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  • आत्माओं को चाहिए वेंटीलेटर
  • आत्माओं को चाहिए वेंटीलेटर

    —चौं रे चम्पू! नए साल में इत्तौ उदास चौं ऐ रे?

    —आपको पता नहीं लगा चचा?

    —हां चौं नायं पतौ? पूरे देस नैं नयौ साल हिचक-हिचक कै मनायौ। पर असोक चौं सोक में लिप्त ऐ? चली गई दामिनी, सबके दिल भारी ऐं। तू सबन्नैं सोक ते निकार। उदास मत होय रे!

    —उदासी तो उल्लास की दासी है। बच्चों में ख़ुशी दिखाई देगी तो मैं ख़ुश हो जाऊंगा! सबको नए साल की शुभकामनाएं! दामिनि दमकी हृदय-हृदय में, झुलस गया सन बारा रे! तेरा में हो नया सवेरा, नहीं मनोबल हारा रे!

    —अच्छी लाइन सुनाई, गीत पूरौ कद्दै!

    —कर दूंगा चचा! फिलहाल मेरी उदासी का कारण दूसरा है।

    —तू कारन बता!

    —मैं भी मोमबत्ती जलाने और दामिनी के लिए शांति पाठ करने का मन बना रहा था, तभी मुझे पता चला कि मेरा चचेरा छोटा भाई अस्पताल में है और वेंटिलेटर पर है। मैं हैरान रह गया। हालांकि बीमार चल रहा था, पर अभी दो-तीन दिन पहले तक तो ठीकठाक देखा था, वेंटिलेटर पर जाने का क्या मतलब! और चचा, वो एक एक हंसते-खिलखिलाते परिवार को आंसुओं की भंवर में छोड़ कर चला गया। इकत्तीस दिसम्बर को पचासवां जन्मदिन मनाना था, लेकिन उससे पहले ही अंतिम संस्कार हो गया।

    —का भयौ लल्ला?

    —-चचा, यही सोच-सोच कर उदास हूं कि उसे बचाया जा सकता था। अस्पताल और नर्सिंग होम धंधे के अड्डे बन चुके हैं! मानवीयता से शून्य, हृदयविहीन, सिर्फ पैसा कमाने का ज़रिया। विदेशों में मैंने देखा है कि मरणासन्न आदमी को मौत के मुंह से भी निकालने के लिए संवेदनशीलता के साथ पूरी टीम जुट जाती है। यहां टीम नहीं टीम-टाम ज़्यादा दिखाई देता है।

    —अरे, भयौ का, जे तौ बता?

    —चचा, वो बुखार से त्रस्त था, डायबिटिक तो था ही। रात में साढ़े आठ बजे अस्पताल गया, अपनी मां से यह बोलकर कि असहज लग रहा है, अभी थोड़ी देर में आ जाएगा। उसका जवान बेटा और बेटी अस्पताल लेकर गए। डॉक्टर ने कहा एक्स-रे कराकर लाइए। पैदल-पैदल एक्स-रे कराने गया। पता नहीं दिल्ली की ठंड उसे इतना कैसे प्रभावित कर गई और शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमताएं कहां गायब हो गईं! बताया गया कि उसे सीवियर अटैक हुआ। वह अस्पताल क्या चचा, एक प्रकार से नौजवान डॉक्टरों की प्रयोगशाला था।

    —सो कैसै?

    —मैं वहां पहुंचा तब तक पूरा परिवार इकट्ठा हो चुका था। धीरे-धीरे सारी बातें पता चलीं। वे उसकी छाती को दबाते रहे और यह भूल गए कि तत्काल ऑक्सीजन भी देनी होती है। इंसुलिन का इंजैक्शन लगा दिया पर यह भूल गए कि तत्काल कुछ खाने को भी देना होता है। भूल गए कि ज़रूरी टैस्ट तत्काल कराने होते हैं। डेढ़ दो घंटे तक ऑक्सीजन नहीं लगाई गई। नौसिखिए डॉक्टर तरह-तरह के प्रयोग करते रहे। मस्तिष्क में ऑक्सीजन नहीं पहुंची तो दिमाग़ ने काम करना बन्द कर दिया। दिमाग़ ने काम करना बन्द किया तो अन्य अंगों को जीवित रहने के संदेश मिलना बन्द हो गए। किडनी ने सोचा कि शायद आदमी चला गया, मैं क्यों काम करूं! फेफड़ों ने सोचा कि इनमें पानी भर जाने दूं। हृदय ने सोचा कि इन हृदयहीनों के सामने मेरी क्या बिसात! डायबिटीज को भी मौत के मुंह में धकेलने का मौका मिल गया। मेरा भाई धीरे-धीरे डूबने लगा। बचाने वालों ने देर करी। डूब चुके को निकालकर जूनियर डॉक्टरों ने वेंटिलेटर पर चढ़ा दिया। हंड्रैड परसेंट वेंटिलेटर से उसको जीवित रखा जा रहा था। हम सब परिवारीजन हैरान कि अठारह घंटे में ही ये क्या हो गया! धंधा है चचा, आईसीयू में ले जाकर वेंटिलेटर पर चढ़ा दो। लाख-सवा लाख रुपया रोज़ाना का बिल बनेगा। आदमी को दो-चार-पांच दिन कृत्रिम सांसों पर रखो, पांच-छः लाख तो यूं ही बन जाते हैं, उस मशीन के।

    —जे मसीन प्रान लै रई ऐं कै दै रई ऐं?

    —चचा, प्राण देती हैं, पर इस अस्वस्थ और अमानवीय स्वास्थ्य-प्रणाली में जान बचाने के दिखावी औज़ार की तरह इस्तेमाल होती हैं। मरीज़ की हालत ऐसी बना दी जाती है कि वेंटिलेटर ही एकमात्र विकल्प बचे।

    —इनकी आत्मान कूं बैंटीलेटर पै चढाऔ!

    wonderful comments!

    1. Rajindera Sachdeva जनवरी 2, 2013 at 5:34 अपराह्न

      aap bilkul theek kehte hain ji

    2. Brij Mohan Swami जनवरी 2, 2013 at 11:02 अपराह्न

      jawab nahin ashok ji...wah!

    3. Brij Mohan Swami जनवरी 2, 2013 at 11:02 अपराह्न

      jawab nahin ashok ji...wah!

    4. Brij Mohan Swami जनवरी 2, 2013 at 11:02 अपराह्न

      jawab nahin ashok ji...wah!

    5. Ankit Shukla जनवरी 3, 2013 at 1:12 पूर्वाह्न

      Such main amezing lines.....

    6. Ankit Shukla जनवरी 3, 2013 at 1:12 पूर्वाह्न

      Such main amezing lines.....

    7. Ankit Shukla जनवरी 3, 2013 at 1:12 पूर्वाह्न

      Such main amezing lines.....

    8. Ashok Chakradhar जनवरी 3, 2013 at 4:39 पूर्वाह्न

      समय छिन-छिन करके छिन रहा....

    9. Ashok Chakradhar जनवरी 3, 2013 at 4:39 पूर्वाह्न

      समय छिन-छिन करके छिन रहा....

    10. Ashok Chakradhar जनवरी 3, 2013 at 4:39 पूर्वाह्न

      समय छिन-छिन करके छिन रहा....

    11. Vikram singh जनवरी 3, 2013 at 10:37 पूर्वाह्न

      Wah bhut khub.

    12. Roma जनवरी 4, 2013 at 9:40 पूर्वाह्न

      kitna sahi bayura diya hai aaj ke hospitals ka.

    13. Roma जनवरी 4, 2013 at 9:44 पूर्वाह्न

      kaash health care laws bhi amend kiye jayen taaki aam admi ko sahi ilaaz ki suvidhayein mil payen. Kya iske liye bhi kisi 'Damini' ko bali chadna hoga?

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