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डरते हैं वही बचते हैं

—चौं रे चम्पू! ऐसी का बात भई जानैं तेरे दिल में उथल-पुथल मचाय राखी ऐ?

—अरे चचा, मैं उथला हूं शायद इस कारण कई बार पुथलित हो जाता हूं।

—पुथलित का होय रे?

—कुछ नहीं होता। मैं नए शब्द नहीं गढ़ सकता क्या? पुथलित समझ लो विचलित।

—सो तौ मैं समझि गयौ ओ!

—व्यवहार से ही शब्द समझ में आते हैं। मैं उथला हूं और वे पुतले हैं महानता के। महानता के पुथलत्व और पुतलत्व में वे कुछ ऐसे तत्वों का बखान करते हैं जो मेरे गले में गहराई तक उतरते नहीं हैं। मैं उनको अधिकतम आदर देना चाहता हूं क्योंकि अहंकार के अलावा, उनकी मंशा में मुझे ऊपर से कोई ख़ास खोट दिखाई नहीं देता।

—अरे, खुल के बताय लल्ला, भयौ का?

—चचा, पिछले दिनों हिंदी की चुनौतियों पर चर्चा हो रही थी। मेरे एक अंतरंग ने एक ऐसा डर दिखाया, जो वाजिब सा था, लेकिन मैं उस डर और उसके कारणों को दूर करने के उपायों पर सोचने लगा। उन्होंने स्वयं को हिंदी का सबसे डरा हुआ व्यक्ति बताया। यह भी कहा कि जो डरते हैं वही बचते हैं। उनका सबसे बड़ा डर यह है कि हिन्दी धीरे-धीरे ग़ायब हो जाएगी क्योंकि उसकी मांग नहीं है। मांग अंग़्रेजी की है। इसके लिए उन्होंने कुछ आंकड़े भी दिए। बताया कि प्राथमिक विद्यालयों में अगर अंग्रेज़ी की मांग दो सौ चौहत्तर प्रतिशत है तो हिन्दी की सिर्फ तईस प्रतिशत है। उनका कहना था कि आज इस देश के गांव का ग़रीब से ग़रीब इंसान भी अपने बच्चों के लिए अंग्रेज़ी शिक्षा की मांग कर रहा है। मैं उनसे शत-प्रतिशत सहमत हूं, लेकिन मैं डरा हुआ नहीं हूं। मैं अंग्रेज़ी से क्यों डरूं भला? वह भाषा जो हमारे बच्चों को अच्छा भविष्य दे सकती है, रोज़गार दे सकती है, हमारे देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चमका सकती है, उससे मैं नफ़रत क्यों करूंगा और जिससे मैं नफ़रत नहीं करता, उससे मैं डरूंगा क्यों?

—मांग ते उनकौ का मतलब ऐ?

—मतलब तो विस्तार से वही बता सकते हैं, लेकिन मैं यह कहना चाहता हूं कि मांग तो उसी चीज़ की होगी न, जो आपके पास न हो। हम हिन्दी में गाने सुनते हैं, हिन्दी सिनेमा देखते हैं, हिन्दी में बतियाते, गपियाते हैं, हंसते हैं, खिलखिलाते हैं, लेकिन जब कॉर्पोरेट दुनिया में टाई लगा कर जाते हैं तो सामने वाले को प्रभावित करने के लिए अंग्रेज़ी बोलते हैं। इस प्रवंचना का क्या करूं कि हिंदी पूरे देश में प्राथमिक स्तर से नहीं पढ़ाई जा रही और हिंदी की इस सम्पन्नता को कैसे ढकूं कि वह संचार-माध्यमों और इंटरनेट के माध्यम से दिन-ब-दिन देश की एकमात्र सशक्त संपर्क भाषा का रूप ले रही है। ’मांग’ शब्द को अगर अर्थशास्त्र का मानें तो उसके साथ ’पूर्ति’ शब्द भी आता है। भाषा मूल्य-निर्धारण के लिए, यह भी टटोलें कि हिंदी के लिए चिंतित लोग ’पूर्ति’ पर कितना ध्यान दे रहे हैं। बहरहाल, अब ग़रीब की समझ में ये बात आने लगी है कि अंग्रेज़ी सिर्फ़ उन लोगों की बपौती नहीं है जो शासन-प्रशासन चलाते और रौब जमाते हैं, लेकिन वोट हिंदी में मांगते हैं।

—पूर्ती ते का मतलब?

—पारिभाषिक शब्दावली पर पुनर्विचार हो। मल्टीमीडिया आधारित शिक्षण सामग्री का निर्माण हो। देश की एकमात्र संपर्क भाषा को प्राथमिक स्तर से पढ़ाया जाए। हिन्दी दक्षता मापने के लिए टोफेल जैसा ‘निकष’ कार्यक्रम बने। ज्ञानोत्पादक साहित्य में मूल भाषा के शब्दों का अनुवाद करने के स्थान पर देवनागरी लिपि में उन्हें यथावत स्वीकार किया जाए। हिंदी कहीं नहीं जाएगी। अठारह भाषाओं के ज्ञाता राहुल सांकृत्यायन जब मृत्युशैय्या पर थे, तब वे हिन्दी बोल रहे थे। हम बाहर की अर्जित भाषाओं में कितने भी परिमार्जित हो जाएं, लेकिन जो मां की दी हुई भाषा होती है उसी में कराहते हैं, उसी में जीते हैं, उसी में प्रेम करते हैं। अगर यह सही है कि जो ‘डरता है वही बचता है’, तो मांग की कमी के कारण नहीं, पूर्ति की कमी के कारण डरना चाहिए!


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  1. Main samajhata huN ki Hindi jo ki swayam arbi-pharsi se tatha anshik roop se angrezi se prabhavit hui hai, snaskrit ki to putri hai hi, darshati hai ki martra hindi hi samsta bhashaoN ke ansh ko atmasaat karney ki kshmata rakhati hai. Ye prabuddh hindustaniyoN ke prakhar buddhimaan honey ka dyotak hai. English ki kshamta ab kafii adhik hai, vair se laabh nahiiN hoga, prayas bhi nahiiN karna hai, swachhnda aur swabhwik roop se isey develop honey deyN to ye samsat vishwa ki ban jaayegi kyon ki Indian continent ke prabhv se wa anya bhashabhashiyoN ke dwara bhi english ka roo bhi badal rahaa hai jismey hamaari bhumikaa adhik hogi.

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