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कैसे अंकुश रखें कैसे ख़ुश रखें

—चौं रे चम्पू! पाकिस्तान में जो चुनाव भए उन्पै तेरौ का बिचार ऐ?

—अरे चचा! मैं कोई राजनैतिक विश्लेषक थोड़े ही हूं। कला, संस्कृति, कविता की बात करो। इन दो देशों के आपसी सम्बन्ध मेरी समझ में आज तक नहीं आए। पाकिस्तान एक अजीब क़िस्म का ग़रीब देश है। या कहें ग़रीब क़िस्म का अजीब देश। करे कुछ, बोले कुछ। ताक़त के अनेक केन्द्र हैं वहां।

—सो तो है!

—सेना में ताक़त है कि आईएसआई में है या उनके तथाकथित जनतंत्र की उस जनता में है जिसने नवाज़ शरीफ़ को जिता दिया, समझ में आना सीधी खीर नहीं है। पाकिस्तान के पंजाब के शेर को कब कौनसा सेनाध्यक्ष चूहा बना देगा, कुछ कह सकते हैं क्या? मियां को बिल भी न मिलेगा, चूहे को तो मिल भी जाता है। दस साल का देश निकाला दे दिया गया, फांसी की सजा भी हो गई। अमरीका और अरब देशों ने जैसे-तैसे नवाज़ शरीफ़ को बचा लिया। पर कमाल है कि छियासठ साल बाद वहां पहली बार जनतंत्र ने इतनी ज़ोरदार दस्तक दी है। सुन कर हैरानी होती है। ज़रदारी पर नहीं नवाज़ की समझदारी पर ताज्जुब होता है चचा!

—तोय का सुनि कै ताज्जुब होय?

—ताज्जुब होता है कि नवाज़ ने अपने चुनाव अभियान में खुल कर अमन की आशा का पैग़ाम दिया। कहा कि भारत से सम्बन्ध सुधारेंगे। ये जो पीएमएल (नून) को वोट मिले हैं चचा, भारत से सम्बन्ध सुधारने के नाम पर ज़्यादा मिले हैं। वहां की जनता भारत से दोस्ती चाहती है। मैं आपको बताऊं अपना अनुभव, जब मैं पाकिस्तान गया था।

—कब गयौ ओ?

—दो हज़ार सात में गया था। मैंने वहां अवामी मुशायरे में कविताएं सुनाईं। एक ख़ातून मेरे पास आईं। पूछने लगीं, आप किस ज़बान में सुना रहे थे? मैंने कहा आदरणीया! मैं हिन्दी में सुना रहा था। वे बोलीं, वो तो हमारी समझ में आ रही थी। मैंने हंसते हुए कहा, आपके हुक्मरान यही तो आपको नहीं बताते हैं कि हमारी ज़बान एक है। उर्दू कहिए, हिन्दी कहिए, दोनों ऐसे ही समझ में आती हैं जैसे दिल की ज़बान समझ में आती है। हमारे गाने और अफसाने एक से हैं, चेहरे-मोहरे एक से हैं, पर मोहरे चलाने वाले हाथ और सियासी शतरंज के खिलाड़ी अलग हैं। वे भी मुस्कुराईं। चचा, पाकिस्तानी टेलीवीज़न के जब पच्चीस वर्ष हुए थे तब मैंने अपने दूरदर्शन की तरफ़ से उनके टेलीवीज़न के लिए एक गाना लिखा था।

—सुना दो-चार लाइन।

—गीत था, ‘क़ुबूल करो, नन्हा सा, प्यारा सा फूल! क़ुबूल करो, स्वीकार करो! भारत के वासियों का प्यार।’ चचा फूल नेहरू जी का गुलाब था। मैंने आगे कहा, ‘ये फूल प्यारा, है रहबर हमारा, उतना दुलारा, जितना कि चांद-तारा, एक में ये ख़ुश्बू, दूजे में ये इशारा, दिन-ब-दिन बढ़ेगा, अपना ये भाईचारा। क़ुबूल करो, स्वीकार करो, ख़ुश्बुओं के रंग की फुहार, भारत के वासियों का प्यार।’ लम्बा गीत था। एक अंतरा और सुन लो, ‘एक से सुरों में, एक से हैं गाने, एक से तरन्नुम हैं, एक से तराने, एक से हैं हम दोनों, एक से फसाने, एक ही तो हैं अपने, मौसम सुहाने। क़ुबूल करो, स्वीकार करो! मन के इन मोतियों का हार, भारत के वासियों का प्यार।

—का भयौ फिर?

—इतना प्यार उस वक़्त पाकिस्तान टेलीवीज़न को रास नहीं आया। इस गीत की संगीत-रचना उस्ताद अमजद अली ख़ां ने की थी। गीत को गाया था अनुराधा पोढवाल और शांति शर्मा ने। पाकिस्तान में तो नहीं लेकिन सार्क सम्मेलन के प्रारंभ में इसे बजाया गया था। बहरहाल, अब गीत के नवीनीकरण का मौक़ा आ रहा है। अमन की आशा में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तो नवाज़ साहब को न्यौता दे ही दिया है, पर कुछ चीज़ों में सावधानी ज़रूरी है। अच्छा है वे नवाज़ के शपथ-ग्रहण समारोह में नहीं जा रहे। हमें इनके हर पैंतरे को देखना होगा। ये कब ऊंट की टेढ़ी चाल चलते हैं, कब घोड़ा और कब पैदल घुसपैठ कर देते हैं। हम बाघा बॉर्डर पर मोमबत्तियां ही जलाते रह जाते हैं। देखना ये होगा कि नवाज़ अपनी सेना और आईएसआई पर एक साथ कैसा अंकुश रखते हैं और अपने अवाम और भारत को एक साथ कैसे ख़ुश रखते हैं


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