मीडिया

मास्टर दीपचंद

टेलीफ़िल्म

‘जीत गी छन्नो’ बनाने के बाद अशोक चक्रधर में कथा-फ़िल्में बनाने का आत्मविश्वास बढ़ गया। साथ ही फ़िल्म-निर्माण के लिए उन्होंने अपनी एक टीम बना ली, जिसमें हर विभाग के लिए योग्य लोग जुड़ गए। उनके परिवार के हर सदस्य ने किसी-न-किसी रूप में उनकी फ़िल्मों में अपना योग दिया। ‘मास्टर दीपचंद’ उनकी दूसरी कथा फ़िल्म थी, जिसमें नए अभिनेताओं के साथ सर्वश्री शैल चतुर्वेदी, अरुण बाली, ब्रज नुक्ता जैसे लोकप्रिय एवं मंजे हुए कलाकारों को भी लिया।

साक्षरता की राह में अनेक प्रकार के सामाजिक रोड़े आते हैं। महानगर की एक छोटी कॉलोनी में मज़दूरों और पल्लेदारों का चाय पीने का एक अड्डा है। यहीं पर मास्टर दीपचंद मंदिर के एक कमरे में रात्रिकालीन कक्षाओं का प्रस्ताव रखता है। शुरूआत में सभी उत्साहित होते हैं और इस उद्देश्य के लिए तरह-तरह से सहयोग करते हैं।

प्रौढ़ शिक्षा निदेशालय की ओर से बनाई गई फ़िल्मों के प्रदर्शन के लिए मास्टर दीपचंद कु छ स्थानीय युवकों की मदद से एक टेलीविज़न और वीツ सीツ आरツ का प्रबंध करता है। कु छ शरारती तत्त्व कहीं से अश्लील वीडियो कैसेट ले आते हैं। मास्टर दीपचंद के सो जाने के बाद इन उपकरणों का दुरुपयोग होता है। एक दुष्ट चरित्र कॉलोनी में पोल खोल देता है और मारा जाता है बेचारा भोला-भाला मास्टर दीपचंद। कथा फ्लैशबैक टैक्नीक में आगे बढ़ती है। रोचकता आद्योपांत बनी रहती है।

अशोक जी किसी बने बनाए सैट पर काम करने के बजाए वास्तविक जीवन के बीच जाकर फ़िल्में बनाते हैं। और वहीं लोगों के बीच में रहती है उनकी यूनिट। विश्वप्रसिद्घ चित्रकार मिकी पटेल ने एक झुग्गी बस्ती के मंदिर को भव्यता प्रदान करने के लिए वहीं जाकर दीवार पर हनुमान जी का चित्र बनाया। शैल चतुर्वेदी ने अपने बंबई के महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम छोड़कर अशोक जी के लिए कार्य किया। आज श्री आज़ाद के न जाने कितने शिष्य मेकअप मैन के रूप में मीडिया में व्यस्त हैं, मास्टर दीपचंद के मेकअपमैन स्वयं श्री आजाद थे। अशोक जी अपनी फ़िल्मों के लिए सदैव श्रेष्ठतम लोगों को एकत्रित करने में सफल रहे हैं, इसी कारण सीमित आर्थिक साधनों में फ़िल्में बना पाना संभव हो सका है।