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  • झूठ का निर्वसन नृत्य

    —चौं रे चम्पू! झूठ बोलिबौ पाप ऐ का तेरी नजर में?

    —आप जो सवाल पूछते हैं चचा, उसका उत्तर आपके पास पहले से होता है। मुझसे क्या कहलवाना चाहते हैं? आप ख़ुद बताइए, झूठ पाप है या पुण्य? पुण्य तो ख़ैर नहीं है, लेकिन पाप भी अगर नहीं है, तो फिर क्यों नहीं है?

    —हमनैं तोते पूछी ऐ, तू बता!

    —चचा, स्थितियां, स्थान, समय, परिवेश, देश, काल इन सबके आधार पर झूठ और सत्य की व्याख्या होती है। ये दोनों के दोनों बड़ी सापेक्ष स्थितियों में पैदा होने वाले तत्व हैं। महाभारत को झूठ का काव्य कहें कि सत्य का काव्य, बताइए! कल्पनाओं से भरा हुआ है झूठ का महल और पुण्यात्मा होने का दावा करते हैं अधिकांश चरित्र। स्वयं वेदव्यास ने लिखा था कि मैं मौत से उतना नहीं डरता, जितना झूठ से डरता हूं, लेकिन इन्हीं वेदव्यास ने पांच प्रकार के झूठ को दोषरहित और पापशून्य माना।

    —बता कौन-कौन से पांच ऐं?

    —देखा जाए तो इन्हीं में सारी स्थितियां समा जाती हैं। पहला, वे कहते हैं कि परिहासयुक्त वचन असत्य हो तो भी हानिकारक नहीं होता। यानी, हंसी-हंसी में झूठ बोले जाओ प्यारे! कोई बुराई नहीं है। अब वह हंसी अन्य किन लोगों के लिए घातक है, ये देखने की बात है। परिहास से तो जान तक चली जाती है। मज़ाक करना मज़ाक नहीं है चचा! मज़ाक मज़ाक में ही झूठ बोल दिए जाएं तो परिवार टूट सकते हैं। दूसरा, वेदव्यास कहते हैं कि अपनी स्त्रियों के प्रति झूठ बोलना दोषरहित है। अब लीजिए! इस बात को शास्त्र-पुराण कह रहे हैं। एक स्त्री के पास जाओ तो दूसरी से छिपाओ, तीसरी के पास जाओ तो पहली दो के रहस्य मत बताओ। वह तो खैर द्वापर युग था जहां एक पुरुष के लिए अनेक स्त्रिय़ां और एक स्त्री के लिए अनेक पतियों का चलन था, लेकिन इसे दोषरहित माना जाता था।

    —तू तौ नायं बोलै झूठ, अपने घर में?

    —चचा, अब झूठ बोलूं क्या?

    —अच्छा तीसरौ बता!

    —तीसरा, वे कहते हैं कि विवाह के समय झूठ बोलने में कोई बुराई नहीं है। यानी, तुम्हारे पहले कितने विवाह हो चुके हैं, धन-सम्पदा कितनी है, यह बताना ज़रूरी नहीं है। पहले तो तुम बड़े-बड़े सब्ज़बाग दिखाओ और फिर जब दुल्हन देखे कि तुम तो फक्खड़ बाबा हो तो तुम्हारा झूठ दोषरहित माना जाएगा। अच्छा चचा, एक बड़ा मज़ेदार लोकगीत सुनाता हूं, जिसमें पति ने सब्जबाग दिखाए। पत्नी के सामने जब सत्य का उद्घाटन हुआ तो दुखी होकर कहती है— ‘भजाय लायौ रे, भजाय लायौ, तेरौ जइयो सत्यानास भजाय लायौ। व्हां तौ कहंतु मेरे महल-दुमहला, य्हां टटिया पै फूस उड़त पायौ। तेरौ जइयो सत्यानास भजाय लायौ। व्हां तौ कहंतु मेरे अन्न के कुठला, य्हां चपटा में चून सन्यौ पायौ। तेरौ जइयो सत्यानास भजाय लायौ। व्हां तौ कहंतु मेरी आठ भैंसिया, य्हां डाड़ी वारौ बोक बंध्यौ पायौ। तेरौ जइयो सत्यानास भजाय लायौ। वहां तो कहता था कि मेरे आठ भैंस बंधी हुई हैं और यहां दाढ़ी वाला बकरा है, जो दूध भी नहीं दे सकता। तो विवाह के समय झूठ बोलना पापशून्य है।

    —और बता चौथौ।

    —जब प्राण संकट में हों, तब झूठ बोला जा सकता है और पांचवां यह कि जब तुम्हारा सर्वस्व लुट रहा हो, तुम स्त्री हो या पुरुष, उस समय विवश होकर असत्य बोलना पड़े तो वह पाप नहीं होता। कहते हैं कि सत्य वह है जो आंखों से दिखाई देता है, लेकिन आंखों देखी भी कई बार सत्य नहीं होती। किस संदर्भ में, क्या हुआ, उसके आगे क्या था, उसके पीछे क्या था, दृश्य का पूर्वापर सम्बन्ध सामने आना चाहिए। इस समय युवाओं में जो आक्रोश फूटा है, वह सच्चा है। कुछ झूठे लोग भी वहां जाकर मिल गए हैं। पुलिस-प्रशासन दोषी है, अपनी अकर्मण्यता को झूठ से ढकता है। सच यह है कि हवस और वहशीपन से भरा इंसान किस क्षण इतना दरिन्दा और पापी हो जाएगा, उसके लिए प्रशासन या पुलिस अपनी हज़ार आंखें नहीं बना सकते। उसे जागरूक नागरिकों को अपनी आंखें बनाने की ज़रूरत है। वैसे चचा! आजकल झूठ नहीं पकड़ा जाता, सच को पकड़ने में दुनिया लगी है, झूठ तो निर्वसन होकर नृत्य कर रहा है। हम सबके सामने।

    wonderful comments!

    1. PARVEEN SHARMA मार्च 4, 2013 at 3:56 अपराह्न

      katustaya

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