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दोहा की अतीतजीवी संस्कृति

 

—चौं रे चम्पू! दोहा में कौन-कौन कवि हते तेरे संग?

 

—अटल, अरुण, ममता और सुदीप। वहां पहुंचते ही सुदीप के पास उसकी पत्नी का फोन आया, ‘कहां हो?’ ‘कतार में।’ ‘तुम तो दोहा गए थे। कतार में कैसे लग गए? लौट आओ, यहां एटीएमएम में कोई भीड़ नहीं है।’ ‘अरी बावली, दोहा कतार की राजधानी है।’

—हास्य कबी पत्नीन तेई प्रेरना लियौ करैं। दोहा की और बता!

 

—चचा, पिछले दो दशक में ही उभर कर आया हुआ देश है। मूल क़तरी नागरिक बीस प्रतिशत और बाकी ग़रीब दुनिया के ग़रीब मजदूर और कुशल कार्मिक। पीएनजी गैस का अकूत भंडार है। भविष्य की चिंता नहीं है, अतीत की संस्कृति में जीना चाहते हैं। एक सदियों पुराने सूक यानी बाज़ार का नवीनीकरण किया है, जहां चांदनी चौक जैसी तंग गलियां हैं। छोटी-छोटी दुकानें अन्दर से भव्य हैं, लेकिन पाबंदी यही कि उनका बाहरी रूप सदियों पुराना हो। अलिफ़-लैला की कहानियों के ज़माने जैसा। दुकानों में कपड़े, मसाले, मेवा, बर्तन, और तरह-तरह के साजो-सामान। नाई, नानबाई, हलवाई, कसाई! तरह-तरह के व्यंजन। शीरमाल बनाते हुए बावर्ची। हुक्के-शीशा पीते हुए लोग। पुरानी शैली की कुर्सी-मेजें। दीवारें जैसे मिट्टी की हों। छतें जैसे कड़ियों पर टिकी हों, लेकिन निर्माण अत्याधुनिक। उस पुराने जैसे बाज़ार के नीचे तीन हज़ार कारों के लिए विराट अंडर-ग्राउंड पार्किंग है। बाहर निकल कर देखा कि वहां आधुनिक इमारतों के बीच रेत का बाड़ा है, जिसमें सैकड़ों ऊंट बंधे हुए हैं। अचानक मुझे पुरुष-प्रधान समाज के एक हास्य-शास्त्री का मनोविज्ञानिक विवेचन याद आया। उसने कहा कि ब्रिटिश नागरिक की एक पत्नी और एक प्रेमिका होती है, लेकिन वह पत्नी से ज़्यादा प्यार करता है। अमरीकी नागरिक की एक पत्नी और एक प्रेमिका होती है, वह प्रेमिका से ज़्यादा प्यार करता है। भारतीय नागरिक की एक पतिव्रता पत्नी और अनेक प्रेमिकाएं होती हैं, लेकिन वह अपनी मां से ज़्यादा प्यार करता है। गल्फ़ नागरिक की चार पत्नियां और एक प्रेमिका होती है, लेकिन वह अपने ऊंट से ज़्यादा प्यार करता है। बात मज़ाक की है, लेकिन दम तो है चचा!

 

—हट्ट लल्ला! जे बात औरतन्नैं अच्छी नायं लगैगी!

 


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