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मैं धारक को वचन देता हूं

—चौं रे चम्पू! कोई ऐसौ समाचार है तेरे पास जामैं सुख ऊ होय और दुख ऊ होय?

—अब यों तो हर समाचार के दो पहलू होते हैं चचा! एक समाचार किसी को सुख देता है तो किसी को दुख दे सकता है। जैसे चोरी के समाचार से जुड़े सुख-दुख हैं। जिसने चोरी की वह सुखी, जिसकी चोरी हुई वह दुखी। चोर अगर पकड़ा जाय तो सुख-दुख उल्टे हो जाएंगे।

—अरे हम चोरी-चकारी की बात नायं कर्रए! ऐसौ समाचार बता जाते हमैंई सुख मिलै, हमैंई दुख मिलै।

—कल का समाचार था कि रिज़र्व बैंक के गवर्नर डी. सुब्बाराव ने वित्तमंत्री पी चिदम्बरम से मुलाक़ात की। उनकी चिंता का विषय था, डॉलर के मुक़ाबले रुपए में गिरावट। इस गिरावट को थामने के लिए उन्होंने अपने फैसले से अवगत कराया कि बैंक अठारह जुलाई को बारह हज़ार करोड़ रुपए मूल्य की सरकारी प्रतिभूतियों को बेच देगा। अब तुम बताओ चचा, तुम्हारी बगीची के भभूतियों को प्रतिभूतियों से क्या सरोकार। एक तो वे इस समाचार को पढ़ेंगे नहीं, पढ़ भी लेंगे तो सुखेदुखेसमेकृत्वा, सुख-दुख से ऊपर। जो अर्थशास्त्र को थोड़ा-बहुत समझते हैं, सुखी भी होंगे और दुखी भी। इस बात को लेकर खुश हो सकते हैं कि रुपया मज़बूत होगा और दुखी हो सकते हैं कि लो टेंट के तो बारह हज़ार करोड़ गए।

—नोट पै तौ इनईं के दस्कत होंय ना, सुब्बाराव के?

—हां चचा! अंग्रेज़ी के हस्ताक्षर तो समझ में नहीं आते, हिंदी में पठनीय हैं, दु. सुब्बाराव। इनकी ही ओर से लिखा रहता है, मैं धारक को ‘इतने’, यानी जितने का नोट हो उतने, रुपए अदा करने का वचन देता हूं।

—इत्ते रुपइया में इत्ती चीज आमिंगी, जे बचन कौन देगौ?

—यह वचन जो सरकार दे सकती होती वह अजर-अमर रहती। पिछले दिनों का एक समाचार और बताता हूं चचा जिससे मुझे सुख भी मिला दुख भी हुआ।

—बता!

—समाचार था ‘पांच शहरों में शुरू होंगे प्लास्टिक के नोट’। इन्हीं सुब्बाराव जी ने एक बिजनेस स्कूल के भाषण में कहा था कि रिजर्व बैंक ने कागज के नोट के जल्दी ख़राब होने की समस्या को देखते हुए प्लास्टिक के नोट जारी करने का फैसला लिया है। यह प्रयोग पांच शहरों कोच्चि, मैसूर, जयपुर, भुवनेश्वर और शिमला से शुरू किया जाएगा।

—जेई पांच सहर चौं चुने?

—शायद इन शहरों में नकली नोट बनाने वाले आपराधिक अड्डे न हों। ज़ो हो, बैंक इन शहरों में चलन के लिए दस रुपए के एक अरब नोट जारी करेगा। रिजर्व बैंक को हर साल दो लाख करोड़ रुपए के गंदे-संदे या कटे-फटे नोट चलन से हटाने पड़ते हैं। प्लास्टिक के नोट आ जाएंगे तो सुब्बाराव जी को हर साल इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ेगी।

—सुब्बाराव की छोड़, तू अपने सुख-दुख बता।

—प्लास्टिक के नोट मैंने पहली बार ऑस्ट्रेलिया में देखे थे, फिर सिंगापुर में। मैं अत्यंत प्रभावित हुआ। सुख यह कि दीर्घजीवी होते हैं आसानी से कटते-फ़टते नहीं, दुख यह कि ताप या भाप नहीं झेल सकते, झुलस जाते हैं या चिपक जाते हैं। सुख यह कि साफ़-सुथरे रहते हैं, गंदे हो जाएं तो साफ़ हो जाते हैं, दुख यह कि तुड़ी-मुड़ी करके नेफ़े में नहीं रख सकते। कितने भारतीय हैं जो अपने साथ पर्स रखकर घूमते हैं बताओ! सुख यह कि एक हिस्सा पूरी गड्डी में आर-पार देख सकते हो, दुख यह कि इनमें कोई महक नहीं। सुख यह कि कड़क और इकसार रहने के कारण लेन-देन में मज़ा आता है, दुख यह कि नया नोट देने-लेने का मज़ा गया। काका हाथरसी जी का प्रिय शौक था नए नोट बांटना। नए और पुराने के मामले में सुब्बाराव अपने वचन से नहीं फिर सकते, पर नए नोट की बात ही कुछ और है। सुख यह कि गिनना आसान है और दुख यह कि हाथ से बड़ी जल्दी फिसल जाते है। एक और बात है। कोई मुझसे बड़े नोट पर औटोग्राफ़ मांगता था तो मैं मना कर देता था, हां दस के नोट पर कर देता था। अब प्लास्टिक के नोट पर ऑटोग्राफ़ कैसे दूंगा!

—परमामैंट मारकर ते कर। एक नोट पै करैगौ तौ पूरी गड्डी में दीखैगौ।


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  1. —परमामैंट मारकर ते कर। एक नोट पै करैगौ तौ पूरी गड्डी में दीखैगौ।
    Hahahahhaa.. Kya maara hai..

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