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  • चौं रे चम्पू
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  • घुटन और घुटने दोनों को सुकून मिला
  • —चौं रे चम्पू! का हाल ऐं रे अब तेरे पांयं के?

    —छः हफ़्ते का आराम बताया था चचा, चार हफ़्ते हो गए। दर्द कम है। फ़िज़ियोथैरेपी शुरू हो चुकी है, लेकिन घर में पड़े-पड़े जो जड़ता सी आने लगी थी, उसकी थैरेपी बाहर निकलने के अलावा क्या हो सकती है! बुलावे कितने ही सारे थे, मैं मना करता रहा, पर सैंट्रल पार्क के हिन्दी अकादमी कविसम्मेलन के लिए जब बिष्ट जी ने कहा कि आपको बड़ी गाड़ी में आराम से लाया जाएगा और क्नॉट सर्कस की मुख्य सड़क से लगे गेट नम्बर आठ पर व्हील-चेयर की व्यवस्था होगी, मंच तक रैम्प बना दिया जाएगा, वहां आपके लिए सोफ़ा है, आइए तो सही। मैंने भी डॉक्टरों के निर्देशों को अनदेखा करके, जाने का फैसला लिया और चचा ख़ूब आनन्द आया। महीने भर की उदासी की परतें छंट गईं। श्रोता भरपूर थे। उन्होंने जब पलकों पर उठा लिया तो मैंने भी अपनी बैसाखी गिरा दी।

    —तकलीफ नायं भई घौंटू में?

    —घुटने में थोड़ा-बहुत कष्ट रहा, लेकिन घुटन तो दूर हुई। वहां सारे कवि-मित्रों का सद्भाव नज़र आया। हर किसी ने मेरी नहीं, घुटने की चिंता की। जीवंत वातावरण रहा। कार्यक्रम की शुरुआत भी तुम्हारे चम्पू ने की और समापन भी। टूटी टांग चार घंटे तक सोफ़े पर मसनद के सहारे टिकी रही। कवियों के सहारे श्रोता अंत तक टिके रहे। अपने बीस-पच्चीस साल पुराने रंग में आकर मैंने भी वो कविताएं सुनाईं, जिनको सुनाना लगभग बन्द कर चुका था। दस बजे की समय सीमा न होती तो कार्यक्रम मध्यरात्रि तक चलता रह सकता था।

    —और खास बात बता!

    —सबसे ख़ास बात तो ये कि इस नए बने सैंट्रल पार्क में पहली बार कविसम्मेलन हो रहा था। अब से चालीस साल पहले भी मैं इस स्थान पर आया करता था। तब न यहां पर पालिका बाज़ार था, न राजीव चौक मैट्रो। यहां टी हाउस हुआ करता था। देश के बड़े से बड़े साहित्यकार, मनीषी, चिंतक एक कंधे पर झोला टांगे हुए, सन्ध्या काल में यहां आते थे। चाय-कॉफ़ी पीना उद्देश्य नहीं होता था। चाय-कॉफ़ी के बहाने गपशप होती थीं, साहित्यिक, हासित्यिक चर्चाएं होती थीं। हर विचारधारा के साहित्यकार यहां अड्डा जमाते थे। मेरा सौभाग्य है कि मैं अनेक बार विष्णु प्रभाकर जी के साथ दूर से पैदल-पैदल आया करता था। इस स्थान की एक महत्ता और है चचा! सन उन्नीस सौ बहत्तर में तुम्हारे चम्पू को इसी दिव्य भूमि पर पहली बार याद हुआ था कि उसका नाम चक्रधर है।

    —सो कैसे लल्ला?

    —अरे चचा! सन उन्नीस सौ बहत्तर में दिल्ली विश्वविद्यालय के टैगोर पुस्तकालय में एक कवि गोष्ठी हुई थी। उस दिन तक तुम्हारे चम्पू का नाम अशोक शर्मा था। कविगोष्ठी से पहले डॉ. सुधीश पचौरी के सहयोग से नामकरण हुआ, अशोक चक्रधर। सूची में यही नाम लिखवा दिया गया। गोष्ठी में नाम पुकारा गया, अशोक चक्रधर। सुधीश ने कहा, जाओ जाओ, तुम्हारी बारी है। और अशोक चक्रधर ने अपनी नई कविता ’खचेरा और उसकी फैंटेसी’ सुनाई। बिना मांगे तालियां भी मिल गईं। स्थापित हो गए पहली ही गोष्ठी में। शाम को इसी स्थान पर, यानी टी हाउस के आसपास झोले में कुछ लघु-पत्रिकाएं रखे हुए, टहलते हुए जा रहे थे कि पीछे से किसी ने आवाज़ लगाई, चक्रधर। तुम्हारे चम्पू पर कोई प्रतिक्रिया ही नहीं हुई। उसी दिन तो रखा था नाम। फिर उन पुकारने वाले सज्जन ने कहा, खचेरा। खचेरा तो मेरा काव्यनायक था। मैंने पलट कर देखा, खचेरा को कौन जानता है। सामने लीलाधर शर्मा मेरे जैसा झोला लटकाए हुए मुस्कुरा रहे थे, कमाल है भाई! खचेरा कहो तो प्रतिक्रिया देते हो, चक्रधर पुकारने से नहीं सुनते। मैंने कहा, आज से याद हो जाएगा कि मैं ही चक्रधर हूं। आज किसी ने पहली बार टी हाउस में चक्रधर नाम से पुकारा है। उसके बाद तो चचा पुकारती हुई पुकारें जाने कहां कहां घुमाती रहीं। सेंट्रल पार्क के कविसम्मेलन में ले आईं और चक्रधर को सोफे पर बिठा कर सुनवा रही हैं कविताएं। भले ही टांग टूटी है, पर सिलसिला नहीं टूटा।

    —कबता सुनाइबे ते सकून मिल्यौ?

    —घुटन और घुटने दोनों को बड़ा सुकून मिला चचा। शपथपूर्वक बाई-गॉड की कसम!

    wonderful comments!

    1. dr. ram akela May 2, 2013 at 10:30 pm

      Great... chakradhar naam karan bada romanchak he...

    2. Gunjan May 3, 2013 at 12:10 pm

      Glad to hear that you are feeling a little better. Come over to our plAce-we are at tuglak crescent now. I promise you will feel a little more better. There will be great ambience and greT golguppas!

    3. Jaidev Jonwal May 9, 2013 at 1:55 pm

      Guru ji ko parnaam. apko kavi sammelan mein dekh kar bahut khusi hui.. aur apka naam chakradhar kaise pada ye hamesha se jaanna aur puchna chahta tha, par ho nahi paya, apke is lekh se mujhe mere sawalo ka aur chakradhar naam kaise hu apka pata chal gaya, warna ajtak logo se suna tha sab kehte the apne koi kavita chakradhar naam se sunayi thi usske baad se hi apka naam ashok chakradhar ho gaya, Dhanyewaad guru ji charan sparsh, apka shisye Jaidev JOnwal

    4. कपिल May 18, 2013 at 9:54 pm

      सर जी बस हर पल इंतजार करते हैं आपकी रचनाओं का निर्माण,,

    5. sumant Jul 7, 2013 at 8:57 pm

      I like your's all KAVITA, whenever got time i tried to listen from anywhere.

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