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डिज़ाइनिंग हो गई अब क्या काम

—चौं रे चम्पू! पिछले दिनन में कित्ते बिमोचन-लोकार्पन भए?

—लोकार्पण विमोचन तो नित्य होते हैं, पर एक लोकलोकार्पण समारोह में भोपाल गया था।

—लोकलोकार्पन कैसौ रे?

—जनजातीय लोककलाओं के संग्रहालय का लोकार्पण। राष्ट्रपति, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, संस्कृति मंत्री और प्रदेश के काफी महामहिम व्यक्तित्व इस लोकलोकार्पण समारोह में थे। चचा! दुनिया घूमा हूं, लेकिन आदिवासी कलाओं का इतना अच्छा संग्रहालय कोई नहीं देखा। ये संग्रहालय आदिमानव के कलात्मक चिंतन के ज़रिए आज की चिंतनहीन कलाओं को दिशा देने वाला है। समारोह के बाद भारत भवन के पूर्व न्यासी सचिव पवन जैन के साथ मैंने तसल्ली से संग्रहालय देखा। बस देखता रह गया। मोहनजोदड़ो के युग में लोहे की गढ़ी हुई नृत्यांगना, अनाज-भंडारण के विशाल मिट्टी के पात्र और गुफाओं में आखेट के विभिन्न भित्ति-चित्रों के चित्र हम अपनी पाठ्य-पुस्तकों में बचपन से देखते आ रहे हैं। भारत में प्राचीनतम सभ्यताओं की जानकारी देने में मध्य प्रदेश का बड़ा रोल रहा है। एक तो देश के मध्य में स्थित है, दूसरे उसकी परिधि का स्पर्श सात राज्य कर रहे हैं। उन राज्यों की आदिवासी संस्कृतियों के संदर्भ भी संग्रहालय में देखने को मिले। छत्तीसगढ़ के आदिवासी जीवन के टोने-टोटके और घोटुल-घोटके बड़े कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किए गए थे। फिर पवन जी ने मेरी मुलाकात कराई हरचन्दन सिंह भट्टी से।

—जे भट्टी कौन ऐं लल्ला?

—संग्रहालय के कला-संयोजक। उस दिन एक मज़े की बात हुई। सुरक्षा-व्यवस्था कठोर थी। बिना निमंत्रण कोई प्रवेश नहीं पा सकता था, कितनी ही ऊंची तोप क्यों न हो। बेचारे हरचन्दन सिंह भट्टी ने सोचा होगा कि मैं डेढ़ साल से एक हज़ार लोक-चितेरों के साथ यहां प्राण खपा रहा हूं, यहां की हवा और हंसी सब मुझे जानते हैं, मुझे किस प्रवेश-पत्र की ज़रूरत होगी! अजी, उन्हें रोक दिया गया। लोगों ने बताया कि ये भट्टी जी हैं, यही इस म्यूज़ियम के डिज़ाइनर हैं। सुरक्षाकर्मियों ने टके सा जवाब दे दिया, डिज़ाइन हो गया, अब इनका क्या काम?

—जे बात तौ मोदी जैसी है गई। अडबानी नैं डिजाइन कद्दई पाल्टी, अब उनकौ का काम? अब मनाइबे में लगे भए ऐं भाजपाई।

—भट्टी ज़ी ने इस्तीफ़ा नहीं दिया चचा और न ही ग़ुस्सा हुए। बाद में प्रवेश-पत्र मिल गया, प्रवेश मिल गया, लेकिन उनके कारण इस संग्रहालय में जिन कलाओं को प्रवेश मिला, वह बड़ी बात है।

—कैसै? बता नैक!

—भट्टी जी ने मध्य प्रदेश के आदिवासी कला-रूपों पर लगभग तीस वर्ष तक काम किया। कोल, बैगा, भारिया, सहरिया, कोरकू और गौंड जनजातियों और उनकी उपजातियों के बीच समय बिताया। उनकी सांस्कृतिक विविधता, कला-माध्यमों और शिल्प को जाना। उन्होंने सबकी अलग-अलग विशेषताएं बताईं। भील जाति आक्रामक होती है लेकिन बेहद मेहनती और ईमानदार! बैगा प्रकृति के बीच रहते हैं, उत्कृष्ट लिपाई-पुताई करते हैं। गौंड काफ़ी विकसित हो चुके हैं। संस्कृति संचालनालय के सुनील मिश्र ने भी काफी श्रम किया। निदेशक श्रीराम तिवारी के निमंत्रण पर आदिवासी कलाकार भोपाल आए। उन्होंने अपने जैसे घर, सिलबट्टे, चक्की, मूसल, खेत की मेंड़, चौखट पर गोबर-मिट्टी की अगियारी, अगैरा-वगैरा का पुनर्निर्माण किया। भट्टी जी ने लकड़ी, बांस, रस्सी, घास-मिट्टी और पुआल जैसी सामग्री के लौकिक और अलौकिक प्रयोग कराए। कोई हल्का थोथा काम नहीं था! गेरू, रामरज, खड़िया और नीला थोथा का सॉलिड प्रयोग हुआ। लोहे के सारे फ्रेम कहीं बांस कहीं पेपरमैशी और क्ले की कला से ढक दिए गए। लोहे के ढांचों से ही ऊंचे-ऊंचे वृक्ष बनाए और उन पर रबर की ऐसी छाल लगाई कि आपको भ्रम हो कि बिल्कुल सचमुच का वृक्ष है! सचमुच का वृक्ष शायद काल-कलवित हो सकता है, मगर ये वृक्ष, मकान, टीले, रथ, आभूषण, मिट्टी के पात्र दीर्घजीवी होंगे क्योंकि यह सोचकर बनाए गए है कि इसे पर्यटक आगे आने वाली अनेक शताब्दियों तक देखते रहेंगे।

—गोबर में कीरा नायं परिंगे का?

—वहां का गोबर भी सिंथैटिक मेलमिलाप मैटीरियल से बनाया गया है। हर समुदाय के एक-एक जोड़े को कैम्पस में नवीनीकरण के लिए रोक लिया गया है, ताकि लोकरंगदारी फीकी न पड़े। डिज़ाइनिंग हो गई है, लेकिन काम अनवरत होता रहेगा। चलना चचा! देखना, अदभुत बनाया है, शायद संसार में बेजोड़।


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