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उन्हें लो कि इन्हें लो

—चौं रे चम्पू! चौटाला और पुत्र चौटाला कूं दस-दस साल की सज़ा है गई। तेरौ का खयाल ऐ?

—मेरा जो ख़्याल है, उस पर ख़्याल कौन करेगा चचा! न मैं सीबीआई हूं, न रोहिणी कोर्ट हूं, न मैं शिक्षक हूं जिसने फायदा उठाया हो या रिश्वत दी हो, न मैं राजनेता हूं। छोटा सा कवि हूं। मैं सोचता हूं कि कब तक लीपापोती होती रहेगी। अपने संज्ञान में किन्हें-किन्हें लो, उन्हें लो कि इन्हें लो।

—उनैलो कै इनैलो, खूब कही!

—चचा! ग़लत किए का फल मिलता है, आज नहीं तो कल मिलता है।

—बिना नेता के इनैलो कहां बचैगी लल्ला?

—अगर ऐसे लोग बचते हैं जो दूसरे के भ्रष्टाचार पर उंगली उठाकर अपने भ्रष्टाचार को उचित ठहराते हैं तो आप क्या कहेंगे? कुछ देर पहले तिहाड़ जेल के एक अधिकारी का फोन आया, वे छब्बीस जनवरी के लिए मुझे निमंत्रित कर रहे थे कि कैदियों का कविताओं द्वारा मनोरंजन करूं। मैंने अधिकारी से पूछा कि चौटाला पिता-पुत्र को क्या-क्या सुविधाएं दी जा रही हैं! इस पर कल्पना करके कविता रचूं क्या? उन्होंने बड़े ज़ोर का ठहाका लगाया। मैंने भी जवाब में एक नकली ठहाका ठोक दिया। अगर मैं जेल में कविता सुनाने जाता हूं तो किस नैतिकता की कविताएं सुनाऊंगा, समझ में नहीं आ रहा था। मैंने उनसे पूछा कि अपने देश के जनतंत्र और न्याय-प्रणाली पर आपकी कितनी आस्था है महाराज, ये तो बताइए। वे बोले, पूरा सिस्टम ही ख़राब है कवि जी। आप सब जानते हैं, मैं क्या बताऊं! मैंने फिर पूछा कि कहीं कोई आशा की किरण दिखाई देती है कि नहीं? उन्होंने एक व्यंग्यकार की तरह कहा, पूरे देश का नाम तिहाड़ रख देना चाहिए, तब मुझे गर्व होगा कि मैं भी तिहाड़ का वासी हूं। इस बात पर मैंने असली ठहाका लगाया। फिर इसरार किया कि सचमुच बताएं कि आशा की किरण कहां है हमारे पास। उन्होंने जैसे मेरे ही कंधों पर बोझ डालते हुए कहा, एक मात्र किरण हैं देश के कवि। वे चाहें तो तस्वीर बदल सकते हैं। उसके बाद मैं ज़्यादा नहीं बोला।

—तो अब कबियन कौ हाल बता।

—कवि भी तो इसी देश के निवासी हैं चचा। सचमुच उनकी ज़िम्मेदारी ज़्यादा है, पर वे भी तो गृहस्थी चलाते हैं। मध्यवर्गीय सुविधाओं के तामझाम में उनकी अंर्तआत्मा में भी उजाले कम और ज़रूरतों के मकड़जाल ज़्यादा हैं। वे जो लिखते या सुनाते हैं, मीडिया उसे महत्व भी कहां देता है। लाल किले पर विराट कविसम्मेलन हुआ, अपार श्रोता सुनने आए, रात के नौ बजे से सुबह के साढ़े चार बजे तक बैठे रहे। अच्छी और सच्ची बात पर तालियां बजाते रहे। मदन मोहन समर की सत्रह मिनट तेरह सैकिण्ड की ‘जागो’ शीर्षक कविता पर पूरे पंडाल ने खड़े होकर अभिनन्दन किया। यह दृश्य किसी चैनल ने नहीं दिखाया। बुद्धिजीवी मीडियाकर्मियों ने सोचा होगा, यहां तात्कालिक भड़काऊ कविताएं होती हैं। हां, शुरू में जो आठ-दस लड़के आए थे, जिन्होंने मंच के कवियों को कोसा कि वे क्यों यहां कविता सुना रहे हैं, उन्हें निकलकर बाहर आना चाहिए और शासन को बाहर निकलकर कोसना चाहिए। यह दृश्य ज़रूर कुछ चैनलों पर दिखाया गया। अगर रोहिणी के सामने चौटाला के समर्थक प्रायोजित हो सकते हैं तो क्या ये दस लड़के प्रायोजित नहीं हो सकते, जिनका साथ न तो श्रोताओं ने दिया, न कवियों ने। चचा, जिस नस पर उंगली रखो, वही कराहती और दुखती है। कविसम्मेलन में सारी कविताएं स्तरीय हुई हों, ऐसा तो नहीं कहूंगा, लेकिन अधिकांश की वाणी में दुर्व्यवस्था, दमन और दामिनी का दर्द था। दर्द कुछ दूसरे भी थे, जो कवियों के आंतरिक मामले थे कि किसने किसकी कविता सुना दी, कौन किससे ज़्यादा जम गया। मुझे वहां आशा की बस एक किरण नज़र आई।

—सो बता?

—कविसम्मेलन के श्रोता, जो सही जगह, सही बात पर, सही प्रतिक्रिया दे रहे थे। इस तरह देश के हालात तब सुधर सकते हैं जब श्रोता कवियों को ठीक रखें और कवि देश को


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  1. sir jaipur me session kab !!

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