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तीन-नज़ारे

टेलीफ़िल्म

सम्पत्ति से जुड़े हुए महिलाओं के क़ानूनी अधिकारों को आधार बनाकर ‘तीन नज़ारे’ नामक टेलीफ़िल्म जनशिक्षा के उद्देश्य से बनाई गई है। अलग-अलग धर्मों में सम्पत्ति और विरासतपरक क़ानून न के वल विभिन्न हैं बल्कि उलझे हुए हैं।

क़ानूनी पेचीदगियों को सरलता से संप्रेषित करने के लिए घटनाओं के विन्यास की एक अनूठी शैली है। उन्होंने एक हिन्दू, एक मुस्लिम तथा एक ईसाई, इन तीन परिवारों की सम्पत्ति विषयक आंतरिक कलह के उदाहरणों को शिक्षण का आधार बनाया है। इस टेलीफ़िल्म की संरचना नुक्कड़ नाटकों के समान है जिनमें वही कलाकार अलग-अलग धर्मों के परिवारी सदस्यों का अभिनय करते हैं और वही सूत्रधार एवं समस्याओं के व्याख्याता हैं।

टेलीफ़िल्म का तानाबाना कुछ इस तरह का है। हिन्दू संयुक्त परिवार की मुखिया दादी इमरती देवी मुखिया होते हुए भी अपने अधिकारों से वंचित हैं। उनकी विधवा पुत्रवधुओं को भी परिवार के पुरुष उनका हक़ नहीं मिलने देते। एक लंबे दृश्य में भाइयों, भौजाइयों, बहनों, बहनोइयों तथा तीसरी पीढ़ी की संतानों की सारी कशमकश सामने आती है।

दूसरा नज़ारा एक मध्यवर्गीय ईसाई परिवार का है जिसकी मुखिया पीटर की मां जैनी है। जैनी का दामाद अपनी सास की सम्पत्ति पर नज़रें गड़ाए हुए है। तीसरा नज़ारा है एक मध्यवर्गीय मुस्लिम परिवार का जहां अम्मीजान के दोनों बेटे और बहुएं उनकी बेटियों को उनका हक़ नहीं मिलने देते। चक्रधर एक कुशल शिक्षक के समान तीनों उदाहरणों से निकलने वाले क़ानूनी दांवपेंच को सामने लाते हैं। क़ानूनी विशेषज्ञ आभा जोशी अलग-अलग वैयक्तिक क़ानूनों का हवाला देती हैं लेकिन विषय बोझिल न हो जाए इसलिए चक्रधर अपने अभिनेताओं की पूरी टीम को सूत्रधार की तरह इस्तेमाल करते हुए समस्याओं की प्रश्नोत्तरी प्रस्तुत करते हैं। सूत्रधार शैली हमारे यहां की एक प्राचीन शैली है।

तीन नज़ारे की सूत्रधार पद्घति ब्रेख़्त के नुक्कड़ नाटकों से मिलती है, जहां नाटक के अभिनेता अपने चरित्रों में से निकलकर मंच के एक कोने में खड़े हो जाते हैं और भावशून्य चेहरे बना लेते हैं। उनमें से कोई एक तटस्थ भाव से संवाद बोलता है अथवा आगामी दृश्य की सूचना देता है। तीन नज़ारे के कलाकार भी इसी प्रकार स्वयं खेले गए दृश्यों की व्याख्या करते दिखाई देते हैं। कई बार तो एक वाक्य अनेक पात्रों द्वारा पूरा किया जाता है। यह एक अनूठी पद्धति है। किसी टेलीफ़िल्म में इसका इस्तेमाल पहली बार हुआ है।

अशोक चक्रधर एक प्रयोगधर्मी फ़िल्मकार हैं। तीन नज़ारे में उनका यह प्रयोग सफल हुआ है। उलझे हुए क़ानूनी मसले इस पद्घति द्वारा सरलता से सुलझ जाते हैं। तीन नज़ारे के फ़िल्मी गठन को हम तीन सोपानों में होती हुई यात्रा के रूप में देख सकते हैं।

पहला अलग-अलग परिवारों की नाट्य स्थितियां। दूसरा सूत्रधार मंडली द्वारा प्रश्नों का उठाया जाना और तीसरा क़ानूनी विशेषज्ञ आभा जोशी द्वारा संतोषजनक उत्तर देना। प्रश्नों में से प्रश्न निकलते हैं और रोचक ढंग से दर्शक को उत्तर प्राप्त हो जाते हैं। तीन नज़ारे नामक फ़िल्म को श्रेष्ठ शैक्षणिक फ़िल्म के उदाहरण के रूप में कहीं भी प्रस्तुत किया जा सकता है।

डॉ. बागेश्री चक्रधर की आवाज़ में फ़िल्म का शीर्षक गीत गहरा प्रभाव छोड़ता है-
सदियों से नारी दुखियारी,
चलती उसके हक़ों पे आरी।
क्यों दुखियारी किसकी ख़ता है,
ये भी उसको नहीं पता है।
औरत के हक़ के बारे में क्या कहते क़ानून हमारे,
देखिए तीन नज़ारे। देखिए तीन नज़ारे ॥