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अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो

—चौं रे चम्पू! हलो! मैंनैं तौ मनैं करी कै टूटौ घुटना लैकै मती जा पटना, पर तू चलौ गयौ, मानौ चौं नायं?

—हलो चचा! मैं लगभग-पगभग ठीक हूं!

—लगभग तौ ठीक, पगभग का ऐ रे?

—अपने विक्षत पग से भगने की इच्छा रखने वाला। बिस्तर, बैसाखी, वॉकर, व्हील-चेयर, स्ट्रेचर से दुखी हो चुका था और बस कहीं भी निकल जाना चाहता था। बिहार की कार्यक्रम शृंखला का न्यौता मिला, थोड़ी उलझन थी पर स्वीकार कर लिया। भला हो राजीव जी का कि वे यात्रा में मेरे साथ रहे। फिज़ियो थैरेपी, भोजन-भजन सबका ध्यान रखा। ग्यारह को निकला था, कल तक ग्यारह कार्यकम हो गए। अभी पटना में हूं।

—कहां कहां है आयौ?

—भागलपुर, कटिहार, बांका, लखीसराय, बेगूसराय, बिहारशरीफ, गया, पटना, आरा, बक्सर और कल शृंखला का अंतिम कार्यक्रम किया सासाराम में। दिल्ली से चला था तो मुझे चार लोग व्हीलचेयर पर उठाकर हवाई जहाज में ले गए थे और आज शाम जब मैं दिल्ली पहुंचूंगा तो आप जानकर ख़ुश होंगे कि मैं सिर्फ़ अपनी छड़ी के सहारे सीढ़ियों से स्वयं उतरकर आऊंगा।

—वाह लल्ला! जे तौ भौत अच्छी ख़बर सुनाई। जात्रा में और कोई कष्ट तौ नायं भयौ?

—कष्ट तो भुलाने के लिए होते हैं चचा। सुख मिला कैरैवैन बस से, जिसकी खोज इंटरनेट पर मेरी एक योग्य शिष्या ने की। उसने बताया कि बिहार के पर्यटन विभाग के पास वंडर ऑन व्हील्स नाम की एक ऐसी एयरकंडीशंड बस है, जिसमें दो बैड लग जाते हैं। रैफ्रिजरेटर, माइक्रोवेव, वॉशरूम जैसी सुविधाएं हैं। चाहे जहां रोक लो। शेड भी निकल आती है। कुर्सी डालकर चाय की चुस्की लगाओ। वही चलते-फिरते घर जैसी बस बुक करा ली।

—अरे वाह! मजा आय गये तेरे तौ!

—मैं समझता हूं कि कविसम्मेलन के मंचीय कवियों के वाहन-इतिहास में शायद तुम्हारा चम्पू पहला व्यक्ति होगा, जिसने इस प्रकार की सुविधा का इस्तेमाल किया, जैसा प्रायः सिनेमा के बड़े-बड़े अभिनेता किया करते हैं। चचा, जब पारिश्रमिक मिल रहा है तो ख़र्च भी करना चाहिए। असल बात ये हुई कि हज़ारों श्रोताओं से रूबरू होकर मानसिक ऊर्जा मिली। बस में बैठ कर बिहार की ग़रीबी, अमीरी, हरियाली, पुरानापन, नयापन, वहां के रंग, वहां की छटाएं, वहां के आदमी का तिरछापन, आड़ापन, सादगी, इस सब के दर्शन हुए। हमारे ड्राइवर फ़ैयाज़ साहब, बहुत शांत स्वभाव के हैं। उनको मैंने इस पूरी यात्रा में क्रोध में आते नहीं देखा। उनके सहायक प्रमोद जी, तीसरी कसम के पलटदास जैसे। दोनों ने जहां कंधे के सहारे की आवश्यकता थी, कंधा दिया और जहां श्रेष्ठ भोजन की संभावना थी, वहां गाड़ी रोकी। गाड़ी सदैव मंच के पीछे दस फीट की दूरी पर ले जाकर लगाई, ताकि अधिक नहीं चलना पड़े।

—और कोई ख़ास बात?

—कवियों में कोई तनाव नहीं। जगह बदल जाती थी, श्रोता बदल जाते थे। दस-बारह दिन के लिए दस-बारह जोड़ी कपड़े सभी लाए थे, तो कपड़े बदल जाते थे, लेकिन कविता क्यों बदले भला! कविताएं वही रहीं, लतीफ़े वही रहे। लतीफ़ों के मामले में इतना था कि जिसका दाव पहले लग गया उसने सुना दिया। लतीफ़े पर किसका कॉपीराइट! पर दूसरों की कविताएं और टिप्पणियां बिना उनका नाम लिए सुनाना अच्छा नहीं है। चचा, ये देश वाचिक परम्परा को बहुत प्यार करता है। पूरे मंचीय कवि समाज की ज़िम्मेदारी है कि वह श्रोताओं के इस प्यार का स्खलन न होने दे और उन्हें ऐसी चीज़ें परोसे जो नई पीढ़ी को उदाहरण दे कि कविता ऐसी होती है। हां, आपको बताना भूल गया एक बहुत अच्छा काम इस शृंखला में आयोजकों ने किया कि अड़तीस ज़िलों में नवीं से बारहवीं तक के बच्चों के लिए कविता प्रतियोगिताएं कराईं। शहर के ही साहित्यकारों को निर्णायक बनाया गया और श्रेष्ठ दो बच्चों को प्रारम्भ में काव्य-पाठ का अवसर दिया गया। चचा, क्या बताऊं इन किशोर कवियों ने अद्भुत कविताएं सुनाईं। सबकी कविताओं में सामाजिक सरोकार था। प्रथम स्थान प्रायः लड़कियों ने प्राप्त किया। उनकी कविताओं में दामिनी और गुड़िया के लिए पीड़ा थी। एक लड़की ने तो यहां तक कहा कि अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो क्योंकि बिटिया बनकर इस पुरुष समाज के दम्भ को चूर-चूर करना चाहती हूं। कन्याओं ने अपनी भावनाओं, अपनी बुद्धि के संतुलन से एक आशा बंधाई है कि हमारी वाचिक परम्परा ज़िन्दा रहेगी। ऐसे दिन आएंगे कि मंच पर लतीफ़े नहीं, कविताएं अधिक सुनी जाएंगी।


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