अशोक चक्रधर > Blog > चौं रे चम्पू > ऐसा आशीर्वाद दे दो बस

ऐसा आशीर्वाद दे दो बस

—चौं रे चम्पू! बिटिया के ब्याउ की सिगरी तैयारी है गईं का?

—चचा, मुझे कुछ मालूम नहीं है। तैयारियां चल रही हैं। ख़ूब सारे दूसरे लोग हैं जो कर रहे हैं। तैयारियों के सारे छोर फिलहाल मेरी पकड़ में नहीं हैं। अब से सत्रह-अठारह साल पहले मैंने अपने साढ़ू साहब की बिटिया की शादी अपने घर से यह सोच कराई थी कि अपनी बिटिया का ब्याह कुछ साल बाद करेंगे तो चलो एक रिहर्सल ही हो जाए। उस समय हर चीज़ मेरी पकड़ में थी, क्योंकि मैं ही वन्दनवार बनाने और बांधने वाला था, मैं ही निमंत्रण पत्र बनाने और बांटने वाला। स्वागत और दावत प्रबंध सब मेरे थे। मैंने ही स्टिल फोटोग्राफ़ी करी, मैंने ही वीडियोग्राफ़ी। वृहन्नलाओं का नृत्य भी मैंने ही आयोजित कराया। एक कड़वा अनुभव भी रहा। ऐन दावत के समय आंधी और बरसात आई पांच-दस मिनिट के लिए। बिजली के जितने ताम-झाम से भरे झाड़-फानूस लगाए थे, टूट-टूट कर भोजन में गिर गए। भोजन और मज़ा किरकिरा हो गया। खाना फिर से बना। टेंट को फिर से खड़ा किया गया।

—टैंट कहां लगायौ ओ?

—अपनी कॉलोनी के पार्क में। उस समय तक डीडीए के पार्क शादी-ब्याह के लिए उपलब्ध हो जाते थे। सारे मकान भरे भी नहीं थे। पेड़ भी उतने बड़े नहीं हुए थे, इसलिए तम्बू-कनात बड़ी आसानी से लग जाते थे। इतने दिनों में हमारी बिटिया भी बड़ी हो गई और पेड़ भी बड़े हो गए। आबादी बढ़ गई। डीडीए ने कॉलोनी के पार्क शादी-ब्याह के लिए देने पर रोक लगा दी। वह जो आस-पड़ोस के सहयोग से सब कुछ हुआ था, मेहमानों और सामानों के लिए तीन ख़ाली फ़्लैट मिल गए थे, वैसा तो इस बार नहीं हो पा रहा, लेकिन अब पैसा ऐसा समर्थ तत्व है जो सब कुछ करा देता है। मुझे इस बात की राहत है कि मेरा पुत्र, बिटिया के मामा चाचा और रिश्तेदार, मेरे और बिटिया के दोस्त, वर पक्ष के लोग, न तो मेरा अधिक खर्चा होने दे रहे और न मुझे मुखिया बनने का मौक़ा। मेरी दखलंदाजी कम से कम है। व्यवस्थापरक सारे निर्णय अलग-अलग लिए जा रहे हैं। बारात आई है अमरीका से। वे स्वावलम्बी लोग हैं। आकर होटल में रुक गए।

—वा भई वा!

—अब तो ये है कि शुभाशीष देने के लिए परिवार-परिकर और मित्र-मंडल समारोह में शामिल हो। कोई अन्यथा न ले, कोई नाराज़ न हो, क्योंकि भूलवश बहुत से अंतरंगों को न्यौता देना रह गया हो। वे माफ़ कर दें। और क्या!

—बेटी के ब्याउ में कोऊ नाराज नायं होयौ करै।

—मैं बेटे बेटी में अंतर नहीं मानता चचा! समाज बदल रहा है, समय बदल रहा है। फिर भी मैं मानता हूं कि बिटिया का विवाह एक अलग तरह का दायित्व है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्मखण्ड में तो बड़ा भयंकर लिखा हुआ है, जिसको पढ़कर मैं कुछ वर्षो से परेशान था, नानुरूपाय पात्राय पिता कन्यां ददाति चेत… यदि पिता कामना, लोभ, भय अथवा मोह के वशीभूत हो सुयोग्य पात्र के हाथ में अपनी कन्या नहीं देता है तो सौ वर्षों तक नरक में पड़ा रहता है। अब बताइए, कामना, लोभ, भय और मोह के वशीभूत पुत्री का विवाह न करूं, ऐसा तो मुमकिन नहीं। जब तक पुत्री राज़ी न हो, पिता क्या कर लेगा भला! आजकल बच्चे अपने निर्णय स्वयं लेने के योग्य हो गए हैं। दखलंदाजी न करना और प्रेम जताते हुए मुस्कान बनाए रखना ही माता-पिता की नियति है, लेकिन ख़ुशी इस बात की है चचा, कि पुत्री ने एक योग्य बालक को पसन्द किया है। कामना करो कि यह विवाह मज़बूत हो। प्रेम-माधुरी की सुनहरी किरणों से आलोकित रहे। मध्यान्ह के मुखरित ताप में, क्षणिक संताप में या अपने भार से जब पृथ्वी कांपने लगे, तब भी स्थिर रहे। शुरुआत में परस्पर एक-दूसरे को भाना बड़ा आसान है। अंत तक निभाना विवाह का सबसे बड़ा सौन्दर्य है। और चचा, मैंने अपने जीवन में, आशीर्वाद पाने वालों से ज़्यादा आशीर्वाद देने वाले बढ़ाए हैं, चाहे किसी भी उम्र के क्यों न हों। सबको बढ़िया भोजन मिले और किसी भी प्रकार की किरकिराहट समारोह में न आए, ऐसा आशीर्वाद दे दो बस, और क्या चाहिए!


Comments

comments

3 Comments

  1. .
    “Kuch istarah behno chalo apni laaj bachate hain,
    hum neta ban jaate hain, ya police main jaate hain
    matlab paap se bachne ke liye hum bhi paapi ban jaate hain
    kuch istarah behno chalo apni laaj bachate hain

    kya pata kal koi tumhe chalti rah se utha le,
    is se accha hum “laal batti” main jaate hain
    kuch istarah behno chalo apni laaj bachate hain

    ye desh hai jaha ‘parayi beti’ behan humari hai
    aur khud ki beti khuli almaari hai,
    ‘ek behan’ ki maut chidaati hai, ab baari tumhari hai,
    jo pasand ho rakh lo,
    chahe kamal ka fool rakho, ya haath ka panja,
    ya khaaki saadi pehan kar sher lagate hain

    kuch istarah behno chalo apni laaj bachate hain”

    http://www.facebook.com/pages/Sab-TheeK-Hai-My-poetry-collection/309996909056843?ref=hl

  2. .
    “Kuch istarah behno chalo apni laaj bachate hain,
    hum neta ban jaate hain, ya police main jaate hain
    matlab paap se bachne ke liye hum bhi paapi ban jaate hain
    kuch istarah behno chalo apni laaj bachate hain

    kya pata kal koi tumhe chalti rah se utha le,
    is se accha hum “laal batti” main jaate hain
    kuch istarah behno chalo apni laaj bachate hain

    ye desh hai jaha ‘parayi beti’ behan humari hai
    aur khud ki beti khuli almaari hai,
    ‘ek behan’ ki maut chidaati hai, ab baari tumhari hai,
    jo pasand ho rakh lo,
    chahe kamal ka fool rakho, ya haath ka panja,
    ya khaaki saadi pehan kar sher lagate hain

    kuch istarah behno chalo apni laaj bachate hain”

    http://www.facebook.com/pages/Sab-TheeK-Hai-My-poetry-collection/309996909056843?ref=hl

  3. .
    “Kuch istarah behno chalo apni laaj bachate hain,
    hum neta ban jaate hain, ya police main jaate hain
    matlab paap se bachne ke liye hum bhi paapi ban jaate hain
    kuch istarah behno chalo apni laaj bachate hain

    kya pata kal koi tumhe chalti rah se utha le,
    is se accha hum “laal batti” main jaate hain
    kuch istarah behno chalo apni laaj bachate hain

    ye desh hai jaha ‘parayi beti’ behan humari hai
    aur khud ki beti khuli almaari hai,
    ‘ek behan’ ki maut chidaati hai, ab baari tumhari hai,
    jo pasand ho rakh lo,
    chahe kamal ka fool rakho, ya haath ka panja,
    ya khaaki saadi pehan kar sher lagate hain

    kuch istarah behno chalo apni laaj bachate hain”

    http://www.facebook.com/pages/Sab-TheeK-Hai-My-poetry-collection/309996909056843?ref=hl

Leave a Reply