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रांझणा प्रपंचहीन प्रत्यंचा वाला धनुष

—चौं रे चम्पू! कोई फिलम देखी का?

—देखी। रांझणा! तारीफ़ सुनी थी। रेल में एक सहयात्री ने कहा था कि फिल्म अच्छी है। एक कवि-मित्र ने कहा कि मध्यांतर तक अच्छी है। एक कम्प्यूटरकर्मी ने कहा कि एक बार देखने लायक अच्छी है। तीन विश्वसनीयों ने कहा कि वाकई अच्छी है। अगर किसी एक ने भी कहा होता कि अच्छी नहीं है तो मैं सोचता कि इससे तो कुछ और ही काम कर लूं। जब तक मैं निश्चिंत नहीं हो जाता कि कोई फ़िल्म सचमुच अच्छी है, मैं हॉल तक जाता नहीं हूं चचा!

—तौ अच्छी निकरी कै नायं बो फिलम?

—ये सवाल बड़ा टेढ़ा है। मैं सिर्फ़ अच्छी कह कर उस फ़िल्म का अपमान नहीं करना चाहता। ’रांझणा’ मध्यांतर तक बहुत-बहुत-बहुत-बहुत-बहुत अच्छी थी। मध्यांतरोत्तर फ़िल्म के मूल्यांकन में ‘बहुत-बहुत-बहुत-बहुत-बहुत’ की विशेषण-माला निकाल दो तो कह लो, अच्छी थी। एक ‘बहुत’ को अगर एक स्टार मान लें तो मध्यांतर के बाद बिना स्टार के अच्छी थी। मध्यांतर से पहले फाइव स्टार अच्छी थी।

—’रांझना’ पंजाबी-हिंदी में ई का?

—सोचा तो मैंने भी यही था कि रांझणा पंजाब की कहानी होगी, लेकिन इस फ़िल्म का रांझणा तो अलग ही पृष्ठभूमि का था। बनारस निवासी एक तमिलमूल पंडित का पुत्र। कहते हैं कि रांझा बहुत सुन्दर था, हीर उसके रूप पर मरती थी, लेकिन इस रांझणे में तो सौंदर्य जैसा कुछ था ही नहीं। ये तो मौहल्ले-पड़ौस का ऐसा सादा सा लड़का था, जैसे तुम्हारी बगीची पर आते हैं। तुम्हारी बगीची ब्रज की बगीची है, वह समझो बनारस के किसी अखाड़े से निकलकर घाट पर आ गया हो। बनारस के घाट मैंने देखे हैं चचा, और बड़ी बारीक़ी से देखे हैं।

—चौं बारीकी ते चौं देखे?

—सन नब्वै के क़रीब जब दूरदर्शन ने धारावाहिक बनाने के लिए निर्माता-निर्देशकों से प्रस्ताव आमंत्रित किए थे तो मैंने ‘भारतेन्दु हरिश्चन्द्र’ शीर्षक का प्रोजैक्ट डाला था। उस दौरान ख़ासा शोधकार्य किया था। छब्बीस एपिसोड की कहानी बनाई थी और बनारस के अनेक चक्कर काटे थे। बाद में बना नहीं पाया, क्योंकि स्पॉन्सर्ड श्रेणी में पास हुआ था। स्पॉन्सर कहां से लाते? अपने पास तो कहानी थी, क्रिएटिविटी थी, मार्केटिंग ज्ञान तो था नहीं! ख़ैर जी, ठठेरा बाजार से शिवाला तक बनारस छान मारा। सौ से ज़्यादा घाट है वहां। हरिश्चन्द्र, कबीर, मणिकर्णिका, असी, दशाश्वमेध, और भी न जाने कितने घाटों पर कितनी ही शामें बिताईं। वही बनारस जब कुंदन बने धनुष के ज़रिए दोबारा बारीक़ी से देखा तो मन तीर जैसा होने को होने लगा कि फिर से बनारस पहुंच जाऊं और उस मस्ती को महसूस करूं जो धनुष जैसे अलमस्त युवाओं के प्रेम में बसती है। अपने प्रथम दर्शन में वह सुन्दर क्या, कुरूप लग रहा था। बॉलीवुड का हीरो बनने योग्य तो किधर से भी नहीं। न उसकी एब्स हैं, न वह कमीज़ उतार रहा है, न उसके डोले-शोले हैं। यानी सौन्दर्य का कोई एक मानक भी तो नहीं जिस पर वह खरा उतरे, लेकिन जैसे ही उसने अभिनय का पहला क़दम रखा और अपनी सहजता के सौन्दर्य का अभियान छेड़ा, वैसे ही वह सुन्दर लगने लगा चचा। प्रपंचहीन प्रत्यंचा वाला धनुष। बॉलीवुड निर्माताओं के लिए सुन्दरता की परिभाषा बदल दी उसने।

—सुन्दर कौन ऐ, तू बता!

—सुन्दर वह है चचा, जो मन को भाए। दिलों को मोहित कर ले। सिर्फ़ बाहरी रूपाकार से नहीं, आंतरिक हृदय-झंकार से। साहित्य में रस और ध्वनि सिद्धांत इसीलिए चले क्योंकि अन्दर के सौन्दर्य पर निर्भर थे। अंगूर के अन्दर से जो बाहर छलकता है, घंटे की ध्वनि के बाद जो देर तक गूंजता रहता है, वह आंतरिक है। अलंकार ऊपर से धारण किए जाते हैं। नायिका सोनम कपूर ने भी कोई आभूषण नहीं धारा। मुझे वह भी बहुत अच्छी लगी। आख़िरकार, अनिल कपूर जैसे मंझे हुए अभिनेता की पुत्री है। अभिनय में दीक्षित है। फ़िल्म आपको ज़रूर देखनी चाहिए चचा। मैं तो कहूंगा कि अपने अखाड़े पर धनुष को बुला लो। आ भी जाएगा, सहज सा बच्चा है। मध्यांतर के बाद उसका खुद का मन जे.एन.यू. की राजनीति की थोथी पैरोडी में नहीं लग रहा था, लेकिन राझंणा के प्यार का निनाद तो अब तक गूंज रहा है।


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  1. Sahi Baat hai… 🙂

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