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  • मेरे गुरु मेरे पिता
  • मेरे गुरु मेरे पिता

    —चौं रे चम्पू! तेरे हाथ में जे फाइल कैसी ऐ रे, और थैला में का ऐ?

    —चचा, थैले में पुस्तकें हैं मेरे पिता श्री राधेश्याम प्रगल्भ की लिखी हुई। आज उनका जन्मदिन है, बीस फरवरी। बगीची के पुस्तकालय को भेंट करने के लिए लाया हूं।

    —हम तौ भौत दिनान ते मांग रह्ये ऐं रे।

    —देखिए ये नाटक है, ‘पंचों का फैसला’, सन छ्प्पन में साक्षरता निकेतन से छपा था और पुरस्कृत भी हुआ था। देश के नवसाक्षरों ने इसको बड़ी रुचि से पढ़ा और खेला। ये ‘मीरा’ है, इस नाटक का अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ। ‘राह अनेक, मंजिल अनेक’ में एकांकी हैं उनके। बच्चों के लिए ख़ूब लिखा उन्होंने। लीजिए, ये बहुत सारी किताबें हैं, उनके काव्य-संकलन, कथा-साहित्य, जीवनियां। वे मूलतः भूगोल के अध्यापक थे। बाद में हिन्दी में भी एम.ए. किया, लेकिन भूगोल की अवधारणाओं को उन्होंने कविता में प्रस्तुत किया। ‘सूरज की बेटी’ को बचपन में लिए-लिए घूमा करता था। उनके बाल उपन्यास हैं, ख़ुद पढ़ के बताइएगा। ’माटी की महक’ में उनकी राष्ट्रीय कविताएं हैं। ’समय के पंख में’ व्यंग्य की और ’ब्रज कूं बिनत प्रणाम’ में ब्रजभाषा की। ‘बिन्दो बुआ’ में रेखाचित्र हैं। ‘टेसू और झांझी’ उनके लिखे हुए बहुत सारे रेडियो रूपकों का संकलन है।

    —चल जे तो तैनैं अच्छौ मसालौ दै दयौ। हफ्ता, दो हफ्ता प्रगल्भ जी कूं पढ़िंगे। फाइल में का ऐ?

    —चच, किताबें बीस फरवरी की याद में थीं और ये फाइल तेरह मार्च से जुड़ी है। तेरह मार्च उन्नीस सौ निन्यानवै को वे बहत्तर वर्ष की आयु में चले गए थे। उनके जाने के बाद जो चिट्ठियां आईं, उसमें जो लोगों ने लिखा, उससे शायद आपको उनके बारे में कोई अन्दाजा लगे। चिरंजीत मानते थे कि प्रगल्भ जी उच्चकोटि के सामाजिक और राजनैतिक चेतना के कवि थे। शेरजंग गर्ग ने कहा कि प्रगल्भ जी मनुष्य के रूप में दुर्लभ व्यक्तित्व के धनी थे। व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों एकाकार थे उनके। ये रमेश कौशिक का लम्बा पत्र है, एक जगह कहते हैं, उन जैसा व्यक्तित्व इस युग में अब मिलना मुश्किल है। जैमिनी हरियाणवी ने कहा कि जब कभी शराफ़त, इंसानियत मेरे आस-पास मंडराएगी तो बड़े भाई आपकी बड़ी याद आएगी। चचा, उनका व्यक्तित्व आत्मीयता से भरा था। वे अपनी कविता और आचरण दोनों में प्रगतिशील थे। किसी ने लिखा कि मृत्यु ने हमारा मुखर मार्गदर्शक छीन लिया है, वे बड़ी से बड़ी विपत्ति में भी कभी विचलित नहीं हुए। ब्रज गोविन्द व्यास ने लिखा कि उनका व्यक्तित्व बड़ा जुझारू था, इसके बावजूद हमने उनके मुखर विरोधी कभी नहीं देखे।

    —हां, जे बात तौ सही ऐ लल्ला। उनकौ कोई विरोधी नायं हतौ।

    —रहे होंगे चचा, लेकिन ऐसे विरोधी नहीं जैसे मैंने पाल लिए हैं। मेरे तो प्रच्छन्न भी हैं, प्रकट भी हैं, लेकिन उनका न कोई विरोधी नहीं था, क्योंकि उनकी महत्त्वाकांक्षाएं ही नहीं थीं। जितने भर उनके शिष्य, मित्र या अनुज साथी थे, उनका ऐसा ही स्वर दिखेगा इन पत्रों में जैसा ओंकार गुलशन ने लिखा कि जीवन में जब भी उलझन, अड़चन, अंधकार आया, सदैव उन्होंने मुझे मार्ग दिखाया। राजा खुगशाल लिखते हैं कि वे नागार्जुन और त्रिलोचन की परम्परा के फक्खड़ कवि थे। रमेश कौशिक तो कहते हैं कि बाल साहित्य के लिए उनके नाम से एक पुरस्कार स्थापित होना चाहिए।

    —तौ कराय न! तेरौ काम ऐ, उनके नाम ते पुरस्कार चालू करा।

    —चचा, मेरे तो वे हृदय में बसे हैं और समाज के लिए पुरस्कार के रूप में वे मुझे छोड़ गए। मैंने जो कुछ भी समाज के लिए अच्छा किया है, वह उनके द्वारा दिया गया है, बाकी जितना ख़राब है, उसका दोषी मैं ही हूं। वे न केवल मेरे पिता थे, बल्कि गुरु भी थे। उनकी दो पंक्तियां सदैव मेरे लिए नीतिशास्त्र का काम करती हैं।

    —हां, पंक्ती सुनाय दै तू!

    —’दिन के उजेरे में न करो कोई ऐसा काम, नींद जो न आए तुम्हें रात के अंधेरे में, और रात के अंधेरे में न करो कोई ऐसा काम, मुंह जो तुम छिपाते फिरो दिन के उजेरे में।’

    —अरे वाह! प्रगल्भ जी की बात ही निराली हती।

    wonderful comments!

    1. मुकेश जोशी फरवरी 21, 2013 at 6:25 अपराह्न

      मेरी गुरु मेरी माता,

    2. मुकेश जोशी फरवरी 21, 2013 at 6:25 अपराह्न

      मेरी गुरु मेरी माता,

    3. मुकेश जोशी फरवरी 21, 2013 at 6:25 अपराह्न

      मेरी गुरु मेरी माता,

    4. Vishal Sharma फरवरी 22, 2013 at 7:46 पूर्वाह्न

      Aap Kush Nasib Hai Aap Ka Pita Hi Aap Ka Guru Hai jo Pita Ki Darohar Aapko Verasat Ma Meli

    5. Vishal Sharma फरवरी 22, 2013 at 7:46 पूर्वाह्न

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    7. Anand Maheshwari फरवरी 22, 2013 at 8:08 अपराह्न

      Dear Ashokji, Can you help me in getting the Audio CD collection of a Hasya Kavi Collection named "Chakallas" and also "Kaka Hathrasi Hasya Kavi Purushkar Samaroh" Both these collection are about 25 or 30 years old.

    8. Anand Maheshwari फरवरी 22, 2013 at 8:08 अपराह्न

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    9. Anand Maheshwari फरवरी 22, 2013 at 8:08 अपराह्न

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    10. Anu Sharma फरवरी 23, 2013 at 6:34 अपराह्न

      http://www.youtube.com/watch?v=V09CA2d_IzU

    11. Anu Sharma फरवरी 23, 2013 at 6:34 अपराह्न

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    12. Anu Sharma फरवरी 23, 2013 at 6:34 अपराह्न

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    13. Sunil Dutt Pathak फरवरी 23, 2013 at 9:08 अपराह्न

      if it is about 'Pragalbh ji', it should also include the famous lines of 'Kaka Hathrasi' - "Kaka ke samadhi bane beta radheshyam" Regards.

    14. Swati Shree मार्च 1, 2013 at 9:29 अपराह्न

      sir mere papaji ko aap bahot pasand the unhi ke saath aapke programs jo aate the vo dekhti thi.. aaj apko dekhkar bahot khusi hui....

    15. Swati Shree मार्च 1, 2013 at 9:29 अपराह्न

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    16. Swati Shree मार्च 1, 2013 at 9:29 अपराह्न

      sir mere papaji ko aap bahot pasand the unhi ke saath aapke programs jo aate the vo dekhti thi.. aaj apko dekhkar bahot khusi hui....

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