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विकास की लकीरें

‘स्वराज 735’ के लिए बनाई गई यह एक प्रमोशनल फ़िल्म है। ‘सैण्डिट’ का नाम यों तो एक स्वयंसेवी संस्था के रूप में जाना जाता है लेकिन अपनी आर्थिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए उसने विज्ञापन फ़िल्में भी निर्मित कराईं। आधा घंटे की इस फ़िल्म का पूरा कार्यभार ‘सैण्डिट’ ने अशोक जी पर छोड़ दिया और उन्होंने इस विज्ञापन फ़िल्म को भी काव्यात्मक बना दिया। फ़िल्म का प्रारंभिक दृश्य है कि स्वराज ट्रैक्टर धरती जोत रहा है। फ्रेम में केवल मिट्टी से बनी रेखाएं हैं और गीत गूंजता है- ‘धरती के कागज़ पे खींची हैं स्वराज ने विकास की लकीरें!’ फ़िल्म के लिए अभिनेताओं का आवश्यकता बताए जाने पर स्वराज कंपनी के उच्च अधिकारी ने बताया कि कलाकार चंडीगढ़ में मिल जाएंगे। उनकी कंपनी में बहुत से अधिकारी हैं जिन्हें अभिनय का शौक है। चंडीगढ़ में पूरा दिन ऑडीशन चला किंतु एक भी कलाकार नहीं मिल पाया। हारकर दो प्रमुख भूमिकाओं में एक स्वयं अशोक जी ने की तथा दूसरी उनके कवि मित्र पुरुषोत्तम प्रतीक ने। फ़िल्म के व्याकरण की दृष्टि से यह एक सुगठित फ़िल्म थी जिसने अशोक जी के अंदर फ़िल्म-निर्देशन का आत्मविश्वास भर दिया।