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  • मैं और मेरा घुटना अक्सर

    —चौं रे चम्पू! तेरे घौंटू कौ दर्द भौत परेसान करि रह्यौ ऐ का?

    —घुटने का दर्द तो अब इतना परेशान नहीं कर रहा। परेशानी दूसरे कारणों से है। छः हफ्ते तक धरती पर ये पांव नहीं टिका सकते। न कहीं जा सकते, न कहीं से आ सकते। आज ग्यारहवां दिन है। टांके कल कट गए हैं। बिस्तर में पड़े-पड़े, मैं और मेरा घुटना अक्सर तन्हाई में बातें करते हैं।

    —का बात करैं तू और तेरौ घुटना?

    —मैं और मेरा घुटना अक्सर, तन्हाई में बातें करते हैं। तू श्रेष्ठ या कि मैं श्रेष्ठ, हमारे अहंकार दम भरते हैं। यादों में जीते-मरते हैं, आवेगपूर्ण यदि अनजाने, मैं हाथ धरूं उनके ऊपर तो श्रीमान जी डरते हैं। कुछ दर्द उन्हें, कुछ दर्द हमें, जी कमी नहीं है दर्दों में, जब बैठे हैं बतियाने को तो क्यों बैठेंगे पर्दों में? मैं कहता अपने घुटने से, हम दौड़े-भागे कहां-कहां! घूमे इस पूरी धरती के छोरों को छूने यहां-वहां। मेहंदी की झाड़ी के पीछे छिपकर स्नान किया अपनेपन के प्रकाश की वर्षा में, ले गया मुझे अपने बल पर जब-जब मिलने को तरसा मैं।

    —अरे, वाह रे आसू कबी!

    —मैं कभी पेड़ पर चढ़ा कभी कूदा नीचे, फांदा कांटों की झाड़ी के पीछे। था तेरा भरोसा, मार पालथी खोल परोसा। खाईं मैंने मिस्सी रोटी मक्खन वाली, जी दही बिना ढक्कन वाली। तेरे बलबूते बैठा मेरी साइकिल पर अपना कोई या कोई ऐरा-ग़ैरा भी, यमुनाजी में घी का डिब्बा लेकर मैं तैरा भी। यह तेरी ही तो थी माया, तू महानगर तक ले आया।

    —वाह, बोलतौ जा।

    —फिर नगर-नगर की डगर-डगर की जगर मगर, वरसोवा के अंधियारे के सागर के तट चिकने पत्थर। संतुलन बनाया तूने ही, मैं फिसल न जाऊं, मुझे बचाया तूने ही। क्या हुआ आज निश्चेष्ट पड़ा! ना तो मुड़ता, ना हुआ खड़ा!

    —तेरौ घौंटू चुप्प सुनतौ ई रह्यौ का?

    —नहीं चचा! वह भी बोला, उसने भी अपना मुंह खोला, ओ बिना मसाले के डोसे! ख़ुद नाम चक्रधर रखे और मुझको कोसे!! चक्कर है तेरे चरणों में, चक्कर तेरे आचरणों में! देता ही आया मुझे सदा कष्टों की अतुलित मात्राएं, अनचाही अनगिन यात्राएं! हर बार सोचता था कह दूं, रुक ले, रुक ले, थोड़ा टिक ले! पर नहीं नहीं, तुझको कल ही फिर जाना है, परसों का टिकिट कटाना है। तू भूल गया मैंने ही तो इस धरती पर था तुझको चलना सिखलाया, घुटनों-घुटनों कौए के पीछे कभी-कभी मैया या गैया के पीछे आया। तूने चाहा हो जाऊं खड़ा अपने बल पर जल्दी जल्दी, उठ खड़ा हुआ तो भूल गया मैंने ही तो तुझको गति दी। माना ही नहीं बात मेरी, रुक ले, टिक ले! तो अब बिस्तर में ही सिक ले। अब छोड़ फिकर बस्ते की कपड़े-लत्ते की या रस्ते की, ले, गई तेरी छ: हफ़्ते की!

    —परेसान मत होय चम्पू! छः हफ्ता तौ यौं ई बीत जांगे।

    —परेशानी उस समय ज़्यादा होती है जब मित्र-शुभचिंतक नसीहत देने लगते हैं कि आइन्दा साइकिल मत चलाना। मुझे इस मामले में लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार जी की बातें बहुत अच्छी लगीं।

    —अच्छा! फोन आयौ का उनकौ?

    —हां चचा। दरसल, पांच अप्रैल को बाबू जगजीवन राम जी के जन्मदिन के कविसम्मेलन में मुझे जाना था। पिछले अनेक वर्ष से जा रहा हूं, स्नेह मानती हैं वे। नहीं पहुंच पाया तो फोन पर उन्होंने विस्तार से सारी जानकारियां लीं। जल्दी पुनः साइकिल चलाने की शुभकामना दी और बताया कि वे भी साइकिल चलाना चाहती हैं। जब बेल्जियम गईं थीं तो उन्होंने देखा था कि उनकी उम्र की महिलाएं साइकिल चला रही थीं। मैंने कहा, आप तो अपने घर में ही चला सकती हैं। वे अपनी बच्चों जैसी हंसी में खिलखिलाईं। फिर चचा उन्होंने एक और बात बताई।

    —का बताई?

    —उन्होंने बताया कि उन्नीस सौ सैंतालीस में एक दुर्घटना हुई थी। बाबूजी का हवाई जहाज गिर गया था बसरा के रेगिस्तान में। वे सर्वाइवर थे, उस समय मेडिकल साइंस इतनी उन्नत नहीं थी। जैसे-तैसे उन्होंने कुछ किया-कराया। उनकी तो नी कैप ही निकल गई थी। ताउम्र छड़ी रखी अपने पास, सैंतालिस से लेकर छियासी तक। हमेशा चले, काम किए। आप भी पूरी तरह ठीक हो जाएंगे। मैंने कहा, थैंक्यू मीरा जी।

    wonderful comments!

    1. वी के जोशी अप्रैल 10, 2013 at 3:33 अपराह्न

      अशोक जी आप तो कष्ट में भी रचना कर लेते हो. बलिहारी है आपकी. बस आप पुनः साईकिल चलाने लगें यही हमारी कामना है.

    2. sushil choudhary अप्रैल 10, 2013 at 4:01 अपराह्न

      'Subeh ka har pal zindagi de aapko, Din ka har lamha khushi de aapko, Jahaan gum ki hawa chhoo ke bhi na gujre, Khuda woh Jannat ki zami de aapko....! '

    3. vishwat sen अप्रैल 10, 2013 at 9:40 अपराह्न

      अनेकार्थों में छुपा भाव बहुत कुछ कह रहा है। दर्द तो घुटनों का है, लेकिन उभर कहीं और रहा है। सादर प्रणाम।

    4. rajendra rao अप्रैल 11, 2013 at 12:47 पूर्वाह्न

      bahut achha laga aapka yah prayas.Isi ko kahte hain creating opportunity in adversity.anek shubhkamnaon ke saath agli racna ki pratiksha me Rajendra Rao

    5. Anju Juneja अप्रैल 11, 2013 at 10:47 पूर्वाह्न

      अगर आप आम हो , बिना पहचान हो हर दिन जलालत के वार पड़ते हैं हर राह पे आत्मा ,घुटने ,कुहनिया छिलते हैं

    6. Jaidev Jonwal अप्रैल 17, 2013 at 4:41 अपराह्न

      Guru Ji Ko Parnaam. Dard mein bhi muskuraane ka hunar rakhte hai.. bahut khoob hai aap. apne jhakmo ko haste huye bharte hai.. ishwar apko jald se jald swasth karde aapki lambi umar ki duaa aur subhkamnayein.. aap aur apki cycle ek dusre se jyda dino door na rahe. Charan Sparsh, Jaidev Jonwal

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