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तन का लास्य मन का हास्य

—चौं रे चम्पू! आजकल्ल कहां ऐ रे तू? दिखै ई नायं?.

—गूगल बाबा की शरण में हूं। गान, ज्ञान-संधान के लिए एक स्थान है गूगलधाम। यूट्यूब, साउंडहाउंड और सावन पर पिछले एक-दो दिन से होली के गाने सुन रहा हूं और चचा कई निष्कर्षों पर पहुंचा हूं।

—बता, का निस्कर्स निकारे?

—चचा, एक तो ये कि फिल्म में होली गीत न भी हो तो कहानी पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा, लेकिन कहानी में घटनाओं की सघनता को बढ़ाने, नाटकीय स्थितियों की चूल बिठाने, कहानी की रंगदारी दिखाने और सुख-दुख का आमना-सामना कराने में होली-गीत मदद ज़रूर करता है।

—सो कैसे?

—देखिए, कहानी के तत्वों के बीच बैठा हुआ नाटक कहता है कि बहुत सुख दिखाने के बाद जब दुख दिखाओगे तो दर्शक स्तब्ध रह जाएगा और फिर से सुख की कामना करेगा। सुख की नई कामना करते-करते, भविष्य की विपदाओं का संकेत देते हुए कहानी आगे बढ़ती जाएगी और एक ख़ूबसूरत से नाटकीय मोड़ पर ख़त्म हो जाएगी। मैंने पाया कि बॉलीवुड के हिन्दी गीतों ने नाटक की इस तमन्ना को कुशलता से पूरा किया है। मुखड़ा अगर हर्षोल्लास की ताल-तरंगों, उमंगों और रंगों का है तो अंतरे में कहीं विरह की पीड़ा है तो कहीं अनिष्ट से बेख़बरी का विरोधाभास। शोले में ‘होली के दिन दिल खिल जाते हैं, रंगों में रंग मिल जाते हैं’, गाना समाप्त होते ही धांय-धांय ख़ून की होली शुरू हो जाती है। गब्बर सिंह कहर बरपाता है। फिल्म ‘ज़ख़्मी’ में “आली रे आली रे होली’ गाते हुए मस्तानों की टोली आती है और सवाल करती है कि ’होली के रंग में दिल का लहू ये किसने मिला दिया?’ ’कटी पतंग’ में ’आज न छोड़ेंगे बस हमजोली, खेलेंगे हम होली’, नायक उछल-कूद कर नकली ढपली पर असली उंगलियों का रियाज़ दिखाते हुए गाता है और नायिका सफेद साड़ी में सुबकती है, ’अपनी अपनी किस्मत है, कोई हंसे कोई रोए, रंग से कोई अंग भिगोए, आंसू से कोई नयन भिगोए’।

—जेई तौ सुक्ख और दुक्ख की धूप-छाया ऐ लल्ला!

—होली के लगभग प्रत्येक गीत में, प्रारम्भ में, सभी सफेद कपड़ों में होते हैं। धीरे-धीरे लाल-पीले, हरे-नीले रंग एक-एक करके चढ़ते जाते हैं। गोरी धमकी देती है, ‘अरे जा रे हट नटखट, ना छू रे मेरा घूंघट! पलट के आज दूंगी गारी रे। गोरी काली माई में बदल जाती है, छोरे पहचान में नहीं आते हैं। सब कुछ काला-काला। वे कपड़े फिर से तो सफेद होने से रहे। उतार कर फेंक दिए जाते हैं, लेकिन होली की ये रंगदारी बाद के जीवन-संघर्ष के लिए तैयार कर देती है। शोले में रंगीन कपड़ों के बाद एक लाइन में सफ़ेद कफ़न लहराने लगे हवा से।

—सोले तौ कित्ती ई बार देखि लेओ, नई सी फिलम लगै।

—तीसरी चीज़ मैंने ये देखी कि होली के गीतों और गीतों की स्थितियों की संरचना में मुस्लिम निर्माता, लेखक, गीतकार और संगीतकारों का बड़ा योगदान रहा है। महबूब, नौशाद, शकील बदायूंनी, मजरूह सुल्तानपुरी, सलीम जावेद, हसन कमाल, मोहम्मद रफी, शमशाद बेगम, कितने नाम गिनाऊं। सबको एक रंग मे रंगने में होली जैसा त्यौहार पूरे ब्रह्मांड में नहीं होगा।

—ब्रह्मांड की तोय का खबर ऐ रे?

—जितनी जानकारी अब तक हासिल की है, अगर कहीं जीवन है भी तो वहां होली से अच्छा त्यौहार हो ही नहीं सकता। चलिए ब्रह्मांड की छोड़िए, धरती पर इससे बढ़िया कोई त्यौहार नहीं है। स्त्री-पुरुष के तन का लास्य, मन का हास्य अपनी सात्विक तरंगों के रंगों के साथ आमने-सामने आते हैं। दुश्मन से भी गले मिला जाता है। ऊंच-नीच का भेद नहीं रहता। गिले-शिकवे दूर किए जाते हैं। बरसाने में महिलाएं लट्ठमार होली से पूरे साल का बदला निकाल लेती हैं और पुरूष सहते हैं, सुनते हैं। गालियों का आदान-प्रदान होता है। चुनरी भीगती है, चोली भीगती है। मौसम मनुष्य शरीर में अंगड़ाई लेता है और इस अंगड़ाई को सांगीतिक बनाने में हमारे फिल्मकारों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। अपनी कमनीयता से ये गीत व्यंग्य के लिए सहनीय बनाते है और उदात्त भावों से महनीय बनाते है। गुलाल, अबीर और चुनरवाली के बिना, होली हो सकती है क्या?

—खेलैं नंदलाला तौ उड़त अबीर गुलाला। खेलैं रघुबीरा तौ उड़त गुलाल अबीरा।


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4 Comments

  1. Gurujee

    Holi me ude gulal lekin apan ko darashan kee aas

  2. Sir
    umar ka ahsas karvayagaa yah saal
    Holi ayea ya deewali
    har bar kuch naya ke aas

  3. Sir

    phir se putawanga yah chahra
    koi karega nella,koi peela
    nahi Pahchan payangay log muzko
    darpan bhee zhooth bologa
    aslee chahra dhoonde nahi milega.
    phir see phouncungaa nahaangaa dhohooga
    dhooondogaa naya sevra.
    Jai holee maya

  4. tan ka laaghav, man ka raaghav

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