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दंड-विधान नहीं दंड-बैठक विधान

—चौं रे चम्पू! नए कानून के हिसाब ते छोरीन कूं घूरनौ, फब्ती कसनौ, ताने मारनौ, छूनौ, छेड़नौ जे सब अपराध ऐं, तौ आज होरी कैसै मनैगी रे?

—सबसे पहले तो चचा आपको होली की पालागन! लीजिए, पहले आपके चरणों को ही छूता हूं, फिर घूरूंगा, फब्ती कसूंगा, ताने मारूंगा और आपको छेड़ूंगा। पहले आशीर्वाद दे दो फिर सहने के लिए तैयार रहना।

—खुस रहौ और खुस रक्खौ, पर तू छोरी-छोरन की बात कर। छोरा बिचारे सहमे-सहमे से घूमि रए ऐं।

—आपको छोरों पर बड़ा तरस आ रहा है!

—चौं नायं आवै? हमऊं तौ आज छोरा ई ऐं। होरी कौ जेई तौ फायदा ऐ! उमरिया की कोई बाधा ई नायं। हर उमर कौ नर किसोर है जाय और हर उमर की नारी किसोरी। हर तरफ राधा भाव ऐ रे! तैंनैं नायं खेली होरी, छोरिन के संग?

—मैं तो कान्हा बना रहता था बचपन में। छोरियां रंगदारी दिखाती थीं। मैं उनके लिए पिचकारी बनाया करता था बांस की। बचपन से ही कारीगर-मजदूर किस्म का व्यक्ति रहा हूं। बांस की एक तरफ़ की गठान में बारीक छेद करके, उसे दूसरी तरफ से खोखला करके, खपच्ची में कपड़ा बांध के, मामा के साथ पिचकारियां बना-बना कर बांटा करता था और उन्हीं पिचकारियों से रंग मारा करती थीं ननिहाल की निराली-निर्लज्ज मामियां। मामा को नाली में रगड़ देती थीं और मुझ शर्मीले के गालों को बरोसी की राख से रगड़ जाती थीं।

—तेरी बात नायं करि रए। कानून ते सहमे भए छोरन की करि रए ऐं!

—मन का शुद्ध कोई छोरा सहमा हुआ नहीं होगा, लेकिन जो छिछोरा है उसकी ख़ैर नहीं होगी। होनी भी नहीं चाहिए। और छोरियां भी कोई कम नहीं हैं चचा, किसी क़ानूनी धारा के दंड-विधान से पहले ही दंड-बैठक विधान लगा देंगी। ऐसी रंग-धारा मारेंगी कि ज़्यादा रंगदारी दिखाने वाले का उद्धारा हो जाएगा। माना कि होली मुक्ति-पर्व है, लेकिन एकांतिकता का नहीं, सामूहिकता का त्यौहार है। स्त्री-पुरुष के आकर्षण का है, अमर्यादित घर्षण का नहीं। देवर अपनी भाभी के सौन्दर्य पर आदरपूर्वक रीझा रहता है, जेठ जी भी जेठ महीने में दादा जैसा आचरण करते हैं लेकिन फागुन में वे भी देवर बनने को लालायित रहते हैं। सब गालों पर गुलाल मल कर मैल-मलाल निकाल देते हैं। पत्नी जो पतिदेव को सालभर होलिका मैया और बाधारानी लगती है, होली के दिन राधारानी जैसे दमक जाती है, क्योंकि वह भी उन सबको भिगो देती है जो उसे आत्मीय और अपने लगते हैं। पतिदेव को उसका वह सौन्दर्य साल भर तक नहीं दिखाई देता। वे भी मुक्त मन से आपादमस्तक भिगो देते हैं अपनी रानी को।

—जे बात तौ सही कही लल्ला।

—हां चचा! होली पर सबके मन से तन-तरंग निकलती हैं। पहले बंद फाटक होता है, भागने का नाटक होता है फिर भीगने-भिगोने का काम मस्त टकाटक होता है। चुनरी चाहती है थोड़ी सरके, चोली चाहती है भीगे। रंग बोलते हैं, अजी हां रंग बोलते हैं। रंग जाती गोरी, गोरी के अंग बोलते हैं। वह कुछ नहीं बोलती उसके ढंग बोलते हैं। होली परिचितों के बीच मनाई जाती है। अपरिचितों को अर्ध-परिचित बनाती है। अर्ध-परिचितों को परिचित बनाती है। खुशफहमियां और ग़लतफ़हमियां पालने वालों के भ्रम टूटते हैं। हंसी-ठिठोली से वर्जनाएं टूटती हैं। रंग धोने के बाद नई आभाएं फूटती है।

—पर महंगाई में इंसान ई टूटौ भयौ ऐ रे।

—आज दुख की रग मत दबाओ चचा! सुख की रंगभरी पिचकारी दबाओ। पर इस बात में कोई शक नहीं है कि जो होली पहले पूरे एक सप्ताह तक चला करती थी अब सिर्फ़ एक दिन तक सिमट कर रह गई है। सुख का विस्तार होना चाहिए। आज तो हरप्यारी चाची के गाल मरोड़ ही दो। तुम पर कोई धारा नहीं लगने वाली। पड़ौस की जितनी लुगाइयां हैं, कौन-कौन तुम पर किशोरावस्था से प्राण दे रही है, मुझे मालूम है, हर एक का किस्सा। अब गुलाल का घिस्सा लगाने का मौका आया है तो क्यों चूको! गाली दें तो खा लेना!


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