व्यक्ति दो घंटे की अवधि में एक-एक कवि के जीवन और कृतित्व की पूरी झांकी दिखा दे तो क्या कहेंगे आप! शेखर सेन गुणी हैं। उनका परिचय देते हुए मैंने कहा था कि हमारे यहां हिन्दी अकादमी है जो भाषा और साहित्य देखती है, साहित्य अकादमी साहित्य के लिए समर्पित है और संगीत-नाटक अकादमी प्रस्तुतियों को देखती है, लेकिन एक अकादमी ऐसी है जिसे एक आदमी ही चलाता है, वे हैं शेखर सेन! जिन्हें भाषा, साहित्य, संगीत, नाटक सबका ज्ञान है। एकाभिनय करते हैं, गायक बहुत अच्छे हैं, भाषा और साहित्य पर शानदार पकड़ है। कोई भी आदमी चमत्कृत हो उठेगा। दो घंटे की धारासार रस-वर्षा! सुरीले कंठ की गायकी। प्रकाश और संगीत के साथ उनका अद्भुत तालमेल। जादुई प्रभाव डाल देते हैं शेखर सेन। चारों दिन दिल्ली के साहित्यप्रेमी परितृप्त होकर गए। जो नहीं देख पाए उनसे माफ़ी मांगने के अलावा क्या किया जा सकता था, लेकिन हॉल में जो अंदर आ सके वे साहित्य के प्रेमीजन थोड़े सुसंस्कृत भी होकर लौटे।

–सो कैसे लल्ला?

–अरे चचा, अगर बीच में कोई मोबाइल फोन बज जाता था तो शेखर सेन अचानक अपनी प्रस्तुति रोक कर शीश झुकाए हुए बड़ी अदा के साथ मूर्तिवत खड़े हो जाते थे। पहले तीनों दिन मोबाइल बजते रहे और वे अपनी प्रस्तुति रोकते रहे। चौथे दिन सबसे ज़्यादा दर्शक थे, लेकिन वे इतने दीक्षित हो चुके थे कि एक भी मोबाइल नहीं बजा। प्रस्तुति निर्विघ्न हुई।

–तू नाटकन की ख़ास बात बता!

–ख़ास बात ये रही कि शेखर सेन ने तीनों कवियों के आत्माख्यान के तौर पर अपने नाटकों की संरचना की। कवि की रचनाओं का प्रयोग करते हुए कहानी का ताना-बाना बनाया। कवियों के पद, साखी, सबद, रमैनी, सवैया और दोहा-चौपाई गाए, समकालीन कवियों से भेंट के बहाने उनके भी गीत गाए। तीनों नाटकों में ये तीनों महाकवि स्वयं अवतरित हुए और तीनों ने अपनी बाल्य अवस्था से अंत तक की कहानी सुनाई। मां के प्रति रागात्मक लगाव का अच्छा इस्तेमाल किया गया। ऐसे दृश्यों का निर्माण किया कि लोग रोए भी और हंसे भी। चचा! चार दिन चार नाटक, पूरे नाटक याद रखना और संगीत और प्रकाश के साथ उसका तादात्म्य बिठाए रखना चमत्कारी बात थी। हर गेटअप में भव्य लग रहे थे शेखर सेन।

–अब जे बता कै तोय का चीज अच्छी नायं लगी?

–सब अच्छा था चचा! वात्सल्य तो भरपूर था, पर शृंगार की कमी खली। मां या धाय मां से अगाध प्रेम रखने वाले तीनों कवि स्त्री से भागते हुए दिखे। आराध्य के प्रति श्रवणं, कीर्तनं, स्मरणं, पादसेवनं, अर्चनं, वंदनं, दास्यं, साख्य और आत्मनिवेदन तो अभिव्यक्त हुए लेकिन रति और लास्यं नहीं। ऐसा तो हुआ नहीं होगा कि ‘भ्रमरगीत’ के गायक सूर ने प्रेम नहीं किया हो। तुलसी की रत्नावली की फटकार का प्रसंग ही काफी था क्या? ‘हमन हैं इश्क़ मस्ताना’ गाने वाले कबीर के इश्क़ का क्या हुआ। भले ही गृहस्थ छिन्न-भिन्न हुआ हो पर इन सभी ने कभी न कभी प्रेम तो किया होगा, उस प्रेम की निदर्शना कहां हो पाई? मसि कागद के बिना प्रभु के रास तो रचाए, पर अपने?

—जेई तौ रासेखोरी की बात ऐ लल्ला! हमाए देस में त्याग बड़ी चीज मानी गई ऐ। और ‘माया महा ठगिनि हम जानी’। ‘राम ते अधिक राम कर दासा’ है गए तौ मरजादा रखनी परैगी कै नायं! खैर, फिरकित्ती हौंयं जे नाटक तौ बतइयो!


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