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  • स्थाई भाव नहीं संचारी भाव
  • स्थाई भाव नहीं संचारी भाव

    —चौं रे चम्पू! जयपुर साहित्य मेला में तैनैं का जौहर दिखाए रे?

    —वहां से कल ही लौटा हूं चचा। जयपुर लिट्रेरी फेस्टिवल भारत में ही नहीं दुनिया में अपनी जगह बना रहा है। देश-देशांतर से लेखक आते हैं। सुधी पाठक भी इकट्ठा होते हैं। नौजवानों की सहभागिता रहती है। कुम्भ जैसा माहौल है, जिसमें तरह–तरह के अखाड़े और तरह-तरह के मतावलम्बी लोग जुटते हैं। प्रयाग में चल रहे कुम्भ में अगर दस-पन्द्रह करोड़ लोग आएंगे तो यहां जो दस-पन्द्रह हजार लोग इकट्ठा हुए, वे भी दस-पन्द्रह करोड़ लोगों की भावनाओं को व्यक्त करने वाले लोग तो रहे ही होंगे। सबसे अच्छी बात ये है कि उन विषयों को उठाया जाता है जिन पर साहित्याकर प्रायः बहस करने से बचते हैं।

    —कित्ते मतभेद भए?

    —मतभेद तो लेखकीय लोकतंत्र का गौरव है। दिक्कत तब आती है जब कई बार वक्तव्य मूल संदर्भ से काटकर देखे जाते हैं। पिछले साल सलमान रुश्दी को लेकर बवाल मचा था, इस बार आशीष नन्दी और मिमाणी के कारण। दोनों का सम्बन्ध अवर्ण-सवर्ण अस्मिता से था। अब चचा, वक्त आया है कि हर मुद्दा पारदर्शी हो। पर मेरी मंशा ये है कि दूरदर्शिता से काम लिया जाए। मैंने कुछ कही, तुमने कुछ सुनी से तो बात बिगड़ जाएगी।

    —अपनी बता, तैनैं का कियौ?

    —हमारा सत्र चार बाग में था। स्थान पूरा भरा हुआ था, कुछ लोग खड़े भी थे। विषय था ‘नवरस।’ संचालन सम्पत सरल ने किया और मेरे अलावा दो वक्ता और थे, अतुल कनक और इकराम राजस्थानी। इतने व्यापक विषय पर चर्चा के लिए समय ज़रूरत से ज़्यादा कम था। पर सत्र के बाद चर्चाएं रात तक चलती रहीं। मुझे ख़ुशी है कि नौजवान पूरी गंभीरता से चीज़ों को जानना और समझना चाहते हैं। ये ज़माना कविता के लिए रसवादी नहीं है, क्योंकि जिस तरह की कविता पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ने में आती हैं उसका सरोकार विसंगतियों से है न कि रस की संगतियों से। पिछले लगभग दो-ढाई हज़ार साल से रस का चिंतन किए बिना साहित्यिक विमर्श चल ही नहीं पाता था। अब हालत ये है कि जिस विमर्श में रस का ज़िक्र आए उसे साहित्यिक ही नहीं माना जाएगा। बहरहाल, जब इस सत्र का प्रस्ताव आया तो अपेक्षा की गई कि उदाहरण सहित बात कहनी है। मैंने अपनी कविताओं में खंगालना शुरू किया कि किस कविता में कौन सा रस है और चचा एक पुरानी कविता मिल गई जिसमें सारे के सारे प्रचलित नौ रसों का स्पर्श विद्यमान था। उसमें बेरोज़गार नायक की करुणा, थानेदार का रौद्र, झुनझुने वाली बच्ची और चरण स्पर्श कराने वाली मां का वात्सल्य, घूंघट उठवाने वाली वधू का श्रृंगार, सैनिक की हाथ की बन्दूक का वीर, थानेदार-सिपाही संवाद का हास्य, क्षत-विक्षत अंगों में वीभत्स और नौजवान के निर्णय का अदभुत रस विद्यमान था। अगर कहा जाए कि किसी रस का परिपाक हुआ, तो वह करुण था। अपनी चार मिनट की कविता में मैंने नवरस की झांकी करा दी चचा।

    —कौन सी कविता हती?

    —कविता का शीर्षक है ‘कटे हाथ’ जो अब से तीस साल पहले धर्मयुग में ‘हाथवीर’ शीर्षक से छपी थी। पर आज भी कोई कह नहीं सकता कि वो तीस साल पुराने संदर्भों की कविता है।

    —तौ सुना?

    —सुना दूंगा किसी दिन, लेकिन वहां चर्चा दसवें और ग्यारवें रसों की भी हुई। एक मैंने बताया ‘अर्थ रस’ जिसका स्थायी भाव होता है ‘लालच’। आज बिना पैसे किसी चीज़ में कोई रस नहीं है। और एक चल ही रहा है निन्दा रस, आशीष नन्दी और मिमाणी को लेकर। उसकी निष्पत्ति क्या होगी, ये रस को नहीं मालूम। चचा यह समय स्थाईभावों का नहीं व्यभिचारी यानी संचारी भावों का है। भावनाएं पल पल बदलती हैं। परस्पर विरोधी वक्तव्यों में सामरस्य की तलाश है।

    —तोय कौन सौ वक्तव्य सबते अच्छौ लगौ?

    —प्रसून जोशी ने कहा था, अब लौ से नहीं लौ से उम्मीद है। एक पुल्लिंग़ लौ क़ानून, दूसरी स्त्रीलिंग लौ ज्योति। कवि में यही तो कौशल होता है कि वह शब्दों के साथ खेलकर समाज के दर्द को सामने लाता है। मैं तीसरी लौ की बात करता हूं जो आपस में लगती है और इंसानियत को जगाती है, सच्चाई के साथ।

    wonderful comments!

    1. Vishal Sharma फरवरी 3, 2013 at 2:22 पूर्वाह्न

      Bohuth Sunder

    2. Vishal Sharma फरवरी 3, 2013 at 2:22 पूर्वाह्न

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    3. Vishal Sharma फरवरी 3, 2013 at 2:22 पूर्वाह्न

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    4. Pandit Naman फरवरी 3, 2013 at 8:34 अपराह्न

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    5. Pandit Naman फरवरी 3, 2013 at 8:34 अपराह्न

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    6. Pandit Naman फरवरी 3, 2013 at 8:34 अपराह्न

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    7. Umakant Jha फरवरी 26, 2013 at 3:56 पूर्वाह्न

      औषधि खाकर मरते बीमार, सब कहे सत्य है राम नाम। नकली औषधि के निर्मता ,त्राहिमाम प्रभु त्राहिमाम। वाल्मिकी, तुलसी की रचना , मर्यादा पुरुषोत्तम राम। तमसा तट पर सीता रोती, त्राहिमाम प्रभु त्राहिमाम।

    8. Uma Kant Jha Bakshi फरवरी 26, 2013 at 3:56 पूर्वाह्न

      औषधि खाकर मरते बीमार, सब कहे सत्य है राम नाम। नकली औषधि के निर्मता ,त्राहिमाम प्रभु त्राहिमाम। वाल्मिकी, तुलसी की रचना , मर्यादा पुरुषोत्तम राम। तमसा तट पर सीता रोती, त्राहिमाम प्रभु त्राहिमाम।

    9. Uma Kant Jha Bakshi फरवरी 26, 2013 at 3:56 पूर्वाह्न

      औषधि खाकर मरते बीमार, सब कहे सत्य है राम नाम। नकली औषधि के निर्मता ,त्राहिमाम प्रभु त्राहिमाम। वाल्मिकी, तुलसी की रचना , मर्यादा पुरुषोत्तम राम। तमसा तट पर सीता रोती, त्राहिमाम प्रभु त्राहिमाम।

    10. Umakant Jha फरवरी 26, 2013 at 3:56 पूर्वाह्न

      पत्रकार लेखक विक जाते विवश लेखनी बनी गुलाम। सरस्वती के मुख पर कालिख हे बुद्धिजीवियों त्राहिमाम।

    11. Uma Kant Jha Bakshi फरवरी 26, 2013 at 3:56 पूर्वाह्न

      पत्रकार लेखक विक जाते विवश लेखनी बनी गुलाम। सरस्वती के मुख पर कालिख हे बुद्धिजीवियों त्राहिमाम।

    12. Uma Kant Jha Bakshi फरवरी 26, 2013 at 3:56 पूर्वाह्न

      पत्रकार लेखक विक जाते विवश लेखनी बनी गुलाम। सरस्वती के मुख पर कालिख हे बुद्धिजीवियों त्राहिमाम।

    13. Umakant Jha फरवरी 26, 2013 at 4:07 पूर्वाह्न

      उपर लिखित अंश 10-2-2013 को प्रकाशित अपनी पुस्तक त्राहिमाम प्रभो से उधृत

    14. Uma Kant Jha Bakshi फरवरी 26, 2013 at 4:07 पूर्वाह्न

      उपर लिखित अंश 10-2-2013 को प्रकाशित अपनी पुस्तक त्राहिमाम प्रभो से उधृत

    15. Uma Kant Jha Bakshi फरवरी 26, 2013 at 4:07 पूर्वाह्न

      उपर लिखित अंश 10-2-2013 को प्रकाशित अपनी पुस्तक त्राहिमाम प्रभो से उधृत

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