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  • फूलों से शर्मिंदा हूं

    —चौं रे चम्पू! का सोच में पड़्यौ ऐ रे, कौन सी चिंता सताय रई ऐ?

    —चिंता मुझे नहीं है, चचा। मेरे सहयोगी हैं राजीव जी, उनको तरह-तरह के विचार समय-समय पर आते रहते हैं। बड़े मौलिक, मूलभूत सवाल मानवीय चिंताओं से लबरेज़ रहते हैं। मैट्रो रेल में आते-जाते समय अपनी चिंतन-चक्की चलाते हैं। कल बोले कि कमाल है, जिस नाभि से गर्भस्थ शिशु को पूरा आहार-पोषण-जीन्स-ज्ञान मिलता है, जन्म लेने के बाद उस मार्ग को काट दिया जाता है, फिर भोजन मुख से प्राप्त होता है। बाकी ज्ञानेन्द्रियों से ज्ञान। धीरे-धीरे आदमी नाभि की महत्ता को भूल जाता है। ऐसा क्यों होता है? उनकी बात में दम था चचा।

    —जे तौ है! आदमी चौं नायं सोचै, सब सोचैं। रीतकाल के कबी सोचौ करते।

    —हां चचा, रीतिकालीन कवियों को नाभि कामोत्तेजक लगती रही। नाभिदर्शना साड़ी पहनकर महिलाएं स्वयं को आकर्षक मानती हैं। पुरुष की नाभि में स्त्री की भी रुचि होती होगी, पर साहित्य ने उस पर कोई प्रकाश नहीं डाला। अपना एक अनुभव बताऊं हवाईजहाज का? मैंने तुक मिला कर लिख भी दिया था।

    —सुना! अपनौ अनुभव जरूर सुना।

    —हादसा अभी-अभी घटा है, मैं उस विमान में हूं जो बिल्कुल अभी फटा है। मेरी डायरी ब्लैक-बॉक्स तो है नहीं जो मिल जाएगी, घटना, दिमाग के ब्लैक-बॉक्स में रिल-मिल जाएगी! ओम् शांति! अले, अले, अले, अले, अले मैं तो जीन्दा ऊं, औल विमान भी साबूत है, न कोई अर्थी न ताबूत है। क्या ये मेरी कल्पनाओं का खोट था! नहीं नहीं नहीं, विमान परिचारिका की आधी ढकी साड़ी से हुआ शक्तिशाली नाभिकीय ऊर्जा विस्फोट था। ओम शान्ति शान्ति शान्ति!!!

    —वाह पट्ठे!

    —आगे तो सुनो! मन में था पाप, अब करता है शांति का जाप। ख़ैर मना कि इतनी बड़ी दुर्घटना में बच गया बावले। भंवर से निकल आया जीवन की नाव ले। ग़नीमत है कि सांसों में धड़कन बाकी है, पर मानेगा कि सौंदर्य की वही विस्फोटक झांकी है जो आधी ढकी है, आधे से ही विस्फोट कर सकी है। संपूर्ण खुलेपन में क्या रखा है अनाड़ी, आधे की झलक में और संपूर्ण की ललक में सबसे भव्य, सबसे मोहक सबसे विस्फोटक है– साड़ी।

    —जामैं का सक!

    —लेकिन चचा मुक्तिबोध ने सम्पूर्ण खुलेपन से नाभिनालबद्ध लोगों के बारे में लिखा।

    —उनकी ऊ बता!

    —उन्होंने मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों पर प्रहार किया। साहित्यकार चुप हैं, कविजन निर्वाक् हैं। चिंतक, शिल्पकार, नर्तक चुप हैं। उन्हें जन-मन उद्देश्यों का दमन दिखाई नहीं देता। उनके ख़याल से ये सब गप है। उन्होंने लिखा, ’रक्तपायी वर्ग से नाभिनालबद्ध ये सब लोग, नपुंसक भोग-शिरा-जालों में उलझे’। ये वे लोग हैं जो खून चूसने वाले शोषकों से नाभिनालबद्ध हैं। अगर ख़ून चूसने वाले लोग न हों तो इनका आहार-पोषण बन्द हो जाए। रक्तपायी वर्ग कहां नहीं है? नेता हैं, शासन है, प्रशासन है। उनके बलबूते पलने वाली नौकरशाही है। सब वहीं से दाना-पानी पाते हैं। अगर ऊपर खाना-पीना बन्द हो जाए तो इन नाभिनालबद्ध लोगों का पोषण रुक जाए। रक्तपायी, पूंजीपायी, धर्मपायी वर्ग को खाने-पीने के बाद मुंह पोंछने का समय भी कहां मिलता है। जो थोड़ा-बहुत मिलता है उसमें नाभिनालबद्ध लोग वन्दन, चाटुकारिता, अभिनन्दनों का आयोजन कर देते हैं। ख़रीदे हुए लोग स्वामी की भाषा बोलते हैं। विडम्बना ये है कि जनता के पक्षधर बुद्धिजीवी भी चाहे-अनचाहे नाभिनालबद्ध हो जाते हैं।

    —लल्ला तू उन्ते अलग ऐ का?

    —नहीं चचा, उनसे अलग नहीं हूं। क्या बतलाऊं सुविधाओं में कैसे कैसे ज़िन्दा हूं, गुलदस्ते में फूल सजा कर फूलों से शर्मिंदा हूं। कहा जाता है कि रावण ने नाभि के तत्व से ही अपने दस सिरों का निर्माण किया था। भविष्य चिकित्सा विज्ञान भी क्लोनिंग के लिए नाभि के ऊतकों का सहारा ले रहा है। आगे पता नहीं क्या हो, लेकिन आज के रावण से कितने लोग नाभिनालबद्ध हैं? दस नहीं हैं, दस हजार नहीं हैं, नाभि से खाने वाले दस लाख से भी ज़्यादा हैं, पर बहुत ज़्यादा भी नहीं हैं। अच्छे तो वे बाकी लोग हैं जो खानाख़राब हैं। पेट में इसी बात का मरोड़ है।

    —जादा मरोर ऐ तौ सुन! अपनी नाभी पै हींग मल्लै! सबरे दर्द खतम है जांगे। जे घरेलू नुस्खा अपनाय कै तौ देख।

    wonderful comments!

    1. Rajeev Rastogi मार्च 6, 2013 at 6:13 अपराह्न

      क्यों ?

    2. Rajeev Rastogi मार्च 6, 2013 at 6:13 अपराह्न

      क्यों ?

    3. Rajeev Rastogi मार्च 6, 2013 at 6:13 अपराह्न

      क्यों ?

    4. PARVEEN SHARMA मार्च 7, 2013 at 9:20 अपराह्न

      sir article bhee kapas ka phool laga.

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