मुखपृष्ठ>
  • चौं रे चम्पू
  • >
  • मानवीय समझदारियों का आवागमन
  • —चौं रे चम्पू! कोई भड़िया कबिसम्मेलन भयौ का पिछले दिनन में?

    —कविसम्मेलन तो बहुत हुए, लेकिन बढ़िया पूछकर आपने बढ़िया काम किया। वैसे यह एक पेचीदा सवाल है। कविसम्मेलन लोकरंजन है। श्रोता प्रसन्न हों, तालियां बजाते रहें, कविताएं उनकी समझ में आती रहें, यह कविसम्मेलन की पहली शर्त होती है, लेकिन कविता के नाम पर लतीफ़े हों, दूसरे के भावों को चुराने वाले वक्तव्य हों, चोरी की टिप्पणियां हों, टोटकेबाजी हो तो कविसम्मेलन बढ़िया कहां रह पाता है। चार दिन पहले बयालीसवां श्रीराम कविसम्मेलन हुआ था और इस मामले में आयोजकों को दाद देनी पड़ेगी कि वे कविता के स्तर को बनाए रखने में भरोसा रखते हैं। विनय भरत राम स्वयं रुचि लेकर अच्छे से अच्छे कवियों की खोज करवाते हैं। तुम्हारा चम्पू भी तीस-पैंतीस साल से इस कविसम्मेलन से जुड़ा हुआ है। पंद्रह-बीस साल संचालन करते हुए भी हो गए होंगे। यहां की शर्त यही होती है कि न्यूनतम लतीफ़ेबाजी, टोटकेबाजी हो।

    —अच्छी कबता भईं का?

    —हुईं चचा, और वहां प्राय: अच्छी कविताएं ही होती आ रही हैं। इस बार भी जहां एक ओर नीरज जी, बेकल उत्साही, उदय प्रताप सिंह जैसे वरिष्ठ कवि थे तो मधुमोहिनी, प्रमोद तिवारी, सूर्य कुमार पांडे जैसे स्थापित नाम भी। नौजवान कवियों में विनय विश्वास, आलोक श्रीवास्तव और वर्तिका नन्दा, सभी ने अच्छी कविताएं सुनाईं। चार घंटे तक शब्दों की धारासार वर्षा। हास्य-विनोद ख़ूब हुआ पर एक भी घिसापिटा लतीफ़ा नहीं सुनाया गया। अब इस कविसम्मेलन का एक अलग तरह का मिजाज़ बन चुका है।

    —का मिजाज बन चुकौ ऐ रे?

    —हर बार मंच की सज्जा देश के किसी प्रांत की पृष्ठभूमि पर होती है। इस बार थीम थी राजस्थान। हर बार एक दिवंगत कवि की कविताओं का पाठ होता है, जिसे अक्सर तुम्हारा चम्पू करता है। इस बार चूंकि डॉ. हरिवंश राय बच्चन की जन्मतिथि सत्ताइस नवम्बर निकट थी, इसीलिए उनकी कविताओं का पाठ किया गया।

    —सुरू कैसै भयौ?

    —सबसे पहले उद्घोषिका के तौर पर दूरदर्शन की चिरपरिचित समाचारवाचिका सरला माहेश्वरी आती हैं, वे कवियों का परिचय देकर डॉ. विनय भरतराम से कवियों का स्वागत कराती हैं। लाला श्रीराम के प्रति लिखी गई एक कविता और सर्वधर्म वन्दना कराने के बाद वे कोई बोधकथा सुनाती हैं और माइक संचालक को सौंप देती हैं।

    —का बोधकथा सुनाई?

    —कुछ था उस कथा में सावन, बादल और फूल पर मंडराती तितलियों के बारे में। मुझे माइक सौंपा गया तो मैंने कुछ उल्टी सी बात कही, ‘एक डाल पर खिली हुई थी इक तितली, कितने फूल वहां आकर मंडराए थे। बादल लेटा रहा धूप में देर तलक, उसके ऊपर इक बदली के साए थे।’ फिर मैंने बच्चन जी की छोटी-छोटी कविताएं सुनाईं। एक कविता मैंने उनके श्रीमुख से सन पैंसठ में सुनी थी। जो तत्काल याद भी हो गई थी।

    —सुना लल्ला, ऐसी कबता तौ जरूर सुना।

    —ये कविता बच्चन जी ने पचास-साठ के दशक के उस दौर में लिखी थी, जब कविताओं में बिम्बों और प्रतीकों का बोलबाला था। जनता से कटी हुई अकविताएं, नकविता, नई कविता, भूखी पीढ़ी, श्मशानी पीढ़ी, नकेनवाद, प्रपद्यवाद, प्रयोगवाद जैसे अनेक नामों से लघु पत्रिकाओं में अपना स्थान बना रही थीं। तब अकविता आंदोलन के प्रति व्यंग्य भरी एक कविता बच्चन जी ने लिखी थी, भाव उसका यह था कि एक थे ईर, एक थे बीर, एक थे फत्ते, एक थे हम। चारों ने चाहा कि कविता लिखें, छपाएं और इनाम लें। ईर को मिला ईर इनाम, बीर को मिला बीर इनाम, फत्ते को मिले तीन इनाम तो हमको मिली बदनामी, पर दुश्मनों की दुआ, कि सबसे ज़्यादा नाम हमारा ही हुआ।

    —बहुत खूब!

    —मैं हमेशा कहता हूं कि नई कविता के कवि पुस्तक के कवि हैं, लेकिन कविसम्मेलन के कवि उस तक के कवि हैं, जो जनता तक जाते हैं। इन दोनों के बीच एक पुल बन सके और पुस्तक की कविता उस तक जा पाए और उस तक की कविता पुस्तक में स्थान पाए, ऐसा होना चाहिए। हर बढ़िया कविसम्मेलन एक पुल होता है, जो शब्दों, अर्थों, तालियों, वाह-वाहों और मानवीय समझदारियों का आवागमन कराता है। मानोगे!

    wonderful comments!

    1. Pankaj Bunker Jan 5, 2013 at 11:58 pm

      Khoob

    2. Pankaj Bunker Jan 5, 2013 at 11:58 pm

      Khoob

    3. Pankaj Bunker Jan 5, 2013 at 11:58 pm

      Khoob

    4. Sab TheeK Hai My poetry collection Jan 6, 2013 at 4:55 am

      . "jab sawal karegi tuzhse wo raat, kya jawab dogi poochegi wo tuzhse kesa wo bachpana tha, kya jawab dogi, jab poochegi pyar ko pyar diya, to kyu judai ka gam diya gam-e-ulfat tuzhse door jab wo le ja raha tha, apni zindagi ko naam tere karte ja raha tha tuzhe gam se itna pyar kyu ho gaya jab pakdengi, fir jakdengi, bahe tuzhe kisi gair ki, wesi he raat fir aa jayegi, aur legi khabar tere khair ki, poochegi pyar ko vyapaar banaya, ye dewwangi kesi hai, kya jawab dogi jab sawal karegi tuzhse wo raat, kya jawab dogi poochegi wo tuzhse kesa wo bachpana tha, kya jawab dogi,"

    5. Sab TheeK Hai My poetry collection Jan 6, 2013 at 4:55 am

      . "jab sawal karegi tuzhse wo raat, kya jawab dogi poochegi wo tuzhse kesa wo bachpana tha, kya jawab dogi, jab poochegi pyar ko pyar diya, to kyu judai ka gam diya gam-e-ulfat tuzhse door jab wo le ja raha tha, apni zindagi ko naam tere karte ja raha tha tuzhe gam se itna pyar kyu ho gaya jab pakdengi, fir jakdengi, bahe tuzhe kisi gair ki, wesi he raat fir aa jayegi, aur legi khabar tere khair ki, poochegi pyar ko vyapaar banaya, ye dewwangi kesi hai, kya jawab dogi jab sawal karegi tuzhse wo raat, kya jawab dogi poochegi wo tuzhse kesa wo bachpana tha, kya jawab dogi,"

    6. Sab TheeK Hai My poetry collection Jan 6, 2013 at 4:55 am

      . "jab sawal karegi tuzhse wo raat, kya jawab dogi poochegi wo tuzhse kesa wo bachpana tha, kya jawab dogi, jab poochegi pyar ko pyar diya, to kyu judai ka gam diya gam-e-ulfat tuzhse door jab wo le ja raha tha, apni zindagi ko naam tere karte ja raha tha tuzhe gam se itna pyar kyu ho gaya jab pakdengi, fir jakdengi, bahe tuzhe kisi gair ki, wesi he raat fir aa jayegi, aur legi khabar tere khair ki, poochegi pyar ko vyapaar banaya, ye dewwangi kesi hai, kya jawab dogi jab sawal karegi tuzhse wo raat, kya jawab dogi poochegi wo tuzhse kesa wo bachpana tha, kya jawab dogi,"

    7. Ratnakar Sharma Jan 7, 2013 at 4:51 am

      kavi sammelan ki garimaa aise hi banaaye rakhiye.. God bless.

    8. Ratnakar Sharma Jan 7, 2013 at 4:51 am

      kavi sammelan ki garimaa aise hi banaaye rakhiye.. God bless.

    9. Ratnakar Sharma Jan 7, 2013 at 4:51 am

      kavi sammelan ki garimaa aise hi banaaye rakhiye.. God bless.

    प्रातिक्रिया दे