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  • अपनी जड़ें मजबूत रहें न
  • —चौं रे चम्पू! आपदा प्रबंधन कार्यालय हर राज्य में हौयं, इनकौ कुल काम का ऐ?

    —चचा, आपदा प्रबंधन नाम ही ग़लत है। ऐसा लगता है जैसे आपदाओं को आमंत्रित करके, उनका प्रबंध करने वाला विभाग हो।

    —हर बात में अपनी व्यंग-खोपरी मत चलायौ कर!

    —व्यंग्य की बात नहीं है चचा। व्यंग्य तो तब किया जाता है जब लोगों को आपदाएं दिखना बंद हो जाएं। जब आपदाएं घट नहीं रही हों, सरेआम आपके सामने घटित हो रही हों, तब ऐसा ही लगता है कि आपदाओं की राह तकते हैं ये आपदा प्रबंधन प्राधिकरण। ग़ैरक़ानूनी ढंग से जंगल काटे गए। मालूम है कि जंगल कटेंगे तो पर्यावरण का संतुलन बिगड़ेगा, वर्षा अचानक तेज़ होगी अथवा नहीं ही होगी, होगी तो भू-क्षरण होगा, कचरा-भरण होगा। बिल्डरों के पास जंगल कटे का सरमाया है, और उन्हें छूट देने में आपदा-प्रबंधन की माया है। सरकार विभाग खोल कर भूल जाती है कि वहां के कार्मिकों से कोई काम भी लेना है। आप्रप्रा की नौकरी आराम की।

    —आप्रप्रा?

    —अरे यही, आपदा प्रबंधन प्राधिकरण। आनंद प्रसन्नता प्राप्ति। कोई काम नहीं है। मुख्यमंत्री प्राधिकरण के अध्यक्ष हैं, आपदा मंत्री उसके मंत्री। साल में दो-तीन बैठकें हो गईं काफ़ी हैं। राज्य में विकास के दूसरे काफ़ी काम हैं जी! आप्रप्रा की सभाओं में क्यों काफ़ी समय नष्ट करें? सभा में किसकी हिम्मत है ये बताने की कि विकास के नाम पर, प्रकृति के सैंटीमेंटों का जो सीमैंटीकरण हो रहा है, वह काफ़ी दुखदायी सिद्ध होगा। और जब आपदा आई तब पता चला कि उससे निपटने के लिए अपने पास कुछ भी काफ़ी नहीं है।

    —पहारन पै बिकास कौ काम तौ अंगरेजन्नैं ऊ कियौ हतो!

    —अंग्रेजों ने रेल की पटरियां बिछाईं, सुरंगें बनाई, लेकिन कम से कम वृक्ष काटे। जितने काटे, उससे दस गुना लगा भी दिए। न केवल ऐसे वृक्ष जो वहां होते थे, बल्कि कुछ यूरोप से मंगाए, आसपास के देशों से मंगाए और यहां लगाए। उन्हें मालूम था कि चीड़ के वृक्ष पानी नहीं रोक पाते, अखरोट और शहतूत के वृक्ष रोक लेते हैं। तो खूब लगाए ऐसे वृक्ष जो पानी को प्रलय न बनने दें, लेकिन ये आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की नाक के नीचे जो सुरंगें बनाई जा रही हैं, वे विस्फोट-जन्य होती हैं। पहले कुदाल चलाकर सुरंगें बनाई जाती थीं, अब कुचाल ये है कि बम विस्फोट करो और पहाड़ों को तितर-बितर कर दो। इस आपदा में जो लोग मरे हैं, पानी के बहाव से नहीं मरे चचा!

    —पानी ते नायं मरे तौ फिर कैसै मरे?

    —पानी तो बड़ा कोमल होता है। कितने ही वेग में क्यों न हो, किनारे लगा सकता है। हल्की-फुल्की सी भी तैराकी जानने वाले इंसान को पानी मार नहीं सकता। पानी अपने आवेग से जिन पत्थरों को बहाकर लाता है, वे पत्थर मारते हैं। विस्फोट के बाद से ये सारे छोटे-छोटे पत्थर पहाड़ों पर बिखरे हुए थे। जैसे ही बरसात आपदा बनकर आती है, बादल फाड़ कर आती है, तो लाती है छोटे प्रस्तर खण्ड। वे प्रस्तर खण्ड खण्ड-खण्ड कर देते हैं आपदा प्रबन्धन के पाखण्ड को भी। दो दिन पहले तक हज़ार लोग बताए जा रहे थे, एक ही दिन में उनकी संख्या पांच हज़ार कर दी प्रशासन ने।

    —कहिबे वारे तौ लाखन के मरिबे की बात करि रहे ऐं।

    —अफवाहें फैलाने वालों का क्या, लेकिन बेशुमार लाशों के बीच लोग अभी भी सुबक रहे हैं, अंतिम सांसें ले रहे हैं। आपदा प्रबन्धन करने वाले उन तक राहत सामग्री मुहैया नहीं कर पाए हैं। बहुत देर में चेतती हैं सरकारें। मौसम विभाग की कही को अनसुना करने का पूरा कौशल है इनके पास।

    —सुनी ऐ कै मोदी हज्जारन करोड़ लगाइकै उत्तराखंड के मंदिरन्नै ठीक कराइबे वारौ ऐ!

    —अगर वे कृपा करें तो इन पहाड़ों पर वृक्ष लगवाएं और फिर से पर्यावरण को ऐसा करें कि आप्रप्रा सचमुच प्रबन्धन कर सके, आपदाओं का नहीं, आपदाओं के निपटारे का।

    —जे ऊ सुनी ऐ कै मोदी आपदा में फंसे गुजरातीन कूं हवाईजहाज ते लै जाय रए ऐं।

    —अच्छी बात है। पूरे देश का प्रधानमंत्री बनने का सपना देखने वाला व्यक्ति अपने-अपनों को बटोर रहा है, ये भी एक नज़रिया है। पहाड़ पर पेड़ लगाने से क्या होगा? अपनी जड़ें मजबूत रहें न।

    wonderful comments!

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