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एक फोन आ रहा है

—चौं रे चम्पू! तैंनै कबी इसक में चोट खाई ऐ का?

—चचा, भूमण्डल पर ऐसा कौन होगा जिसने कभी न कभी इश्क में चोट न खाई हो। कवि बनने के लिए चोट खाने की परम्परा में प्रवेश अनिवार्य है। छोटी-मोटी चोट खाने वाला गीतकार बन जाता है। भारी-भरकम चोट खाने वाला हास्यकवि बन जाता है। मैं हास्यकवि बन पाया या नहीं, ये तो नहीं जानता, लेकिन बहुत गम्भीर साहित्यकार कहलाए जाने वाले महारथी मुझे हास्य कवि मानते हैं। इसका मतलब ये हुआ कि जितनी मात्रा में चोटें मैंने खाई हैं, उतनी अन्य ने न खाई होंगी। मैं तो पहले भी कह चुका हूं, ये घर है दर्द का घर, पर्दे हटा के देखो, ग़म हैं हंसी के अन्दर, पर्दे हटा के देखो।

—सच्चे हास्य कबी में गहराई भौत होय, जे बात तौ मान्नी पड़ैगी।

—अगले शेर में मैंने यही तो कहा था चचा, ‘लहरों के झाग ही तो पर्दे बने हुए हैं, गहरा बहुत समन्दर पर्दे हटा के देखो।’ मौहब्बत में चोट खाया हुआ आदमी झाग दे जाता है। और ये भी सही है कि बिना चोट खाए, आदमी के खोट दूर नहीं होते। वैसे तो चचा मौहब्बत ज़िन्दगी में एक बार ही होती है। वही जीवन साथी बन जाए तो क्या कहने। मैंने ही लिखा था, ‘आती नहीं है उसके, जीवन में कोई बाधा, राधा ही रुक्मिणी हो, और रुक्मिणी ही राधा।’ लेकिन राधा के रुक्मिणी बनते ही उसका आधा राधा-भाव तिरोहित हो जाता है, सम्पूर्ण-साधा-भाव अवतरित होता है। कुछ चोटाकुल प्रेमात्माएं ‘आ बैल मुझे मार’ मुहावरे का उदाहरण बनने के लिए अंतर-बाह्य कारणों से, जीवन में कुछ अभावग्रस्त अनुभूतियों के रहते, समाज के बनाए नियमों की अवहेलना करते हुए, प्रेम कर बैठते हैं। वह प्रेम एक दूरी तय करता है, लेकिन जब चीज़ें बिगड़ने और बदलने लगती हैं तो प्रेम-पंथ में दुश्वारियां बढ़ने लगती हैं। फिर भी चोट खाए लोग मानते नहीं, अपना नसीब आगे तक आज़मा कर देखा करते हैं। बार-बार चोट खाते हैं। बार-बार दिल लगाते हैं। इस प्रक्रिया में खासी दिल्लगी हो जाती है और उनके हास्यकवि बनने की सम्भावनाएं बढ़ती जाती हैं।

—अरे लल्ला, तू सही जवाब नायं दै रह्यौ! सीरियसता ते गम्भीरली बता।

—अरे चचा, चोट तब लगती है, जब अपने देते हैं। इंसान ग़ैरों से चोटें तो ज़िन्दगी भर खाता रह सकता है। असल चोट वही, जो अपना दे। इश्क में मज़ा यही है कि चोट खाने के बाद भी प्रेमी हज़ार बार गले लगाने और बेबात आजमाने की जुगत में भिड़ा रहता है। एक तरफ दिल हो, एक तरफ शीशा हो तो क्या उठाएंगे? अगर दिल शीशे की तरह साफ़ है और आप ख़ुद को देख सकते हैं, तो अपने प्रेम को भी देख सकते हैं, चोट को भी देख सकते हैं। मिट कर भी देख सकते हैं और मिटा कर भी देख सकते हैं। गीतकार विष्णु सक्सेना गाते रहते हैं, ‘रेत पर नाम लिखने से क्या फायदा, एक आई लहर कुछ बचेगा नहीं।’ समन्दर मिटा जाएगा, इसलिए पत्थर पर लिखो। अब पत्थर पर लिखने के लिए छैनी–हथौड़ी चाहिए! जिस नाम को लिखने के लिए छैनी-हथौड़ी की ज़रूरत पड़ जाए, वहां प्यार में ख़ूनखच्चर होगा कि नहीं? दिल को पत्थर कैसे मानें विष्णु? प्रेम आपको बड़ा बनाता है। व्यापक, उदात्त, सहनशील और पारदर्शी बनाता है। ये सारे तत्व दूसरों को न झिल पाएं तो आपको झूठा भी बनाता है। रुको चचा, एक फोन आ रहा है! हैलो! …क्या कहा देवल आशीष!!!!

—का भयौ?

—अरे कविसम्मेलन पर एक भयानक वज्रपात हुआ है चचा! युवा कवि देवल आशीष नहीं रहे। मंच पर कोई लतीफ़ा न टिप्पणी, मीठा स्वर, हिन्दी-अंग्रेज़ी साहित्य के अच्छे ज्ञाता! मेरे आंसू निकल पड़ें, उससे पहले देवल की राधा-कृष्ण श्रृंखला का एक कवित्त सुनिए, ‘ब्याही न श्याम के संग, न द्वारिका या मथुरा मिथिला गई राधा। पाई न रुक्मिणि सा धन-वैभव, सम्पदा को ठुकरा गई राधा। किंतु उपाधि औ मान, गुपाल की रानियों से बढ़ पा गई राधा। ज्ञानी बड़ी, अभिमानी बड़ी, पटरानी को पानी पिला गई राधा।।’

—मेरे तौ आंसू निकरि आए लल्ला!


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