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  • चौं रे चम्पू
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  • अरे मानवता का बोध ही गया
  • —चौं रे चम्पू! आतंकवादिन में कोई मानबता होय कै नायं?

    —अपने हिसाब से तो वे मानवता की रक्षा के लिए ही आतंकवादी बनते हैं, लेकिन उनकी मानवता संकीर्ण होती है। जिन मानवों की हित-रक्षा के लिए वे आतंक के कहरवादी बनते हैं, उनके अनुसार वे ही मानव हैं, दूसरों को जीने का कोई अधिकार नहीं है, लेकिन चचा, ऐसा तो नहीं ही कह सकते कि वे धुर से ही अमानवीय होते हैं। दरसल, उनके दिल और दिमाग़ का संतुलन आउट रहता है।

    —तेरह बम्ब रखिबे वारेन में कोई मानबता होयगी का? चौं पच्छ लै रह्यौ ऐ उन्कौ?

    —पक्ष क्यों न लूं, उन्होंने सुरक्षा एजेंसियों की पोल खोल दी। अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक धरोहर कितनी सुरक्षित हैं देश में, सबको बता दिया। चचा! पता है, सिलिंडरों से बनाए हुए इन जुगाड़ बमों में टाइमर लगा था। यानी, टाइम सैट करके आतंकवादी जिस समय चाहें, उन बमों को फोड़ सकते थे। समय उनमें फ़ीड किया गया सुबह के साढ़े पांच बजे से छः के बीच का। यह समय-खण्ड ऐसा होता है जब न्यूनतम लोग मन्दिर और मन्दिर के परिसर में होते हैं। अगर यही शाम के साढ़े पांच बजे से छः के बीच का समय रहा होता तो वहां होते अधिकतम लोग। न केवल देशी पर्यटक, बल्कि विदेशी पर्यटकों की संख्या भी अधिक रही होती। अधिकतम संख्या में बौद्ध भिक्षुक भी वहां रमण करते हुए दिखाई देते। वे चाहते तो एएम की जगह पीएम का टाइम सैट कर सकते थे। हज़ारों लोग मर जाते, पर उनके अन्दर पी.एम. यानी प्यारी मानवता बची हुई थी।

    —यानी तेरे तांईं एक-दो जान की कोई कीमत नायं! हट्ट!

    —चचा तुम्हारी बुद्धि ठस्स होती जा रही है। मैंने स्वयं लिखा था कि एक मरे, दो मरें, दस मरें, सौ मर जायं, हज़ार मरें; है सवाल इतना सा भैया, क्यों वे आख़िरकार मरें? तुम्हारा व्यंग्य का बोध गया और बोधगया में तो आतंकवादियों में मानवता का बोध ही गया। ख़ैर, आपको एक बात मालूम है चचा, बुद्धं शरणं गच्छामि की शुरुआत कहां से हुई थी?

    —तू ई बता! तू ई किताब पढ़ै जादा, हम तौ पढ़ैं नायं। ज़िन्दगी पढ़िबे वारै का जानैं व्यंग-फ्यंग।

    —बुद्ध के समय में बर्मा से दो व्यापारी संघ में आए थे, उन्हें रातभर ठहरना था। उन्होंने द्वार पर गुहार लगाई, बुद्धं शरणं गच्छामि। उनको रात्रि में विश्राम करने दिया गया और तभी से यह प्रार्थना भी बन गई, बुद्धं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि। बुद्ध की यशगाथाएं म्यांमार में तभी से गाई जाती हैं। जहां भी यशगाथाओं की शुरुआत होती है और कालांतर में उनका विस्तार होता है, वहीं व्यथाएं भी शुरू हो जाती हैं, उन लोगों के मन में, जिनको इन यशगाथाओं से परेशानी होती है। कहते हैं कि मुस्लिम समुदायों और बौद्धों के बीच वहां प्रारंभ से ही ठनाठनी और तनातनी बनी रहती है। उसी के रहते मुजाहिदीनों ने बौद्धगया जैसे शांत स्थान पर एएमबाज़ी कर दी। कुछ कहते हैं इराक़ में हुई तबाही का बदला लिया गया। बहरहाल, मन्दिर के दरवाज़े टूटे, कांच-किरचों के ऊपर बोधि वृक्ष के पीपल-पात बिखर गए। भिक्षुओं के गेरुआ वस्त्र उड़कर टहनियों पर लटक गए। शांत परिसर का वह स्थान जहां एक सुईं के भी गिरने की ध्वनि नहीं होती, मोबाइल बजना तो बहुत दूर की बात है, वहां धमाके हुए। ये सब मामला घी की चिकनाई का है।

    —सो कैसे लल्ला?

    —चारवाक् दर्शन में कहा गया है कि ऋण लो, घी पियो, आनन्द मनाओ। आतंकवादी भी जानते हैं इस बात को कि मक्खन, माल-मलाई और घी की चिकनाई कहां से मिलती है। शांति ग़ायब करने से। दो-ढाई हज़ार साल बाद शांति के इन मन्दिरों-शिलालेखों पर युद्ध की इबारत लिख दी थोड़ी सी! मुझे सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की वह पंक्तियां याद आती हैं, ‘हवा शुद्ध और पानी शुद्ध, खा-पी बन गए गौतम बुद्ध, किंतु मिलावट का घी खा, हमने सदा युद्ध सीखा, मिले हवा और पानी शुद्ध, हम भी बन जाएं गौतम बुद्ध।’ चचा, मामला हवा और पानी की शुद्धता का है। हवा में जब नफ़रत के रोगाणु होंगे और पानी में लहू की प्यास, तो हमें नए सिरे से करनी होगी नए गौतम बुद्ध की तलाश।

    —तू अपनौ दिमाग सुद्ध कर पैलै। आतंकबादीन में कोई मानबता नायं होय। सुन लई!!

    wonderful comments!

    1. Sumit Madan Jul 26, 2013 at 10:41 am

      चचा Kamaal ka bolte hai... :)

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