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  • सबके दिलों के लैटरबॉक्स में
  • सबके दिलों के लैटरबॉक्स में

    –चौं रे चम्पू! जे सीडी कैसी ऐ तेरे हाथ में?

    –आपके लिए लाया हूं। कवि प्रदीप के गीतों की सीडी है। चचा, कमाल के सीधे-सरल गीत लिखे प्रदीप ने। आज छ: फरवरी, उनका अट्ठानवेंवां जन्म-दिन है। आजकल उनके गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगो’ की ख़ूब चर्चा हो रही है। इस साल इस गीत ने अपने पचास साल पूरे किए हैं। कल एक प्रेमी ने दी थी ये सीडी। रात भर उनके गीत सुनकर उस महान कवि की सादगी, ईमानदारी, भविष्य-दृष्टि और अदायगी पर क़ुर्बान होता रहा हूँ।

    –कौन सी बात पै सबते जादा मगन भयौ?

    –वे एक ऐसे इंसान थे जो अपनी प्रसन्नता से ज़्यादा इस बात के लिए चिंतित रहते थे कि इस देश के लोग कैसे प्रसन्न और ख़ुशहाल रहें। उनके पास ओढ़ी हुई देशभक्ति नहीं थी। जैसी थी सच्ची थी। सबकी अपनी-अपनी विचारधाराएं होती हैं, चचा। उनके पास अपने देश और बच्चों के लिए बेइंतेहा प्यार था। वे हृदय को स्पर्श करने वाली बात करते थे।

    —’ऐ मेरे बतन’ वारौ गीत सुनि कै तौ मेरे ऊ आंसू निकरि आमैं लल्ला।

    —इस गीत की बड़ी कहानियां हैं। चीन से पराजय के बाद, देश को हारी हुई मानसिकता से निकालना था। हताशा से मुक्ति पानी थी। माहीम समंदर के किनारे एक दोस्त के साथ टहलते हुए प्रदीप जी ने गीत का मुखड़ा बनाया। लिखने के लिए कागज़ नहीं था, तो सिगरेट की डिबिया पर दोस्त से पैन मांग कर लिख लिया, ’ऐ मेरे वतन के लोगो, ज़रा आंख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी, ज़रा याद करो क़ुर्बानी”। गीत का ये मुखड़ा ज़रूर है, पर गीत इससे प्रारंभ नहीं होता। प्रारंभिक पंक्तियों में एक ख़ास बात है। इस गीत की धुन उदास है, ये तो आप जानते ही हैं।

    —तू खास बात बता!

    —शुरुआत में वे कहते हैं, ‘ये शुभ दिन है हम सबका…’ हैरानी होती है। शुभ दिन है तो उल्लास से बोलो न! रोते हुए अंदाज़ की क्या ज़रूरत? आगे कहते हैं, ‘लहरा लो तिरंगा प्यारा’! चलो ठीक है, उदास रह कर भी तिरंगा लहराने की बात कर रहे हो, तो मान लेते हैं। लेकिन आगे एक लेकिन आता है, जो उदासी को सार्थकता देता है, ‘पर मत भूलो सीमा पर, वीरों ने प्राण गंवाए, कुछ याद उन्हें भी कर लो, जो लौट के घर ना आए।’ बस यहीं से गीत की उदासी हमारे इर्द-गिर्द शहीदों के प्रति हमारे दायित्व बुनने लगती है। शहीद कहीं के भी रहे हों, कोई भी हों, सिख, जाट, मराठा, गुरखा या मद्रासी, सीमा पर शहीद हुआ हर वीर भारतवासी था। लता जी का स्वर, नेहरू जी का रोना। ये ग्लोबल युग है चचा और ये गाना लोकल है। एक देश का। युद्ध अब कहीं नहीं होने चाहिए। अंतर्बाह्य कारणों से लाद दिए जाते हैं। किसे अच्छे लगते हैं? विचारधाराएं उलझ गई हैं। प्रगतिशील अगतिशीलप्राय हैं। पुनरुत्थानवादी निजोत्थानवादी हो रहे हैं। युवाओं को अब किसी नेता की ज़रूरत नहीं है। प्रदीप ने इंसाफ़ की डगर पर चलने को कहा था बच्चों से। कहा था कि तुम ही कल के नेता हो। इंसाफ़ साफ़ हो रहा है यहां-वहां से। देश फिर भी प्रगति कर रहा है। भूख, बेरोज़गारी, महंगाई और ग़रीबी भी प्रगति कर रही हैं। काश प्रदीप के इंसानवादी गीत सही मूल्यांकन पाएं। उनका एक दर्दीला गीत तो बचपन से गा रहा हूं।

    —कौन सौ गीत?

    —चलो, पिंजरे के पंछी के दर्द का गद्यानुवाद करता हूं। तेरा दर्द कोई नहीं जानता। तू बाहर बाहर ख़ामोश रहता है, भीतर भीतर रोता है। विधि ने तेरी कथा आंसू में क़लम डुबा कर लिखी है। चुपके चुपके रोने वाले, दिल के छाले छिपा कर रखना। पगले ये पत्थर का देश है, कोई तेरा नहीं होने वाला। इसलिए चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला। अकेले जैसे ही चले गए प्रदीप।

    —कोई डाक टिकट बनी का उनकी।

    —बिना लिफ़ाफ़े वे सबके दिलों के लैटरबॉक्स में डल चुके हैं चचा। क्य़ा डाक टिकिट, क्या पद्मश्री!

    wonderful comments!

    1. Sankari P Sarkar फरवरी 7, 2013 at 9:26 अपराह्न

      Your post' Sabke dilo me..." is timely.What a way to remember PoetPradeep!

    2. Sankari P Sarkar फरवरी 7, 2013 at 9:26 अपराह्न

      Your post' Sabke dilo me..." is timely.What a way to remember PoetPradeep!

    3. Sankari P Sarkar फरवरी 7, 2013 at 9:26 अपराह्न

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    4. Ashok Solanki फरवरी 8, 2013 at 4:07 अपराह्न

      Happy Birth Day Sir ji...

    5. Ashok Solanki फरवरी 8, 2013 at 4:07 अपराह्न

      Happy Birth Day Sir ji...

    6. Ashok Solanki फरवरी 8, 2013 at 4:07 अपराह्न

      Happy Birth Day Sir ji...

    7. Manish Chaturvedi फरवरी 8, 2013 at 11:51 अपराह्न

      janamdin ki shubhkamnayin

    8. Manish Chaturvedi फरवरी 8, 2013 at 11:51 अपराह्न

      janamdin ki shubhkamnayin

    9. Manish Chaturvedi फरवरी 8, 2013 at 11:51 अपराह्न

      janamdin ki shubhkamnayin

    10. Krishankant Mundra फरवरी 9, 2013 at 12:13 पूर्वाह्न

      bhai sab aapko janmdin ki bhot bhot shubhkamnaye

    11. Krishankant Mundra फरवरी 9, 2013 at 12:13 पूर्वाह्न

      bhai sab aapko janmdin ki bhot bhot shubhkamnaye

    12. Krishankant Mundra फरवरी 9, 2013 at 12:13 पूर्वाह्न

      bhai sab aapko janmdin ki bhot bhot shubhkamnaye

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