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  • धर्मगुरु, चर्मगुरु और मर्मगुरु
  • धर्मगुरु, चर्मगुरु और मर्मगुरु

    —चौं रे चम्पू! ऐसी सर्दी देखी का तैनैं दिल्ली में, पारौ एक तक आय गयौ ओ?

    —चचा, दिल्ली में मौसम बड़े अलग-अलग तरह के तेवर दिखाता है। दिल्ली ठंडी हो गई है। अचानक उफान आता है तो लगता है कि मौसम के मिजाज़ को सचमुच बदल देगी युवाओं के आक्रोश की गर्मी। फिर सब कुछ शीतल हो जाता है। बिना किसी राजनीतिक नेतृत्व के युवाओं का जैसा आक्रोश मीडिआ ने दिखायऍा, अकल्पनीय था। क्या करें ये युवा? पारा फिर नीचे आ जाता है।

    —जो जाके मन में आय रई ऐ, बोल रह्यौ ऐ रे। आसाराम बापू.. सरद यादव!

    —सवाल ये है कि मानवता कितनी है किसके अंदर। धर्मगुरु प्राय: स्त्री-विरोधी होते हैं। चर्मगुरु फ्रॉयड की वाणी बोलते हैं। मर्मगुरु मौन धारण कर लेते हैं। अब तस्वीर का दूसरा पहलू भी सामने आया है। बलात्कारी तो नृशंस हत्यारे और घिनौना काम करने वाले थे ही, वे लोग भी कम घिनौने और कम नृशंस नहीं थे जो नग्नप्राय युवक-युवती को सड़क पर पड़ा देखकर मुंह फेरते रहे। अगर सही है तो वे पुलिसवाले भी, जो यही तय करते रह गए कि ये मामला किस थाने की परिधि का है? वक़्त और ख़ून बहता रहा। खून सर्द हो गया है चचा। पारा एक से भी नीचे आ गया है। अब एक सवाल और भी है।

    —सो बता!

    —बलात्कारियों को फांसी चढ़ा दिए जानेभर से क्या बलात्कार रुक जाएंगे! सोलह दिसम्बर के बाद हर दिन बलात्कार की घटनाएं सामने आ रही हैं। ये रुकने वाली हैं क्या?

    —कैसी बात करि रह्यौ ऐ लल्ला? रुकिंगी चौं नाय? हम इंसान हतैं कै नायं?

    —हां इंसान हैं, लेकिन शरद यादव के अनुसार एक शरीर भी हैं। भय जिस समाज में कम हो जाए वहां दिक्कतें आती हैं। कड़े कानून नहीं हैं, ये बात तो है ही, लेकिन दरिन्दगी से भरे दिमाग़ की ग़न्दगी को निकालने के लिए जिस शिक्षा, संस्कृति और सुव्यवस्था की ज़रूरत है, वह सामने नहीं आती। अपराधी, अपराध करते समय समझता है कि पकड़ा नहीं जाएगा। उसकी हवस बुझने के लिए उतावली हो जाती है और उस बावली उतावली में अंधी हो जाती है। इस अन्धत्व को अन्दर का उजाला ही दूर कर सकता है। जब तक हम स्त्री के प्रति सम्मान भाव मन में नहीं भरेंगे, जब तक हमारी शिक्षा प्रणाली, हमारे सांस्कृतिक मूल्य इंसानियत से भरपूर नहीं होंगे, तब तक ये वारदात नहीं रुकेंगी। सोलह दिसम्बर बारह के बाद तो पता नहीं पारा कहां-कहां गिर गया, इसका कोई पारावार है क्या? कहीं बच्चों के साथ यौन शोषण हो रहा है। कहीं नेता लोग बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार किए गए हैं। पुणे में हुआ, उसके बाद सहारनपुर नौएडा में हुआ। कहां-कहां तक कैमरा लगाएंगे और कहां-कहां तक पुलिस अपराधियों को अपनी गिरफ्त में ले पाएगी। हर थाने पर महिला पुलिसकर्मी होगी, बड़ी अच्छी बात है, लेकिन ये भी एक समाचार आया कि महिला पुलिसकर्मी के साथ भी बस में छेड़खानी हुई।

    —सादा बर्दी में रई होयगी।

    —हां, शायद! मैं अपना एक दूसरा अनुभव बताता हूं चचा। कुछ दिन पहले मैं अपनी कॉलोनी में रात में टहल रहा था। मैंने देखा कि सड़क पर चार दबंग लड़के एक शरीफ़ से युवक को बाध्य कर रहे थे कि कहीं फोन मिलाए। बीच-बीच में उसे पीट भी देते थे। जीप की हैडलाइट जली हुई थीं। मैं निर्भीक होकर उनके पास गया और पूछा कि भई ये क्या कर रहे हैं आप लोग! चचा, उन्होंने मुझे बुरी तरह से मुझे डरा दिया, भाग जा, भाग जा। अरे, मुझे हैरानी हुई, क्या ये मेरी कॉलोनी है। मैंने सौ नम्बर को फोन मिलाया, जीप का नंबर बताया। उसके बाद हुआ क्या चचा, पुलिस के अलग अलग लोगों से मेरे पास सौ फोन आ गए। टोन ऐसी जैसे फोन करके मैंने अपराध कर दिया हो। हर बार मैंने अपना नाम बताया, कोई एक पुलिसकर्मी शायद पहचान गया। उसके बाद फोन आने का सिलसिला रुका। क्या बताऊं चचा, ये एक दुष्चक्र है जिसे ध्वस्त करने के लिए मर्मगुरुओं को चुप्पी तोड़नी होगी। नागरिक जन, पुलिस, शासन-प्रशासन सभी को अपने अन्दर के उस इंसान को जगाना होगा जो दूसरे इंसान का सम्मान करे

    wonderful comments!

    1. Om Raizada जनवरी 11, 2013 at 10:41 अपराह्न

      वक़्त और ख़ून बहता रहा। वाह क्या शब्द गड़े हैं आपने || अपनी आपबीती लिख कर आपने सैकड़ों लोगों की बात कह दी || मुझसे तो एक दफा यह भी कहा गया के सौ नंबर फ्री का समझ कर फोन किया है क्या ?? बड़े सवाल दागे || किस्सा नारायणा थाने का है || एक बार फिर से सौ नंबर घुमा कर इन लोगों की शिकायत की तभी किस्सा थमा || लेकिन हिम्मत नहीं हारी है | एक दफा आगरे में सप्रू होस्टल के सामने एक रिक्शे वाले को चोटिल छोड़ कर चला आया था - डर के मारे राजा मंडी चौराहे पर खड़े पुलिस वालों को भी नहीं बताया क्योंकि अगली सुबह मथुरा जाना था - सोचा के पकड़ कर बैठा लेंगे - शायद वह मर गया होगा || तब से इस बात को ले कर जी रहा हूँ ||

    2. Om Raizada जनवरी 11, 2013 at 10:41 अपराह्न

      वक़्त और ख़ून बहता रहा। वाह क्या शब्द गड़े हैं आपने || अपनी आपबीती लिख कर आपने सैकड़ों लोगों की बात कह दी || मुझसे तो एक दफा यह भी कहा गया के सौ नंबर फ्री का समझ कर फोन किया है क्या ?? बड़े सवाल दागे || किस्सा नारायणा थाने का है || एक बार फिर से सौ नंबर घुमा कर इन लोगों की शिकायत की तभी किस्सा थमा || लेकिन हिम्मत नहीं हारी है | एक दफा आगरे में सप्रू होस्टल के सामने एक रिक्शे वाले को चोटिल छोड़ कर चला आया था - डर के मारे राजा मंडी चौराहे पर खड़े पुलिस वालों को भी नहीं बताया क्योंकि अगली सुबह मथुरा जाना था - सोचा के पकड़ कर बैठा लेंगे - शायद वह मर गया होगा || तब से इस बात को ले कर जी रहा हूँ ||

    3. Om Raizada जनवरी 11, 2013 at 10:41 अपराह्न

      वक़्त और ख़ून बहता रहा। वाह क्या शब्द गड़े हैं आपने || अपनी आपबीती लिख कर आपने सैकड़ों लोगों की बात कह दी || मुझसे तो एक दफा यह भी कहा गया के सौ नंबर फ्री का समझ कर फोन किया है क्या ?? बड़े सवाल दागे || किस्सा नारायणा थाने का है || एक बार फिर से सौ नंबर घुमा कर इन लोगों की शिकायत की तभी किस्सा थमा || लेकिन हिम्मत नहीं हारी है | एक दफा आगरे में सप्रू होस्टल के सामने एक रिक्शे वाले को चोटिल छोड़ कर चला आया था - डर के मारे राजा मंडी चौराहे पर खड़े पुलिस वालों को भी नहीं बताया क्योंकि अगली सुबह मथुरा जाना था - सोचा के पकड़ कर बैठा लेंगे - शायद वह मर गया होगा || तब से इस बात को ले कर जी रहा हूँ ||

    4. मंजु सिंह जनवरी 12, 2013 at 1:12 अपराह्न

      सचमुच जिन लोगों ने मुसीबत में पड़े उन दोनों लोगों को नज़र अन्दाज़ किया, वे भी इस अपराध के लिए कम ज़िम्मेदार नहीं हैं। भले ही वे किसी की नज़र में आएँ या नहीं। उनकी अपनी आत्मा उन्हें इस अपराध के लिए कभी क्षमा नहीं करेगी। क्यों नहीं उन बच्चों को देखकर किसी को अपने बच्चे,अपना भाई,अपनी बहन याद नहीं आए। क्या हम गारंटी दे सकते हैं कि हमारे अपनों के साथ कभी कोई हादसा नहीं हो सकता? या उस समय भी हम पुलिस के पचड़ों से बचने के लिए मुँह फेर लेंगे।क्या हमारी संवेदना मर गई है।

    5. Anju Juneja जनवरी 12, 2013 at 4:46 अपराह्न

      एक दिन दिल्ली में किसी ने बम्बू को स्कर्ट पहना दिया अगले दिन देखा तो तार - तार स्कर्ट में टुकड़े - टुकड़े बम्बू फिंका हुआ थाणे में रपट कराई तो इलाके का चक्कर पड़ा खबर मीडिया में छाई तो बयानों का सिलसिला शुरू हुआ किसी नें कहा बम्बू को साड़ी पहनाई होती तो यह मुसीबत न आती कोई कहता छ बजे से पहले उठा लेते तो बचा लेते यही बम्बू होता जो गाँव में किसी की हिम्मत नहीं इस की तरफ आँख उठा ले मंत्री जी ने भी बम्बू को आग लगाई राष्ट्रीय सम्मान का बिगुल बजा अपनी रोटी पकाई हमने भी सारे काण्ड के लिए सरकार पे उंगली उठाई अपने अपने बम्बुओं को कमरों में बंद कर उनकी हिफाज़त की ज़िम्मेदारी निभाई

    6. Kavyaa Tiwari जनवरी 13, 2013 at 5:22 पूर्वाह्न

      आदरणीय श्री शैलेश लोढा जी, महोदय, 'सब टीवी' पर आपके कार्यक्रम 'वाह वाह क्या बात है...' के माध्यम से हिंदी कविता मंच को लेकर मैं कुछ कटु टिप्पडी करना चाहती हूँ| कविता के नाम पर ऐसे लोगों को बुलाया एवं सम्मानित किया जा रहा है जिन्हें कविता का 'क-ख-ग-घ...' भी नहीं आता| १०-१५ साल से वही पुरानी ४-४ पंक्तियों वाली ४ कविताए... दुःख इस बात का है, की मंच के इन कलंकों को सम्मानित भी किया जाता रहा है| बिलकुल ताज़ा...पापुलर मेरठी, तारा चंद्र तनहा, और भी कई नाम हैं...आप को बताने की ज़रूरत नहीं है, आखिर वही चुटकुले, वही कविताए कब तक परोसी जायेंगी? क्या हिंदी कविता सिर्फ मनोरंजन की वस्तु रह गई है? मुझे ये जानकार और भी आश्चर्य हुआ है की 'तारा चंद्र तन्हा' जी को युवा पुरस्कार से भी नवाजा गया है| पिछले १५ वर्षो से मंच पर काव्यपाठ करने वाले युवा कवि कैसे हो गया| जहां तक मुझे याद है 'छुपा-रुस्तम' में नवोदित रचनाकार को ही सामिल करने का नियम था| फिलहाल, ये परस्कार आप ने एक 'गधे किस्म के कवि' को दिया है| 'कवि' कह कर संबोधित करने से 'कवि' का अपमान होगा! कृपया करके आप साहित्य का बेडा गर्क न करे! एक से एक रचनाकार है यदि मच की शोभा बढाना है तो कवियों के कुछ नाम मैं भी प्रेषित कर सकती हूँ| यदि 'तारा चंद्र तन्हा' जैसे ही रचनाकार को बुला कर आप अपने को धन्य समझते है तो सॉरी, मैं बस इतना ही कहूँगी की हिंदी साहित्य को निचली पायदान में धकेलने में २ कदम आप ने भी साथ दिया है|

    7. Kavyaa Tiwari जनवरी 13, 2013 at 5:22 पूर्वाह्न

      आदरणीय श्री शैलेश लोढा जी, महोदय, 'सब टीवी' पर आपके कार्यक्रम 'वाह वाह क्या बात है...' के माध्यम से हिंदी कविता मंच को लेकर मैं कुछ कटु टिप्पडी करना चाहती हूँ| कविता के नाम पर ऐसे लोगों को बुलाया एवं सम्मानित किया जा रहा है जिन्हें कविता का 'क-ख-ग-घ...' भी नहीं आता| १०-१५ साल से वही पुरानी ४-४ पंक्तियों वाली ४ कविताए... दुःख इस बात का है, की मंच के इन कलंकों को सम्मानित भी किया जाता रहा है| बिलकुल ताज़ा...पापुलर मेरठी, तारा चंद्र तनहा, और भी कई नाम हैं...आप को बताने की ज़रूरत नहीं है, आखिर वही चुटकुले, वही कविताए कब तक परोसी जायेंगी? क्या हिंदी कविता सिर्फ मनोरंजन की वस्तु रह गई है? मुझे ये जानकार और भी आश्चर्य हुआ है की 'तारा चंद्र तन्हा' जी को युवा पुरस्कार से भी नवाजा गया है| पिछले १५ वर्षो से मंच पर काव्यपाठ करने वाले युवा कवि कैसे हो गया| जहां तक मुझे याद है 'छुपा-रुस्तम' में नवोदित रचनाकार को ही सामिल करने का नियम था| फिलहाल, ये परस्कार आप ने एक 'गधे किस्म के कवि' को दिया है| 'कवि' कह कर संबोधित करने से 'कवि' का अपमान होगा! कृपया करके आप साहित्य का बेडा गर्क न करे! एक से एक रचनाकार है यदि मच की शोभा बढाना है तो कवियों के कुछ नाम मैं भी प्रेषित कर सकती हूँ| यदि 'तारा चंद्र तन्हा' जैसे ही रचनाकार को बुला कर आप अपने को धन्य समझते है तो सॉरी, मैं बस इतना ही कहूँगी की हिंदी साहित्य को निचली पायदान में धकेलने में २ कदम आप ने भी साथ दिया है|

    8. Kavyaa Tiwari जनवरी 13, 2013 at 5:22 पूर्वाह्न

      आदरणीय श्री शैलेश लोढा जी, महोदय, 'सब टीवी' पर आपके कार्यक्रम 'वाह वाह क्या बात है...' के माध्यम से हिंदी कविता मंच को लेकर मैं कुछ कटु टिप्पडी करना चाहती हूँ| कविता के नाम पर ऐसे लोगों को बुलाया एवं सम्मानित किया जा रहा है जिन्हें कविता का 'क-ख-ग-घ...' भी नहीं आता| १०-१५ साल से वही पुरानी ४-४ पंक्तियों वाली ४ कविताए... दुःख इस बात का है, की मंच के इन कलंकों को सम्मानित भी किया जाता रहा है| बिलकुल ताज़ा...पापुलर मेरठी, तारा चंद्र तनहा, और भी कई नाम हैं...आप को बताने की ज़रूरत नहीं है, आखिर वही चुटकुले, वही कविताए कब तक परोसी जायेंगी? क्या हिंदी कविता सिर्फ मनोरंजन की वस्तु रह गई है? मुझे ये जानकार और भी आश्चर्य हुआ है की 'तारा चंद्र तन्हा' जी को युवा पुरस्कार से भी नवाजा गया है| पिछले १५ वर्षो से मंच पर काव्यपाठ करने वाले युवा कवि कैसे हो गया| जहां तक मुझे याद है 'छुपा-रुस्तम' में नवोदित रचनाकार को ही सामिल करने का नियम था| फिलहाल, ये परस्कार आप ने एक 'गधे किस्म के कवि' को दिया है| 'कवि' कह कर संबोधित करने से 'कवि' का अपमान होगा! कृपया करके आप साहित्य का बेडा गर्क न करे! एक से एक रचनाकार है यदि मच की शोभा बढाना है तो कवियों के कुछ नाम मैं भी प्रेषित कर सकती हूँ| यदि 'तारा चंद्र तन्हा' जैसे ही रचनाकार को बुला कर आप अपने को धन्य समझते है तो सॉरी, मैं बस इतना ही कहूँगी की हिंदी साहित्य को निचली पायदान में धकेलने में २ कदम आप ने भी साथ दिया है|

    9. jyotsna जनवरी 25, 2013 at 12:57 पूर्वाह्न

      ye durghatnaye itni daravani hein ki mashtishk shunyata se bhara hua lagta he. har vyakti bahvheen jaan padhta he. lagta he jese manveeye rishte par barf ki moti chaddar padh gai he.damini jeevan ki abhilasha liye duniya se bina kisi galti ke vida ho gai. dushkarmi jeevit he kyon? kya kisi aur ko apna rakjhasi roop dikhane ke liye? kya vo sudhre ga? nahi kabhi nahi. inke liye maanviyata koi maayne nahi rakhti he. phir ye jinda kyon he?

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