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बिना छत की हवेली की विरासत

—चौं रे चम्पू! कोई चांदी की मूंठ वारी छड़ी है तेरे पास?

—अभी तो अस्पताल वाली बैसाखी ही है, उसी के सहारे कल राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के लम्बे गलियारों को पार करता हुआ मध्य लॉन्स तक पहुंचा। रिपर्टरी कंपनी का नाटक ‘विरासत’ देखने। पर नाटक देखते हुए लग रहा था कि घर के मुखिया भास्कर के हाथ में एक चांदी की मूंठ वाली छड़ी हो सकती थी, या नहीं भी हो सकती थी, क्योंकि नाटक के परिवेश में क्षरित होते सामंती जीवन-मूल्यों की कसक तो थी, चांदी की मूंठ वाली ज़मींदाराना ठसक नहीं थी।

—और बता नाटक के बारे में।

—चचा मराठी नाटकों की समृद्ध परंपरा में महेश एलकुंचवार एक महत्वपूर्ण नाम है। एक दर्जन से ज़्यादा नाटक लिखे हैं उन्होंने। ’विरासत’ एक ऐसी महागाथा है जिसमें ट्रांज़िस्टर युग के शहर और गांव के ट्रांज़ीशन को बखूबी दिखाया गया है। तो समझिए, ये दास्तान है बीसवीं सदी के छठे, सातवें आठवें दशक की। महानगरों में टेलीवीज़न आ चुका था लेकिन महाराष्ट्र के धारणगांव के देशपांडे कुनबे में विज़न का टेलिस्कोपिक क़ायदा नहीं था। वहां तो स्थानीय ग़मी और ख़ुशी में ट्रांज़िस्टर ही बजता था। उसी के पार्श्व-संगीत में घर के मुखिया की तेरहवीं से पहले ही मुखरित होते हुए ज़र, जोरू और ज़मीन के झगड़े-झमेले थे। और झमेले भी ज़र और ज़मीन के ही ज़्यादा थे चचा। जोरू जितनी थीं, ज़मीर, जज़्बात और ज़िम्मेदारी से काम लेने वाली थीं। एक औपन्यासिक महाकाव्यात्मक गुण रखने वाला नाटक है ‘विरासत’। यह नाटक मेरे लिए बहुत ही अलग तरह का अनुभव था।

—का अलग हतौ जा नाटक में?

—अब यूं तो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का नाटक है तो तरह-तरह के प्रयोग तो होंगे ही। हवेली के हर कक्ष की गतिविधि को एक साथ बताना था इसलिए मंच की परिकल्पना एक चुनौती था। ऐसा मंच बनाया गया जिसके चारों ओर दर्शकों के बैठने की व्यवस्था थी। लगभग दस प्रकोष्ठ थे और बीचोंबीच एक जलकुण्ड जिसमें दस-प्रन्द्रह बाल्टियां, घड़े और टखनों-टखनों पानी था। हम जहां बैठे थे, वह था रसोई प्रकोष्ठ। एक तो मई की गर्मी, दूसरे हमारे ही निकट तीन अग्निधर्मी चूल्हे थे। सचमुच के तवा-परात, सचमुच के लोगों ने सचमुच भोजन किया और मध्य के कुण्ड में सचमुच नहा कर अपने सुन्दर बदन दिखाए। हां, महिलाएं कुण्ड में नहाती हुई नहीं दिखाई गईं।

—नाइका तौ फिल्मन में नहामैं।

—नारी पात्र भी जलकुण्ड के पास बराबर का समय बिताते थे, पर उनका काम होता था, पानी भरना, कपड़े-बर्तन धोना और रोना। उनके रोने से भी जलकुण्ड का पानी भरता होगा।

—रसोई से आगे का हतो?

—मुख्य शयनकक्ष, तुलसी चौक, चन्दू का कमरा, पराग के कैरम का अड्डा, हवेली के मुख्य मार्ग का ओसारा, अतिथि कक्ष, ऊपर एक और कमरा तेजस्विनी अविवाहित बेटी प्रभा का, जिसने अवसाद में प्राण त्याग दिए। आंगन का झूला, दूसरा दालान, पूजागृह, अन्नभंडार, पत्थर की चक्की वाला प्रकोष्ठ और फिर हम, जहां रसोई थी। बिना छत की हवेली की विरासत। इन सभी स्थानों का उपयोग अनुकूल प्रकाश-व्यवस्था और ध्वनि-संगीत प्रभावों से बहुत सुन्दर तरीके से किया गया था।

—सबते भड़िया बात का हती?

—सबसे महत्तपूर्ण था स्त्री चरित्रों का मज़बूत होना और उनमें एक दृढ़ता के साथ नकारने की क्षमता का होना। पैसा हमारे नातों को तानों से भर देता है, फिर भी प्रेम के रूप में कुछ बचा रहता है। इस वत्सल-विमर्श को अच्छे प्रतीकों और रूपकों से बांधा निर्देशक अनुराधा कपूर ने। ग़रीबी और अमीरी आती-जाती रहती हैं, लेकिन मां की टॉर्च का उजाला अपने उन्हीं बच्चों पर पड़ता है जो सुखों से वंचित रह गए। नाटक दस-पन्द्रह साल पुराना है, एक बार अब्राहम अल्काजी ने भी इसे प्रस्तुत किया था। उस समय साहित्यिक आन्दोलनों पर क्षणवाद, कुंठावाद, अस्तित्ववाद का जो प्रभाव था, अल्काजी नाटकों में उसके कुशल चितेरे थे। वह प्रभाव हमें अनुराधा जी पर भी दिखाई दिया। नाटक के अंत में उतने क्षणवादी संवादों की आवश्यकता नहीं थी, हम उत्तरआधुनिकता के दौर से भी आगे निकल आए हैं। सविता बी., अनामिका, अजीत सिंह पलावत और इप्शिता का अभिनय ज़ोरदार था, लेकिन अंत तक आते-आते प्रयोगवादी दौर का ईंट-गारा कुछ ज़्यादा ही हो गया था। तुम तो एक बात बताओ चचा।

—पूछ!

—चांदी की मूंठ वाली छड़ी कब दिलवाओगे?


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